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संन्यास या त्याग आसान नहीं

त्याग या संन्यास कोई खेल नहीं है। त्याग करना या संन्यास धारण करना अपने आप में बहुत कठिन है। और उसे अच्छी तरह निभा पाना उससे भी ज्यादा कठिन है। आदमी स्वभावगत सामाजिक प्राणि है। उसे अकेला रहेना पसंद नहीं हैं। इसीलिए तो हमारे यहाँ सजा के तौर पर किसीको नजरकैद किया जाता है। आदमी को खानेपीने की, पढ़ने लिखने की, रहने की, अच्छे से अच्छी सुविधा क्यूँ न दी जाय, अकेला रहना उसके लिए मुश्किल है। अपने सगे सम्बन्धियों, रिश्तेदारों तथा दोस्तों के साथ घुम-फिरना उसे अच्छा लगता है। जैसे ही वो अपने काम से निवृत्त होता है तो उसे किसी के साथ बाहर जाने की या बातें करने की इच्छा होती है। उपनिषदकार ने ठीक ही कहा है की विधाताने इन्द्रियों को पहले से बहिर्मुख बनाई है इसलिए वह बाह्य विषयों तथा भोगपदार्थों में रत रहती है। उसके यह स्वाभाविक प्रवाह के विरुद्ध जाकर उसे अंतर्मुख करना कोई आसान काम थोडा है?

कभी कभी लोग आवेश में आकर कहने लगते हैं कि भाई अब तो मैं दुनिया से ऊब गया हूँ। वैराग्य हो गया है, अब तो सब कुछ छोड़कर चल देंगे। काशी में बसेंगे या वृन्दावन या हिमालय में निवास करेंगे। अब सच में संसार मिथ्या एवं कटु लगता हैं। उसमें सुख नहीं है, अब तो इसे छोड़ देने की ही ठानी है। तो यदि हम प्रत्युत्तर दें कि इस प्रकार सब चीज़ों का त्याग नहीं कर सकते। सब छोड़कर त्यागी बनकर ईश्वर परायण होने का कार्य टेढ़ी खीर है। तो वह फौरन कहने लगते हैं, “अब तो संसार में अच्छा ही नहीं लगता। इसलिए त्याग़ तो करना ही है। और जब भी संसार का त्याग करेंगे तब वीरता पूर्वक करेंगे और वह भी भगवान बुद्ध की तरह रात को नहीं, बल्कि दिन को – हमारे वैराग्य की खबर लोगों को भले ही हो जाय।” किंतु कथनी और करनी में बहुत फर्क है।

ऐसे ही एक सज्जन कुछ साल हुए हिमालय में आए थे। वे चार पांच महीने वहां रहे भी। किंतु जब उनकी श्रीमतीजी उनसे मिलने और उन्हें मनाने के लिए आई तो वे कुछ ही दिनों के गजग्राह के बाद अपने घर लौट गए। एक दूसरे सज्जन बम्बई में रसोई का काम करते थे। वे नौकरी छोड़कर हिमालय आए। रास्ते में ही हरद्वार में अपने कपडे और पैसे पंडों को दे दीए। जब वे देवप्रयाग में मेरे पास आए तो उनके पास केवल एक धोती थी, उन्होंने मुझसे कहा, “मैंने अब हिमालय रहने का निर्णय किया है। मुझे किसी महान गुरु का नाम और पता दीजिए। मुझे ऐसे सद्गुरु की सेवा करनी है और इस प्रकार शांति हासिल करने की इच्छा है। मैंने उत्तर दिया, “आपका उद्देश्य बड़ा अच्छा है। किंतु मेरी समज़ में ऐसा कोई समर्थ गुरु नहीं है जो आपको शांति दे सके। हां सेवा करवाने वाले संत बहुत मिल जायेंगे। आप संन्यास जीवन को पचा नहीं सकेंगे। आप का ज्ञान भी कच्चा है। इसलिए मेरी तो आपको यह सलाह है कि घर वापिस लौट जाइए और अपना काम धंधा फिर से शुरू कीजिए। वहां रहकर ही वैराग्य तथा प्रभुप्रेम को पुष्ट कीजिये।” परंतु उस सज्जन को मेरी बात पसंद नहीं आई। उन्होंने कहा, “मुझे वैराग्य हो गया है। तभी तो मैं इतनी दूर आया हूँ। अब मैं वापस नहीं जाउंगा।” एसा कहकर वे बिदा हुए। दूसरे दिन बड़े तड़के वे मेरे पास फिर आए और बोले, “मैंने बम्बई लौट जाने का निश्चय किया है। हो सके तो मुझे पांच रूपये की सहायता दीजिए। मैं अभी बस से ऋषीकेश जाना चाहता हूँ।” “क्यों? तुम तो यहीं रहना चाहते थे न” मैंने पुछा, “हां यही तो सोच रहा था पर मेरे लिए यह वातावरण अनुकूल न होगा। मेरे लिए तो बम्बई ही अच्छा है। मेरे सेठ भी तो बड़े सज्जन हैं। मुझे देखकर बाग़बाग़ हो जायेंगे और फिर नौकरी पर रख लेंगे“ उन्होंने उत्तर दिया। मैंने उनको ढ़ाढस बंधाया और हिम्मत दिलाई। कार्य करते हुए साधना की पद्धति दिखाई और कहा, “तुम्हारा निर्णय बहुत अच्छा है। तुम धन्य हो जो अपनी भूल को सुधार रहे हो। इसीमें बुद्धिमानी है और वीरता भी इसीमें है। मेरे पास तो इतने रूपये नहीं किंतु मैं ऐसे साधु परुष का परिचय देता हूँ जहां से तुम्हें सहायता मिल जायगी।” और वे बिदा हुए।

