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गुरु के बारे में

प्रश्न – दो वर्ष पूर्व मेरे सदगुरु की मृत्यु हुई तब से मेरे शोक का कोई अंत नहीं । मेरे जीवन का सभी रस समाप्त हो चुका है । जीवन निरस हो चुका है । जब मेरे गुरु थे तब मैं समय समय पर उनके पास पहुँच जाता और उनके मार्गदर्शन से जीवन को उजागर करता था । अब उस लाभ से वंचित हो जाने के कारण बहुत दुःखी हूँ । मुझे अब क्या करना चाहिए ॽ क्या अन्य, दूसरे गुरु को ढूँढना चाहिए ॽ
उत्तर – आप अपने गुरु को मृत क्यों मानते हैं ॽ

प्रश्न – उसमें मानने न मानने का कोई सवाल ही नहीं । वास्तव में उनकी मृत्यु हो चुकी है यह हकीकत है और उस बात की सबको जानकारी है ।
उत्तर – गुरु कभी नहीं मरते । सिर्फ उनका पार्थिव शरीर नष्ट होता है । वह दूसरा रूप धारण कर ले तब भी उनका नाश संभव नहीं क्योंकि उनकी आत्मा अमर होती है और कार्य करती है । उस अर्थ में कहता हूँ की आपके गुरु की मृत्यु नहीं हुई है । इस सत्य को आप जानोगे तो आपको गुरु की मृत्यु का शोक कभी नहीं होगा । उनके अस्तित्व और अनुग्रह का अनुभव आप आज भी कर सकते हैं ।

प्रश्न – गुरु ने अपने शरीर का त्याग कर दिया हो तब भी वह अपने शिष्यों पर अनुग्रह या कृपा कर सकते हैं ॽ
उत्तर – अवश्य कर सकते हैं । कृपा या अनुग्रह केवल स्थूल शरीर से नहीं हो सकती, सूक्ष्म शरीर से ही संभव है । महत्वपूर्ण बात तो यह है कि आपके गुरु के प्रति आपकी श्रद्धा या भक्ति अभी भी है या नहीं, यह देखना होता है । आज भी आप अपने गुरु का पहले जैसा ही प्रेम, आस्था, श्रद्धा विश्वास से यदि स्मरण करते हो तो उनके मृत्यु के कारण शोकमग्न होने की कोई आवश्यकता नहीं है । उनका मार्गदर्शन आप आज भी प्राप्त कर सकते हो । उनकी कृपा आपके समस्त जीवन पर बरसती रहती होगी ऐसे अचल विश्वास के साथ अपने जीवन में आगे बढ़ो तो उसका लाभ आजीवन मिलता रहेगा । किसी अन्य को गुरु बनाने का विचार आपको निरर्थक लगेगा । आपके अपने दिवंगत गुरु की पवित्र प्रेरणा, कृपा से आपके जीवन में नवीनता आएगी, संजीवनी प्राप्त होगी और आप यह महेसूस करेंगे कि गुरु आपके पास, आपके करीब ही हैं ।

प्रश्न – आपके दर्शन किए और आपके प्रवचन सुनने के बाद मैं आपको ही गुरु मानता हूँ और आपसे विधिवत् दिक्षा ग्रहण करने की तीव्र अभिलाषा रखता हूँ तो आप मुझे शिष्य के रुप में स्वीकार करें एसी आपसे मेरी प्रार्थना है ।
उत्तर – मैं किसीका गुरु नहीं बन सकता । मैं स्वयं में एसी कोई योग्यता या गुण नहीं देख पाता कि मैं गुरु बन पाउँ । किसी अन्य के साथ मेरा गुरु-शिष्य जैसा कोई संबंध नहीं है । मैं किसीको विधिवत् दिक्षा नहीं देता हूँ । फिर भी कोई व्यक्ति मेरे प्रति गुरुभाव या भक्तिभाव रखता हो और उससे यदि उसे कोई लाभ होता हो तो मुझे उससे कोई आपत्ति नहीं है । कोई व्यक्ति मुझसे कोई मंत्र माँगता है तो मैं उसकी प्रवृत्ति एवम् रुचि के अनुरुप मंत्र सूचित करता हूँ । कोई व्यक्ति मेरे प्रति गुरुभाव रखकर यदि अपने जीवन में प्रगति कर पाता है तो उससे मुझे क्या आपत्ति हो सकती है ॽ कोई व्यक्ति अपनी साधनामार्ग की कठिनाई के निराकरण के संदर्भ में मुझे प्रश्न करे तो मैं अपनी बुद्धिशक्ति एवम् अनुभूति के आधार पर उसका उत्तर देना पसंद करुँगा ।

