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मन को स्थिर करने की प्रक्रिया

प्रश्न – नामजप करते समय एकाग्रता नहीं होती इसका क्या कारण है ॽ उस वक्त भांतिभांति के और भिन्न भिन्न प्रकार के संकल्प, भाव एवं विचार मन में पैदा होते हैं तथा मन के पर्दे पर विभिन्न प्रकार के दृश्य उत्पन्न होते हैं । इनका अन्त कैसे करें ॽ
उत्तर - आपके अन्तरमन में अनेक प्रकार के भाव, विचार, संकल्प और रसवृत्तियों के संस्कार प्रकट या अप्रकट रूपसे पडे होते हैं । जब आप उनको स्थिर करने का प्रयत्न करते हैं तब वे प्रबल रूप में बाहर आते हैं और आपके सामने चील की तरह मंडराते रहते हैं । इन संस्कारों एवं भावों को निर्मल बनाने की कोशिश कीजिए और इसके साथ ही जो विघातक भाव, विचार या संस्कार हैं उन्हें विवेकशक्ति की सहायता लेकर जड़-मूल से नष्ट कीजिए । उनके सूक्ष्म अंकुर भी आपके अन्तरमन में रहने न पाए इसका ध्यान रखें । मतलब यह कि मन को स्थिर करने की साधना के साथ साथ मनको शुद्ध बनाने का प्रयास करते रहें । इससे एकाग्रता के मंगल कार्य में सहायता मिलेगी । अलबत्ता यह काम तनिक कष्टसाध्य है, लंबा और विकट भी है परन्तु ऐसा सोचकर मायूस होने की, नाहिंमत होने की या हतोत्साह हो जानेकी आवश्यकता नहीं है । आत्मविश्वास, आत्मनिरीक्षण एवं धीरज और हिंमत के साथ आगे बढ़ने से मनकी एकाग्रता अवश्य सिद्ध होगी । नामजप या ध्यान का अभ्यास करते वक्त मन बाह्य चिंतनमनन छोड़कर आत्माभिमुख या अंतर्मुख बन जाएगा । उस वक्त अद्भूत आनंदकी अनुभूति होगी ।

प्रश्न – नामजप करते वक्त मन की स्थिरता के लिए अन्य कोई उपयोगी प्रक्रिया आप बता सकते हैं ॽ
उत्तर – दो प्रकार की प्रक्रिया सूचित कर सकता हूँ । एक तो नामजप करते वक्त या ध्यान करते समय श्वासोच्छवास की गति का निरीक्षण करें । श्वास को अंदर लेते समय एक जप करें और बाहर निकालते वक्त दूसरा जप करें । जप यदि लम्बा हो तो उसे एकाधिक श्वास में भी कर सकते हैं । दूसरी प्रक्रिया, जिसका जप किया जाए उसके स्वरूप का स्मरण या ध्यान करने की है । आरंभ में उस रूप को मूर्ति या चित्र के रूप में सम्मुख रखें । उसे एक नज़र देखते हुए खुली आँखों से जप या ध्यान का आश्रय लें । ये दोनों प्रक्रिया एकाग्रता में सहायक सिद्ध होगी । आप उसे आज़मा सकते हैं ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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