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आत्मविकास की साधना

प्रश्न – आत्मोत्कर्ष के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए क्या करना चाहिए ॽ जप का आधार लेना आवश्यक है या जप के बिना भी चल सकता है ॽ सद्ग्रंथो के अध्ययन बिना भी चल सकता है ॽ
उत्तर – सभी के लिए जप जैसी बाह्य प्रवृत्ति का आधार लेना आवश्यक है, ऐसा नहीं है । उसके बिना भी चल सकता है । सद्ग्रंथो के अध्ययन के बिना भी चल सकता है ।

प्रश्न – तो फिर आसन, प्राणायम, षट्क्रिया, मुद्रा एवं ध्यान के बगैर भी चल सकता है ॽ मुझे उसमें खास दिलचस्पी नहीं है ।
उत्तर – आपको रुचि नहीं है ये अलग बात है फिर भी उसके बगैर चल सकता है ।

प्रश्न – तो फिर किसके बिना नहीं चलेगा ॽ
उत्तर – सद्गुणों के बिना । भगवद् गीता के सोलहवें अध्याय में जिन्हें दैवी संपत्ति के सुंदर नाम से पहचाना गया है वह दैवी संपत्ति अर्थात् सदगुणों का विकास आत्मोन्नति की साधना में बहुत सहायक होता है । जीवन का विकास करने में यह अत्यंत आवश्यक है । उसके बिना आगे बढ़ना असंभव है । सदगुणों की वृद्धि का ध्यान रखने के साथ साथ जप, ध्यान तथा अन्य कठिन साधना का आधार यदि लिया जाय तो अधिक उचित होगा , उससे और अधिक श्रेष्ठ परिणाम प्राप्त होगा ।

प्रश्न – सदगुणी वृत्ति नितांत आवश्यक है ॽ कुछ संतो का मानना है कि सदगुणी जीवन नहीं होगा तो भी चलेगा, क्या यह सही है ॽ
उत्तर – नहीं । यह कथन सही नहीं है । ऐसा कहना साधकों की कुसेवा करना और उसे गलत राहों पर ले जाना ही होगा । ऐसे कथनों को आदर्श मानकर चलने से साधकों को श्रेय प्राप्त नहीं हो सकता । जीवन की शुद्धता ही जीवन विकास की नींव है । उस नींव की, उस धरातल की अवहेलना करने पर जीवनविकास करनेवाले साधक को या साधारण मनुष्य को कोई लाभ नहीं होगा ।

प्रश्न – जीवन शुद्धि कितने समय में संभव है ॽ
उत्तर – जीवनशुद्धि या जीवन विकास के लिए निश्चित समयसीमा नहीं है । साधक के आत्मबल और उसके कठिन प्रयास पर ही जीवन शुद्धि का आधार रहता है । साधक का प्रयास यदि निरंतर एवंम् प्रबल हो तो बहुत ही कम समय में शुद्धि हो सकती है, सिद्धि प्राप्त हो सकती है । परन्तु साधक का प्रयत्न यदि निर्बल रहा, विलंबित रहा तो जीवनशुद्धि प्राप्त करने में भी समय लगेगा । जीवनशुद्धि की सफलता का आधार साधक के प्रयत्न पर आधारित है ।

प्रश्न – जीवन की शुद्धि के अलावा भी साधना की अंतिम सिद्धि प्राप्त हो सकती है ॽ
उत्तर – ना ।

प्रश्न – तो पहले शुद्धि को प्राप्त करना, जब तक संपूर्ण शुद्धि प्राप्त न हो तब तक साधना सिद्धि की कामना करना भी क्या उचित होगा ॽ
उत्तर – नहीं, दोनों कार्य एक साथ होना चाहिए । अर्थात् साधक को अपने जीवन की शुद्धि के लिए स्वयं के दुर्गुणों को दूर करने का अथाक एवम् व्यवस्थित प्रयत्न करते रहना चाहिए । साधना की सिद्धि का लक्ष्य सामने रखते हुए, सिद्धि तक पहुँचने के प्रामाणिक प्रयत्न भी करना चाहिए । उसके लिए अंतरंग साधनों का जो अभ्यासक्रम होता है, उससे नियमित रुप से अपने आप को जोड़ना चाहिए । गीता के द्वितीय अध्याय में भगवान श्रीकृष्णने इस बात का संकेत देते हुए कहा है कि साधक में यदि थोड़ी सी भी अशुद्धि, विषयों की अभिरुचि रह जाती है तब भी परब्रह्म परमात्मा के दर्शन से उसका अंत हो जाता है । अतः सिद्धि की साधना भिन्न और जीवनशुद्धि की साधना भिन्न ऐसे दो विभाग करने की आवश्यकता नहीं है । जीवन शुद्धि की साधना और जीवन सिद्धि की साधना दोनों परस्पर अंतरंग ही है । दोनों एक सिक्के के दो पहलू समान है ।

प्रश्न – आत्मोत्कर्ष की साधना में अन्य कौन सा महत्वपूर्ण अंग है ॽ
उत्तर – मन की चंचलता का अभाव ।

प्रश्न – वह कैसे संभव है ॽ
उत्तर – जैसे जैसे शुद्धि प्राप्त होती जाती है, वैसे मन की चंचलता उत्तरोत्तर कम हो जाती है । मन स्थिरता प्राप्त करने लगता है । इतना ही नहीं, प्रार्थना ध्यान एवम् जप जैसी क्रियाओं से मन की चंचलता क्षीण होती जाती है ।

प्रश्न – जीवनविकास या जीवनोत्कर्ष की साधना में अन्य कोई याद रखने जैसी वस्तु है क्या ॽ
उत्तर – अन्यों की सेवा की प्रवृत्ति ।

प्रश्न – अन्यों की सेवा करने की प्रवृत्ति को कुछ लोग बन्धनकारक मानते है ।
उत्तर – ऐसा मानना नितांत गलत साबित होगा । वास्तव में अन्यों की सेवा और परहित की भावना से ही मन धीरे धीरे विशुद्ध होता चला जाता है । मन स्थिर, विशाल एवं उदार बनता है । सृष्टि के कण कण में वह उदात्त मन ईश्वर का दर्शन कर पाता है । इसलिए हमारे महापुरुषों ने परहित कर्म को कर्मयोग कहा है । और यह भी कहा है कि कर्मयोग का आधार लेकर ही हम परहित को साध सकते है । साथ ही स्वयं का परमहित भी साधक साध सकता है ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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