प्रश्न – क्या मेरे लिए गुरुदिक्षा लेना आवश्यक है ॽ
उत्तर – उसका निर्णय आपको खुद ही लेना होगा, मैं नहीं ले सकता ।

प्रश्न – किसी बाह्य गुरु से दिक्षा न ली हो तब भी आत्मोत्कर्ष की साधना में प्रगति कर सकते हैं ॽ
उत्तर – किसी अन्य बाह्य गुरु की सहायता के बिना भी आत्मोत्कर्ष की साधना में प्रगति कर सकते हैं परंतु उसके लिए महर्षि रमण जैसे महात्मा सिद्ध पुरुषों की भाँति पूर्वजन्म के प्रबल आध्यात्मिक संस्कारों की आवश्यकता रहती है । ऐसे महान एवम् सिद्ध पुरुषों का परमात्मा मार्गदर्शन करते हैं । अन्य व्यक्तिओं को जहां उनका मन निश्चित करता है वहीं गुरुभाव को स्थापित करके प्रगति करनी होती है । अगर गुरुभाव स्थापित करने योग्य कोई व्यक्ति ना भी लगे वहाँ परमात्मा ही सभी के परमगुरु बनता है, यह दृढ विश्वास रखकर ही अपने अंदर परमात्मा के प्रति आस्थाभाव जगाकर आगे बढ़ सकते हैं । आवश्यकता पड़ने पर, सुअवसर पाकर परमात्मा स्वयं ही साधक को सुयोग्य गुरु तक पहूँचाता है या तो साधक का मार्गदर्शक बनकर उसे ज्ञान का प्रकाश एवम् सनातन शांति का सहभागी बनाता है ।

प्रश्न – जिन महापुरुषों ने अपने स्थूल शरीर का परित्याग कर दिया हो उनके प्रति गुरुभाव रखना चाहिए या नहीं ॽ
उत्तर – अवश्य रखना चाहिए । महात्मा पुरुषों की सत्ता एवम् उनकी आत्मिक शक्ति उनके अपार्थिव सूक्ष्म शरीर में कार्यरत रहकर अन्यों की सहायता करती है । अतः उनके प्रति गुरुभाव रखने में कोई आपत्ति नहीं है ।

प्रश्न – वह हमारे प्रत्यक्ष होकर क्या हमें मंत्र प्रदान कर सकते हैं या हमें दीक्षित कर सकते हैं ॽ
उत्तर – अवश्य । यदि उनकी इच्छा हो तो स्वप्न में, ध्यान में, जाग्रत अवस्था में भी हमारे समक्ष प्रकट होकर, प्रत्यक्ष होकर मंत्र प्रदान कर सकते हैं, दीक्षित कर सकते हैं । अन्योन्य रूप से जीवन का पथप्रदर्शन कर सकते हैं । परन्तु उस स्थिति को प्राप्त करने के लिए हमारी भी उच्च कक्षा की पूर्वतैयारी होनी चाहिए ।

प्रश्न – उच्च कक्षा की पूर्वतैयारी का क्या मतलब है ॽ
उत्तर – हमारे अंतर्मन में ऐसे प्रातःस्मरणीय आदर्श महापुरुषों के प्रति अति आदर, सम्मान एवम् प्रेम तथा आस्था होनी चाहिए । एसे महापुरुषों की कृपा प्राप्त करने की लगन होनी चाहिए और वह लगन या उत्कंठा भी एक दो दिन, महिने या वर्ष के लिए मर्यादित नहीं बलकि निरंतर क्षणक्षण के लिए होनी चाहिए । महापुरुषों के अनुग्रह की प्राप्ति के लिए ऐसी योग्यता का निर्माण करना आवश्यक है । जिन्होंने भी यह योग्यता हासिल की है, स्वयं को सिद्ध किया है उन्होंने यह लाभ लेकर अपने जीवन को कृतार्थ करवाए हैं ।

प्रश्न – एसे महापुरुष आत्मज्ञान दे सकते हैं ॽ
उत्तर – क्यों नहीं ॽ उनकी असाधारण शक्ति के कारण महापुरुष अपनी इच्छा के अनुसार कुछ भी कर सकते हैं । वह संपूर्णरूप से स्वतंत्र है । शर्त मात्र यही है कि उनकी मनोकामना करनेवाले लोगों को उनके मार्गदर्शन के अनुरूप जीवन व्यतीत करना चाहिए ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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In the practice of tolerance, one's enemy is the best teacher.
- Dalai Lama

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