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काशी में मृत्यु

प्रश्न – काशी में मृत्यु होने से मुक्ति मिलती है - इस शाश्त्र-वचन को आप मानते हैं ॽ
उत्तर – मानता हूँ परन्तु इसे सिर्फ शब्दार्थ में नहीं अपितु उसको भावार्थ के साथ स्वीकार करने में मानता हूँ ।

प्रश्न – भावार्थ के साथ स्वीकार करने का मतलब ॽ क्या आपको शास्त्र-वचन में श्रध्धा नहीं है ॽ
उत्तर – इसमें मुझे श्रध्धा नहीं है ऐसा तो कैसे हो सकता है ॽ सत्यतः देखा जाए तो यह प्रश्न ही नहीं है । शास्त्रवचन का वाच्यार्थ नहीं भावार्थ ग्रहण करना है । हर साल और हर दिन काशी में कितने जीव या आदमी जन्म लेते हैं इसलिए उनको मुक्ति मिलती है यह मानना ग़लत होगा । काशीनगरी में रहकर केवल मृत्यु प्राप्त होने से उनको मुक्ति नहीं मिल सकती । काशी में रहनेवाले सभी व्यक्ति धर्मात्मा नहीं होते । इसी तरह केवल वहाँ बसने से उनको मुक्ति कैसे मिले ॽ वे सब ईश्वरपरायण जीवन नहीं जीते । उनमें अहंता, ममता, रागद्वेष, आसक्ति, कामना व लालसा ऐसा सबकुछ होता है । उनसे प्रेरित हो वे कुछ प्रकार के कुकर्म भी करते हैं । ऐसे कुकर्मी लोग यदि काशी में मरे तो उनकी मुक्ति क्या हो सकती है ॽ मुझे नहीं लगता कि उनकी मुक्ति हो क्योंकि जिसका चारित्र्य शुद्ध न हो, जो सद्गुणी, सात्विक स्वभाव का और ईश्वर-परायण न हो और अनीति, अन्याय, अधर्म या कुकर्म में से जिसका मन प्रतिनिवृत्त नहीं हुआ हो उसे मुक्ति की प्राप्ति नहीं हो सकती । मुक्ति की प्राप्ति – यह तो जीवन विकास का एक स्वाभाविक क्रम है । शुद्ध हृदय के साधक ही उसका लाभ ले सकता है । मुक्ति इतनी सस्ती नहीं है कि काशी जैसे किसी धाम में रहने या मरने मात्र से ही मिल जाए । ना, ऐसी भ्रांति में मत रहना ।

प्रश्न – तो फिर काशी में रहने से मुक्ति मिलती है एसा क्यों कहा गया है ॽ
उत्तर – जैसे कि मैंने पहले बताया कि उसका केवल भावार्थ लेना है । उस कथनको भावार्थ सहित समझने से आपको कोई सन्देह नहीं रहेगा । जिस ज़माने में यह शास्त्रवचन लिखा गया उस समय काशी आत्मज्ञान का महान केन्द्र था । अध्यात्म विद्या का प्रचार व प्रसार अधिक प्रमाण में था । तदुपरांत भाँति भाँति के दिग्गज, मेधावी, प्रशांत महापुरुष आजी अपेक्षा अधिक प्रमाण में वहाँ निवास करते थे अतएव उनके समागम या सत्संग का आसानी से लाभ मिलता था । फलतः वहाँ निवास करनेवाले और विशेष रूप में जिज्ञासु लोगों के जीवन में परिवर्तन होता था । उन्हें देवदुर्लभ लाभ मिलता था और वे ज्ञान को प्राप्त कर अपने जीवन को शुद्ध, पूर्ण, मुक्त और ईश्वरमय बनाने के लिए तत्पर होते थे । इसी तरह उनके जीवन में मूलभूत क्रांति होती थी और जीवनभर आत्मिक विकास प्राप्त कर ऐसी उच्च अवस्था में मृत्यु होने से मुक्ति उनके लिए सहज होती थी । इस तरह बुध्धियुक्त सहानुभूति के साथ इस कथन को समझना हैं । जीवन को उच्च बनाने से आज या भविष्य में, किसीको भी, सिर्फ काशी में नहीं, अन्य किसी भी स्थान में बसने या मरने से मुक्ति मिल सकती है । काशी के प्रेमियों ने सिर्फ काशी के लिए ऐसा लिखा है बस ।

प्रश्न – स्थान की महिमा को आप नहीं मानते क्या ॽ
उत्तर – मानता हूँ । स्थान की अपनी महिमा अवश्य होती है । इसका इन्कार कैसे कर सकते हैं ॽ किन्तु सर्वोत्तम स्थान में रहकर भी कुछ न करे और आलसी बनकर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे तो उसका विकास कैसे होगा ॽ वह मुक्ति को कैसे प्राप्त कर सकेगा ॽ मनुष्य को किसी भी स्थान में रहकर कम से कम आवश्यक विकास तो करना ही चाहिए तभी कोई महत्वपूर्ण सिद्धि प्राप्त हो सकेगी ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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