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Bhaktamar Stotra

Verse 13-16

वक्त्रं क्व ते सुरनरोरगनेत्रहारि ।
निःशेष निर्जित जगत् त्रितयोपमानम् ॥
बिम्बं कलङ्क मलिनं क्व निशाकरस्य ।
यद्वासरे भवति पांडुपलाशकल्पम् ॥१३॥

vaktram kva te suranaroraganetrahari
nihshesha - nirjita-jagat tritayopamanam |
bimbam kalanka-malinam kva nishakarasya
yad vasare bhavati pandupalashakalpam ॥ 13 ॥
*
सम्पूर्णमण्ङल शशाङ्ककलाकलाप् ।
शुभ्रा गुणास्त्रिभुवनं तव लंघयन्ति ॥
ये संश्रितास् त्रिजगदीश्वर नाथमेकं ।
कस्तान् निवारयति संचरतो यथेष्टम् ॥१४॥

sampurnamannala - shashankakalakalap
shubhra gunastribhuvanam tava langhayanti |
ye sanshritas -trijagadishvara nathamekam
kastan -nivarayati sancharato yatheshtam ॥ 14 ॥
*
चित्रं किमत्र यदि ते त्रिदशांगनाभिर् ।
नीतं मनागपि मनो न विकार मार्गम् ॥
कल्पान्तकालमरुता चलिताचलेन ।
किं मन्दराद्रिशिखिरं चलितं कदाचित् ॥१५॥

chitram kimatra yadi te tridashanganabhir -
nitam managapi mano na vikara - margam |
kalpantakalamaruta chalitachalena
kim mandaradrishikhiram chalitam kadachit ॥ 15 ॥
*
निर्धूमवर्तिपवर्जित तैलपूरः ।
कृत्स्नं जगत्त्रयमिदं प्रकटी करोषि ॥
गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां ।
दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ् जगत्प्रकाशः ॥१६॥

nirdhumavartipavarjita - tailapurah
kritsnam jagattrayamidam prakati-karoshi |
gamyo na jatu marutam chalitachalanam
dipoaparastvamasi nath jagatprakashah ॥ 16 ॥

 

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In the practice of tolerance, one's enemy is the best teacher.
- Dalai Lama