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दिया कब जलाओगे ?

उत्तराखंड की पुराणप्रसिद्ध दिव्य भूमि की यात्रा करने कई लोग आते हैं जिनमें जिज्ञासु, पर्यटनप्रेमी, धर्मश्रद्धालु, जीवनश्रेय की साधनावाले यात्रियों का समावेश होता है । विशेषतः वे लोग ग्रीष्म ऋतु में उस देवभूमि के दर्शन के लिए निकल पडते है । इनमें कतिपय ईश्वरप्रेमी व बैरागी भी होते है जिन्हें देखकर हमें खुशी होती है, जिनसे समागम करने की इच्छा होती है । ऐसा समागम अत्यधिक लाभकारक सिद्ध होता है अथवा तो इससे जीवनोपयोगी सामग्री भी मिल जाती है ।

ऐसे एक सुखद समागम की स्मृति हो आती है । मुझे एक बिल्कुल साधारण दीखनेवाले पुरुष की याद आती है जिनका असली नाम कोई नहीं जानता । उन्हें बाबाजी कहकर पुकारते थे । इनके समागम में आनेवाले को उनकी सामान्य देह में छीपी महान आत्मा का पता चल ही जाता । बदरीनाथ की यात्रा में उनका परिचय होने से वे मुझे मिलने ऋषिकेश के मेरे निवासस्थान पर आए । मैंने उनसे पूछा, ‘यह भूमि आपको कैसी लगी ?’

‘बहुत ही सुंदर,’ इन्होंने उत्तर दिया, ‘मैं अब हमेशा के लिए यहाँ रहना चाहता हूँ, घर वापस नहीं जाना है । मेरा वैराग्य पक्का है ।’

मैंने पूछा, ‘आपके वैराग्य का क्या कारण है ?’

उन्होंने बडी गंभीरता से कहना शुरू किया, ‘कारण बडा मामूली है ।’

‘मामूली ?’

‘हाँ, मामूली ही कह सकते है फिर भी उसने मेरी जिंदगी में क्रांति कर दी है ।’

‘आपके गुरु ?’

‘मैंने एक लडकी को गुरु माना है ।’

‘लडकी को ?’

‘हाँ, क्यों नहीं ? क्या लडकी को गुरु नहीं माना जा सकता ? जो हमारे जीवन में से मोहांधकार को दूर कर प्रकाश फैलाता है वही गुरु है । मैं तो ऐसा मानता हूँ । सुनिये :

‘मैं एक बडा वकील था – बुद्धिमान वकील । एक बार अटपटे मुकद्दमे के कागज लेकर घर जा रहा था कि रास्ते में एक मकान में से आवाज आई : ‘पिताजी, दिया जलाओ न ! अंधेरा छा गया है । दीया कब जलाओगे ?’

आवाज सुनकर मैं खडा रह गया । बाहर सब जगह अंधेरा हो गया था, मुझे मालूम था । इस बीच लडकी फिर बोली, ‘पिताजी, दिया जलाओ न ! दिया कब जलाओगे ?’

इन शब्दों के उत्तर में पिताने दिया जलाया । यह देख मैं आगे बढा । परंतु मेरे दिमाग में तूफान शुरू हुआ । मुझे महसूस हुआ कि मेरे जीवन में भी अंधेरा है । आज पर्यंत संसार के नश्वर पदार्थो के पीछे भागकर छलकपट करने में और असत्य एवं अनीति का आधार लेने में कोई कसर नहीं छोडी । साठ साल हुए, अब तो जीवन की संध्या हो गई । अब कहाँ तक छल-छद्म करूँ ? अब तो मुझे जागना चाहिए और जीवन में ज्ञान का, निर्मलता का, या परमात्म प्रेम का दिया जलाना चाहिए ।

उस लडकी के शब्दों ने मेरी जिन्दगी में क्रांति कर दी । मेरी आत्मा जाग उठी । मुझे लगा – शेष जीवन सत्कर्मो में, ईश्वर-स्मरण में और शांति में बिताना चाहिए । काल कब आएगा कौन जानता है ?  घर और संपत्ति की व्यवस्था करके थोडे ही समय में इस प्रदेश में रहने की इच्छा से मैंने गृहत्याग किया । वह लडकी मेरे जीवन को जगाने का काम कर गई ।’

उनकी बात सुनकर मुझे प्रसन्नता हुई । प्रसंग कितना भी साधारण क्यों न हो, पर वह मनुष्य के जीवन को कब परिवर्तित कर देगा, कहा नहीं जा सकता । बाबाजी संन्यासी न थे फिर भी आदर्श त्यागी थे । गंगातट पर रहकर बरसों तक जप-तप में मन लगाया, लोगों की मूक सेवा की और जीवन के पिछले सालों को अच्छी तरह बिताने के संतोष के साथ शरीर छोड जिया । अंधेरा तो सबके जीवन में है किन्तु इस तरह दिया कौन जलाता है ?

- श्री योगेश्वरजी

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