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ईश्वर का दर्शन

प्रश्न – वर्तमानयुग में किसी को ईश्वर का दर्शन होना संभव है ॽ
उत्तर – क्यों नहीं ॽ वर्तमान युग में भी ईश्वर का दर्शन हो सकता है । ईश्वर के दर्शन में कोई काल, कोई समय अवधि बाधा नहीं बन सकती ।

प्रश्न – परंतु यह तो घोर कलियुग है ।
उत्तर – तो क्या हुआ ॽ सृष्टि में बाह्य रूप से भले ही कलियुग हो, आपके मन में, आपके अंतर में, आपके अंतरंग जीवन में कलियुग न हो यही देखना आवश्यक होता है । यदि आपके मन अंतर में, आपके जीवन में कलियुग के दोष नहीं है तो आपकी जीवनयात्रा का रास्ता आपको साफ नज़र आएगा । और आज के इस घोर कलियुग में भी आप अपने आपको, अपने जीवन को पवित्र एवम् निष्कलंक रख पाऐंगे ।

प्रश्न – क्या एसा जीवन कठिन नहीं होगा ॽ
उत्तर – कठिन हो या न हो परंतु असंभव तो नहीं है । इसलिए उसमें आशा रही हुई है । चारों ओर विरोधी और प्रतिकूल वातावरण हो, जीवन की अमर्याद प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच जीवन व्यतीत करना कठिन होता है यह सत्य है किन्तु उसके लिए प्रामाणिक प्रयत्न भी करना चाहिए । आज तक अनेक सिद्ध पुरुषों ने, महात्माओं ने ऐसे अनेक प्रयोग किए हैं, और उसमें उन्होंने सफलता भी प्राप्त की है । आप भी सफलता प्राप्त कर सकते हैं । कलियुग की एक और विशेषता भी है । कलियुग के बारे में शास्त्रों, पुराण एवम् महापुरुषों ने सर्वसंमत स्वर से यह कहा है कि कलियुग जैसा अन्य कोई युग आनेवाला नहीं है । उसमें जीव यदि चाहे तो स्वयं का कल्याण ईश्वरकृपा की परम प्रसादी के रुप में पा सकता है । कलियुग में दोष या दूषणों की मात्रा बढ़ जाए तो उससे मुक्ति प्राप्त करने की दिशाएँ और अवसर भी अधिक प्राप्त होते हैं । अतः उस समय निराश होकर, धैर्य गवाँकर स्वयं को या अन्य को दोषी मानकर बैठे रहने की जरूरत नहीं है । ऐसी परिस्थिति में से भी मार्ग निकल सकता है । उसके सिवा हम कर भी क्या सकते है ॽ और कोई उपाय नहीं बचता । समय कितना ही प्रतिकूल क्यों न हो, हमे उस समय से ही काम लेना होता है । उस वक्त को परिवर्तन करने की शक्ति भी हममें होती है । उस समय को परिवर्तित करने की व्यक्तिगत या समष्टिगत साधना हम कर सकते हैं परन्तु उस समय के साथ रहकर ही संभव हो सकता है । उसी वातावरण में साँस लेने के अलावा हमारे पास कोई उपाय नहीं । वही हमारा प्रयास हमारे लिए घातक भी हो सकता है । यदि कलियुग में समय को परिवर्तित करने का प्रयास संजीवक बन जाए तो दुःखी होने के बजाय सुखी बनने की ओर ध्यान रखना चाहिए । यदि हम ऐसा कर पाए तो अनावश्यक और बेहद चिन्ता और भय रखने का कोई कारण नहीं है ।

प्रश्न – आपने जो भी कुछ कहा यह सब सुनने में तो आनंद आता है परन्तु वास्तविकता की धरती पर जब कदम रखते हैं तो हिम्मत टूट जाती है । ऐसा क्यों ॽ
उत्तर – आपको नाहिम्मत क्यों बनना चाहिए ॽ किस बात का भय है ॽ

प्रश्न - चारों ओर वातावरण ही जब इतना विरोधाभासी, विपरीत, प्रतिकूल या विषमय हो तो भयभीत होना स्वाभाविक है । कभी कभी तो ऐसी परिस्थिति में से मार्ग निकालना मुश्किल हो जाता है । ऐसा क्यों ॽ
उत्तर – ऐसे समय में, ऐसी परिस्थितिओं में भयभीत, नाहिम्मत होना सही नहीं है । यह अनुचित, अयोग्य होगा । विवेक, हिम्मत, धैर्य और निरंतर प्रयत्नों से प्रार्थना के माध्यम से यदि शांतिपूर्ण रूप से मार्ग ढूँढने का प्रयास करोगे तो तुरन्त ही ना सही, कभी ना कभी सफलता तो प्राप्त होगी । आज तक ऐसे कई महात्माओं ने, साधकों ने ऐसे ही सफलता प्राप्त की है ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

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Like a miser that longeth after gold, let thy heart pant after Him.
- Sri Ramkrishna

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