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एक युवती का परिचय

संसार के सभी रूपो में ईश्वर के दर्शन करना कोई आसान बात नहीं है । जब तक मन बुरे विचार, बुरे संस्कार व विषयासक्ति से भरा होता है तब तक उसकी दृष्टि निर्मल नहीं हो सकती । मन के निर्मल होने से उसकी दृष्टि भी निर्मल होती है, मानो उसे दिव्य दृष्टि की प्राप्ति होती है । एक बार जिसे दिव्य दृष्टि मिल जाती है उसे सारे संसार में ईश्वर की परम चेतना के दर्शन होते है । फिर वो जिस किसको भी मिलता है, उसे परमात्मा का अंश समझता है । कई शास्त्र व संतपुरुषोने ईश्वर के एसे अपरोक्ष अनुभव करने की बात बतायी है । साधक उस अवस्था को प्राप्त करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है, ताकि उसके अज्ञान के आवरण दूर हो जायें ।

मैंने मन को पवित्र और निर्मल करने के लिए ईश्वर को प्रार्थना करना प्रारंभ किया और साथ में, जो भी व्यक्ति व वस्तु के संपर्क में आता उसमें परमात्मा की चेतना के दर्शन करने का अभ्यास शुरु किया । ईससे मेरी दृष्टि में काफि बदलाव आया । सभी में दिव्यता का दर्शन सहज हो गया । जब भी किसी स्त्री को देखता तो उसे माँ जगदबा का स्वरूप समझकर मन-ही-मन प्रणाम करता । संसार में सर्वत्र व्याप्त जगदंबा के साकार स्वरूप को देखने के लिए मन तरसने लगा ।

उन दिनों एक ओर घटना घटी । मेरे जीवन में एक युवती का प्रवेश हुआ । यूँ कहो की जगदंबा ने उस कुमारी के रुप में मेरे जीवन में प्रवेश किया । उस वक्त मेरी उम्र चौदह साल की थी । मैं पढने में होशियार था । मेरी पहचान एक समझदार व अच्छे विद्यार्थीकी थी । हमारी संस्था की बगल में तीन मकान थे, उनमें से एक मकान में ब्राह्मण परिवार रहता था । संस्था के गृहपति की आज्ञा से उस परिवार के छोटे लडके और लड़की को पढाने की जिम्मेवारी मुझे सौंपी गई । एसा नहीं था कि संस्था में ओर तेजस्वी विद्यार्थी नहीं थे जो उन्हें पढा सके, मगर ईश्वर की योजना कुछ निराली थी । जीवन धडतर के आवश्यक पाठ पढाने के लिए उसने मुझे पसंद किया था । लडके की उम्र लडकी से कम थी । लडका अनियमित रूप से पढने के लिए बैठता, मगर पढने में तेज न होने की वजह से लडकी को अक्सर मेरे मार्गदर्शन की जरूरत पडती । लडकी की उम्र उस वक्त तकरीबन दस साल की होगी । पाठशाला में अंग्रेजी का विषय उसे नया नया सिखाया जाता था । जब भी उसे पढने में दिक्कत होती तब वो हमारी संस्था में मार्गदर्शन के लिए आती । बाद में उसे ट्यूशन देने के लिए मुझे उनके घर जाना पडता । उस कुमारी को पढाने का कार्य करीब चार साल तक जारी रहा । उनके बडे मकान में पढने के लिए अलायदे कमरे की व्यवस्था थी ।

लडकी का शारिरीक स्वास्थ्य अच्छा था । उसकी उम्र के हिसाब से उसका दिमाग तेज था । वो दिखने में भी अच्छी थी । अच्छे कपडे पहनना और सजना-सँवरना उसे अच्छा लगता था । उम्र बढने के साथ उसका ये शौक बढता गया और पढाई में उसकी दिलचस्पी कम होती गई । मैं जब उसे पढाने के लिए जाता तो वो आवश्यक अभ्यास खत्म होने पर तरह-तरह की बातें करती । शाम को संस्था में साढे सात बजे सायं प्रार्थना होती थी । उसके बाद मुझे उसके घर पढाने जाना पडता था । मुझे बुलाने के वो खुद प्रार्थना के बाद आती । लडकी के मातापिता मेरे जीवन व मेरी बौद्धिक प्रतिभा के अच्छी तरह से परिचित थे । मुझे देखकर वो प्रसन्न होते और प्यार बरसाते ।