एक तीसरे सज्जन अपने स्वजन स्नेहियों से अंतिम बिदा लेकर वृन्दाबन निवास करने के लिए निकल पड़े और वृन्दाबन में किसी संतपुरुष के पास रहने लगे। किंतु उन्हें वैराग्य पसंद नहीं आया इसलिए कुटुम्बियों को ख़बर दी कि अब छ महीने यहाँ रहने का इरादा है। और बाद में जब एकांत जीवन से तादात्म्य स्थापित नहीं हुआ तब दो महीने में ही घर लौट गए। वे भली भांति समज गए कि एकांत में रहकर ईश्वर परायण होना कोई खेल नहीं। शुरू शुरू में तो ख़ुशी होती है पर बाद में मज़ा कीराकीरा हो जाता है और समय काटे नहीं कटता। जीवन कभी कभी हेतुरहित एवं बोज़ प्रतीत होने लगता है। इसलिए घरबार छोड़ने से पहले मनुष्य को पर्याप्त तैयारियां कर लेनी चाहिए। याद रखिये कि जब तक दिल में प्रभु का प्रबल प्रेम प्रकट नहीं होता तब तक बाहर के त्याग का कोई मूल्य नहीं। जब तक गृहस्थाश्रम, धन, स्वजन तथा शरीर के सुख की लालसा प्रबल है, त्याग का टिक पाना मुश्किल है। क्योंकि लालसा को पूरा करने का अवसर प्राप्त होते ही मनुष्य का मन विचलित हो जाएगा और त्याग क्षणिक बनकर रह जायगा। इससे बढ़िया यह होगा कि वह अपने मन को पहले तैयार कर ले। वह तत्-सम्बंधित साधन भी प्राप्त कर सकता है और चारित्र्य का निर्माण भी कर सकता है। संसार में रहकर पूरी तैयारी करने के बाद यदि त्याग का आसरा लिया जाय तो वह हितकर हो जायगा और उसमें पतन का डर नहीं रहेगा।

यह भी याद रखना चाहिए कि सब मनुष्यों को बाहर का त्याग करने, संन्यासी बनने की आवश्यकता नहीं। परंतु आचार, व्यवहार और मन को शुद्ध करके निर्मल एवं निरहंकार बनकर सच्चा मानव बनने की तथा प्रभुपरायण होकर जीवन को शांतिमय, पूर्ण एवं मुक्त बनाने की आवश्यकता सबको है। उसकी पूर्ती के लिए यह आवश्यक नहीं कि घरबार को छोड़कर वन या पर्वत में रहा जाय। हरेक मनुष्य संन्यासी बन जाय तो यह न तो उसके लिए और न ही समाज के लिए कल्याणकारी हो सकता है।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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