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हिन्दू धर्म

प्रश्न – हिन्दू धर्म वैसे तो सनातन, महान, विशाल और एकेश्वरवादी कहलाता है किंतु गहराई से सोचा जाय तो उसमें एकवाक्यता नहीं दिखाई देती । हिन्दु धर्म में जो भिन्न भिन्न पूजा के विधान हैं, भिन्न भिन्न मंत्र, ध्यान के प्रतीक, पुस्तक या अनेक देव-देवियाँ है ये सब क्या एकेश्वरवाद के सिद्धांत के अनुकूल हैं ॽ क्या ये हिन्दु धर्म के दोष नहीं है ॽ इसमें हिन्दु धर्म की विशालता दिखाई देती है या संकीर्णता ॽ महानता दिखाई देती है या अल्पता ॽ मुझे तो लगता है कि हिन्दु धर्म पिछड़ा हुआ है ।
उत्तर – वास्तव में यह बात नहीं है । जिस कारण से आप हिन्दू धर्म को पिछडा हुआ मानते हैं, जिनमें आपको हिन्दु धर्म की अल्पता या संकीर्णता दिखाई पड़ती है, उसके बारे में शांति से सोच-विचार करने पर और उसका गहराई से अभ्यास करने पर आपको हिन्दुधर्म की महानता एवं विशेषता की प्रतीति होगी । यह भी मालूम होगा कि एकेश्वरवाद का सिद्धांत इसमें ओतप्रोत हो गया है । तभी आपको हिन्दुधर्म के प्रति आदर उत्पन्न होगा इसमें कोई सन्देह नहीं ।

प्रश्न – लेकिन कैसे ॽ
उत्तर – हिन्दु धर्म एक महान वैज्ञानिक धर्म है । मानव-मन और उसकी प्रकृति के गहन अध्ययन के पश्चात उसकी रचना हुई है । इस धर्म के आचार्य मानव की भिन्न रुचि तथा प्रकृति की विविधता को भली भाँति जानते थे । मनुष्य की भावना इच्छा, पसंदगी एक समान नहीं होती परंतु भिन्न भिन्न होती है, ओर उसकी आकांक्षाओं एवं उसके विकास की पध्धतियाँ भी अलग अलग हैं इस हकीकत को वे अच्छी तरह जानते थे । इसीलिए वे मानते थें कि सभी मनुष्यों के लिए पूजा सेवा के एक से प्रतीक या साधन नहीं हो सकते । रुचि भिन्न है अतएव विकास के साधन, विकास के मार्ग भिन्न भिन्न हो सकते हैं । इस विषय में ऐसा लश्करी कानून नहीं बनाया जा सकता जो सब पर एक रूप से लागू हो । इसकी कोई जरूरत नहीं । सब लोग ईश्वर का साक्षात्कार करे और इस तरह अपने जीवन का कल्याण करे यह बात उपयुक्त है किंतु उसके लिए एकसे साधनों का आग्रह रखना व्यर्थ है । इससे तो संघर्ष पैदा होगा और अभीष्ट फलकी प्राप्ति भी नहीं होगी ।
हम चाहते हैं कि हर कोई आगे बढ़े परंतु अमुक पध्धति का आधार लेकर ही आगे बढ़े ऐसा नहीं । इसके पीछे हिन्दुधर्म के महान प्रणेताओं का गहन मनोवैज्ञानिक अभ्यास निहित है । इसीलिए उस धर्म में विभिन्न प्रतीक, पुस्तकें, साधना के मार्ग एवं देवी-देवता हैं । अपनी रुचि या प्रकृति के अनुसार परंदगी करने में हर कोई आज़ाद है । ये सब विभिन्नताएँ होने पर भी वह एक ईश्वर का उपदेश देता है और ईश्वर के साक्षात्कार का सन्देश देता है । दुनिया की बाह्य विभिन्नता में रहकर अंतर्निहित परमात्मा की झाँकी करना सिखाता है । देवी देवता को विराट विभु के प्रतीक मानते हैं । इस तरह यदि आप समझेंगे तो आपकी शंका दूर होगी ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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Do not wait to strike till the iron is hot; but make it hot by striking.
- William B. Sprague

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