उस लडकी से प्रथम मुलाकात कब हुई वो मुझे कुछकुछ याद है । एक दिन मैं संस्था के मंदिर में बैठकर स्कुल के हस्तलिखित मासिक 'चेतना' के मुखपृष्ठ को मैं सजा रहा था । तब वो मंदिर में आयी और उसने जोर से मंदिर की घंटी बजायी । घंटी बजने से मेरा ध्यानभंग हुआ और मैंने सर उठाकर देखा तो उन्हें भगवान की मूर्ति के सामने खडा पाया । फिर मैं अपने काम में जुट गया और वो थोडी देर में वहाँ से चल पडी । सुबह मंदिर में दर्शन के लिए आना लडकी का नित्यक्रम था ।

कुछ दिनों के बाद वो संस्था में मुझे ढूँढती हुई आयी और मुझसे थोडा अंग्रेजी पढके चली गई । एक दिन गृहपति ने मुझे बताया कि उसी लडकी को मुझे अभ्यास में सहायता करनी है । मंदिर की उस प्रथम मुलाकात के बाद ईस तरह वो परिचय बढता ही चला ।

जैसे की मैंने पहले बताया, लडकी का मन अभ्यास में कम और बातों में ज्यादा था । एक दिन शाम ढले वो मुझे अभ्यास के लिए बुलाने आयी । घर जाके पढाना अभी शुरू ही कीया था की उसके मातापिता चौपाटी पर घुमने के लिए निकल पडे । उसका छोटा भाई बगल के कमरे में जाके लेट गया । अब कमरे में हम अकेले थे । लडकी ने किताब एक ओर रख दी और मुझे कोई दिलचस्प कहानी सुनाने को कहा । एक के बाद एक, ईस तरह बातें चलती रही । एकाद घंटे के बाद जब उसके मातापिता लौटे तो उनकी आहट सुनकर लडकी ने फट से गणित की किताब मुझे थमा दी और कहा ये दाखिला बड़ा मुश्किल है, मुझे सिखाने के बाद ही जाओ । उसके मातापिता ने जब ये देखा की मेरा ट्यूशन अभी खत्म नहीं हुआ है और उसकी वजह उनकी लडकी थी तो मुझे विलंबित करने के उन्हों ने लडकी को झाडा । लडकीने चतुराई से उत्तर दिया, ‘क्या करें, दाखिला ईतना मुश्किल था की जल्दी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था !’ उसके पिताश्री ने मुझे अगले दिन सुबह आकर उसे पूर्ण करने की अनुमति दी और मैं वहाँ से निकल पाया । दूसरे दिन सुबह मैंने उस कूटप्रश्न को पूर्ण किया ।

एसी छुटमुट घटनाएँ बाद में भी होती रही । उस वक्त मेरी उम्र करीबन सोलह साल की होगी । उससे मुझे दुःख होता था और उसकी वजह लडकी को अपने मातापिता को दिये जानेवाले जुठे उत्तर थे । जो चतुराई का उपयोग सत्य को छिपाने के लिए किया जाय वो चतुराई का क्या अर्थ ? उसका असत्य-भाषण मुझे झंझोलता पर हालात से समझौता किये बिना ओर कोई चारा न था । ये मेरी खुशकिस्मती थी की सदगुणी जीवन के प्रति मैं पूर्णतया जाग्रत था ।

 

Today's Quote

There is no pillow so soft as a clear conscience.
- French Proverb

prabhu-handwriting

Shri Yogeshwarji : Canada - 1 Shri Yogeshwarji : Canada - 1
Lecture given at Ontario, Canada during Yogeshwarjis tour of North America in 1981.
Shri Yogeshwarji : Canada - 2 Shri Yogeshwarji : Canada - 2
Lecture given at Ontario, Canada during Yogeshwarjis tour of North America in 1981.
 Shri Yogeshwarji : Los Angeles, CA Shri Yogeshwarji : Los Angeles, CA
Lecture given at Los Angeles, CA during Yogeshwarji's tour of North America in 1981 with Maa Sarveshwari.
Darshnamrut : Maa Darshnamrut : Maa
The video shows a day in Maa Sarveshwaris daily routine at Swargarohan.
Arogya Yatra : Maa Arogya Yatra : Maa
Daily routine of Maa Sarveshwari which includes 15 minutes Shirsasna, other asanas and pranam etc.
Rasamrut 1 : Maa Rasamrut 1 : Maa
A glimpse in the life of Maa Sarveshwari and activities at Swargarohan
Rasamrut 2 : Maa Rasamrut 2 : Maa
Happenings at Swargarohan when Maa Sarveshwari is present.
Amarnath Stuti Amarnath Stuti
Album: Vande Sadashivam; Lyrics: Shri Yogeshwarji; Music: Ashit Desai; Voice: Ashit, Hema and Aalap Desai
Shiv Stuti Shiv Stuti
Album : Vande Sadashivam; Lyrics: Shri Yogeshwarji, Music: Ashit Desai; Voice: Ashit, Hema and Aalap Desai
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