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आत्मा का स्थान

प्रश्न – शरीर में आत्मा का स्थान कहाँ है ॽ
उत्तर – उपनिषद में कहा गया है कि ‘अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥’ अर्थात् शरीर के मध्यभाग में पवित्र तथा प्रकाशमय आत्मा का अस्तित्व है और जिनके दोष मिट गये हैं अर्थात् जो निर्दोष हैं ऐसे तपस्वी पुरुष उसका दर्शन कर सकते हैं ।
उपनिषद में अन्य जगह आत्मा का उल्लेख करते हुए ‘मध्य आत्मनि तिष्ठति’ कहा गया है । इसके द्वारा स्पष्टता की गई है कि आत्मा शरीर के मध्य में या हृदय में निवास करता है ।
गीता में कहा गया है ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।’
हे अर्जुन, ईश्वर सबके हृदयप्रदेश में निवास करते हैं ।
कोई पुरुष अपने बारे में कुछ कहना या परिचय देना चाहता है तब भी वह शरीर के किसी अन्य भाग पर हाथ रखने के बजाय स्वतः किसी प्राकृतिक वृत्ति से प्रेरित होकर अपनी छाती पर ही हाथ रखता है । इससे भी सूचित होता है कि आत्मा का स्थान वहीं पर है ।
श्री रमण महर्षि जैसे स्वानुभवसंपन्न महापुरुष का मंतव्य भी इस संदर्भ में जानने योग्य है । उन्होंने कहा है कि आत्मा का स्थान हृदयप्रदेश में और यह भी दाहिनी ओर स्थित हृदय में है । कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि आत्मा का स्थान मस्तिष्क में हैं । परन्तु इस मान्यता को सर्वथा समर्थन नहीं मिलता । दाहिनी ओर की बात छोड़ दी जाए तो भी आत्मा का प्रमुख स्थान हृदय है – इस बात या कथन के साथ प्रायः सभी लोग सम्मत है ।

प्रश्न – योगसाधना का आधार लेकर ईश्वर के साकार दर्शन करने की इच्छा पूरी हो सकती है ॽ
उत्तर – क्यों नहीं ॽ अवश्य हो सकती है किंतु शर्त यह है कि उसके लिए भक्त का हृदय चाहिए अथवा तो भक्तियोग का आश्रय ग्रहण करना चाहिए । ईश्वर का साकार दर्शन जागृति एवं समाधि दोनों दशाओंमें हो सकता है । योग की साधना में प्रायः समाधि अवस्था में वैसा दर्शन संभवित है । हृदय जहाँ तक भावविभोर न हो जाय, प्रेम से परिप्लावित न हो जाय, ईश्वर के खातिर रोने-पुकारने और प्रार्थना करने न लग जाय, उसके लिए बेकरार होकर अनवरत रूप से विलाप करने न लग जाय, वहाँ तक ईश्वर दर्शन नामुमकिन है ।

प्रश्न – योग के स्वभावतः गंभीर साधक में भक्त का भावविभोर हृदय प्रकट हो सकता है क्या ॽ
उत्तर – अवश्य प्रकट हो सकता है और यदि प्रकट न होता हो तो सावधानी और समझदारी से काम लेकर धीरे धीरे क्रमानुसार प्रकटाना चाहिए । ईश्वर के साकार दर्शन की अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए इतना अवश्य करना चाहिए । यह असंभव नहीं है । श्री रामकृष्ण परमहंस देव योगसाधना में गहरी दीलचस्पी लेते थे । फिर भी उनका भक्त हृदय मरा नहीं था । इस संबंध में स्वामी विवेकानंद एवं रामतीर्थ जैसे अन्य अनेक संतपुरुषों के उदाहरण दिये जा सकते हैं । यह मार्ग सबके लिए खुला है । भावमयता और गंभीरता ये दोनों परस्पर विरोधी हैं, ऐसा मानना उचित नहीं हैं । दोनों एक साथ रह सकते हैं और अपना अभीष्ट कार्य कर सकते हैं ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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Some of God's greatest gifts are unanswered prayers.
- G. Brooks

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