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संतपुरुषों की निंदा

प्रश्न – कभी कभी ऐसा देखने में आता है कि किसी जिज्ञासु भक्त या साधक को किसी संतुपुरुष पर बहुत भरोसा या अत्यधिक प्रेम होता है । वह उनको पूज्य या ईश्वरतुल्य मानते हैं किन्तु कुछ समय के पश्चात् किसी प्रकार के कारण बिना वह उनके साथ सम्बन्ध तोड़ देता है और उनकी टीका या निंदा करता है । उस वक्त दूसरों को उसका यह रूप बड़ा विचित्र लगता है । ऐसे विरोधी बर्ताव या परिवर्तन का कारण क्या है ॽ
उत्तर – विरोधी बर्ताव या परिवर्तन का कारण ढूँढना मुश्किल है । यों तो कहने के लिए हम कहते हैं, कि यह बात तो ऋणानुबंध अथवा संस्कार की है । जब ऋणानुबंध पूरा होता है तब व्यक्तियों का आपस का सम्बन्ध टूट जाता है और इसके पीछे कोई बाह्य कारण भी नहीं दिखाई देता । तो कभी इस विषय में किन्हीं साधारण या असाधारण कारण भी होते है । संतपुरुष के साथ अगर किसी दुन्यवी लालसा, वासना या स्वार्थ कारण हो तो आखिरकार लालसा, वासना या स्वार्थ की पूर्ति हो जाने पर मन अश्रद्धालु बन जाता है, बदल जाता है और जिसके साथ प्यार हुआ हो, उसका नाता तोड देता हैं । कभी संतपुरुष को सच्चे रूप में न समझ सकने के कारण नासमझ पैदा होती है । लेकिन संतपुरुष में प्रेम एवं विश्वास पर्याप्त अनुभव एवं सोच विचार के बाद पैदा हुआ हो तो वह चिरस्थायी रहेगा, उसमें कभी कमी महसूस न होगी । बिना सोच-विचार के केवल संतपुरुष की शक्ति या सिद्धि से चकित होकर सम्बन्ध शुरु हुआ होगा तो वह चिरकाल तक नहीं टिकेगा । कुछ भी हो, किंतु एक बात अवश्य याद रखें कि संतपुरुष के साथ सम्बन्ध ही न रखें तो कोई बात नहीं किंतु उसकी निंदा कभी मत कीजिए । निंदा करने में किसी तरह मानवता नहीं है ।

प्रश्न – कोई व्यक्ति यदि विरोधी बन जाय और उनकी निंदा करे तो उस अवस्था में संतपुरष का मन कैसा रहता है ॽ
उत्तर – सच्चे संतपुरुष का मन सदैव शांत एवं स्वस्थ बना रहता है । विरोधी एवं निंदक के प्रति भी उनके हृदय में स्नेह एवं सद्भाव रहता है । वे उसके कल्याण की कामना करते हैं । सभी परिस्थितियों मे ईश्वर की मर्जी समझकर ईश्वर में मन को तल्लीन करके, उसीकी लीला का दर्शन करके वे अलिप्त रहते हैं ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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Wealth consists not in having great possessions, but in having few wants.
- Epicurus

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