Sun, Jan 17, 2021

लग्न की समस्या - 2

जिसे अपनी जिन्दगी में जल्द से जल्द आत्मोन्नति करने की अभिलाषा है, उन्हें शादी के बंधन में फँसना नहीं चाहिए, ये मेरी नम्र राय है । शादी करने से आदमी संसार के अनेकविध प्रश्नो में उलझ जाता है । उसे तो अपना संपूर्ण ध्यान सांसारिक प्रश्नो से दूर रहने में और विषय-वासना को जीतने में लगाना चाहिए । जो विनाशशील है, परिवर्तनशील है, उसे हासिल करने से क्या फायदा ? उसे पाने से नित्य सुख, नित्य शांति या मुक्ति थोडी मिलेगी ? जीवन में अगर कुछ पाना है तो वो ईश्वर क्यूँ नहीं ? समझदार आदमी को ईश्वर के चरणों में प्रीति करनी चाहिए, उसके साथ अपनी डोर बाँधनी चाहिए । दिल में ईश्वर को पाने की चाह लिए उसे ईश्वर के साक्षात्कार के लिए प्रयत्न करने चाहिए । ईश्वर के अलावा इस संसार में ऐसा क्या है जिसके लिए आदमी अपना सब कुछ न्यौछावर कर दे ? ईश्वर ने यह संसार की रचना की है, ईसलिए उससे अधिक सौंदर्यवान, अधिक शक्तिवान तो कुछ हो ही नहीं सकता । जो आदमी संसार के स्वामी ईश्वर को छोडकर संसार के पदार्थो में आसक्ति कर बैठता है वो ईश्वरप्राप्ति की साधना में सफल कैसे हो पायेगा ? शादी करके गृहस्थ जीवन बितानेवाले लोगों को भी चाहिए की वो अपने मन को शुद्ध औऱ पवित्र बनायें रखे । और जिसने वैवाहिक जीवन में प्रवेश न किया हो उसे तो अपने जीवन की हर क्षण को परमात्मा के पास पहूँचने की साधना में व्यतीत करनी चाहिए । जीवन अतिशय मूल्यवान है और अनिश्चित तथा चंचल भी । कोई ये नहीं जानता कि कब उस पर पर्दा गिरनेवाला है । इसलिए जीवन में जो भी वक्त मिला है, उसका सदुपयोग करके, इस सु-अवसर का पूरी तरह से फायदा उठाना है ।

मेरी विचारधाराएँ उस वक्त कुछ ऐसी थी और मैं उनसे पूर्णतया प्रभावित हो चुका था । ब्रह्मचर्य की मूर्ति समान स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, शंकराचार्य तथा ज्ञानेश्वर महाराज की प्रतिमा मेरी मन की आंखो के सामने नाच रही थी । वे मेरी प्रेरणा के स्तोत्र बने बैठे थे । उनके अदभूत जीवन का विचार करके, उससे प्रोत्साहित होकर मैं उनके नक्शेकदम पर चलने की कोशिश कर रहा था । ब्रह्मचर्य का पालन करके उनके जैसा पवित्र और आध्यात्मिक जीवन बिताने की मह्त्वकांक्षा का मुझमें उदय हुआ था । श्री रामकृष्णदेव, स्वामी रामतीर्थ तथा स्वामी श्रद्धानंद जैसी विभूतियों ने संयमी जीवन का महिमा बताया था । श्री रामकृष्णदेव ने कामिनी और कांचन से दूर रहने की बात दोहरायी थी और अपनी निजी जिन्दगी में उसे सिद्ध करने के लिए कई प्रयोग किये थे, इससे मैं ज्ञात था । उनके अनुबोधित मार्ग पर चलकर माँ जगदंबा का साक्षात्कार करने की मेरी प्रबल ईच्छा थी । वैवाहिक जीवन में प्रवेश नहीं करने के पीछे ईश्वर की अनंत शक्ति में मेरा दृढ विश्वास था और सिर्फ ईश्वर की करूणा से मैं अपनी मंझिल तक पहूँचने में कामियाब हुआ ।

मैंने गाँव के लोगों को अपनी सोच बताने की कई बार कोशिश की । मेरी आध्यात्मिक भूमिका से अनजान लोगों ने मुझे शादी के लिए राजी करने की कई दफा कोशिश की मगर वो नाकामियाब रही । मुझे एक प्रसंग याद पड़ता है । गाँव के बुझर्ग मुझे समझाने आये थे, वो कहने लगे की 'आप अपने पिता के एकमात्र संतान हो । अगर आप शादी नहीं करोगे तो फिर आपका वंश कैसे चलेगा ? पितृओ की गति कैसे होगी ? आपका श्राद्ध कौन करेगा ? ईसलिए मेरा मानो तो शादी कर लो, औऱ अगर शादी की जल्दी न हो तो अभी सिर्फ ब्याह कर लो ।'

मुझे लगा की उनकी सोच बड़ी पुख्ता और मंझली हुई है फिर भी मैंने शांति से उत्तर दिया, 'मुझे वंश की फिकर नहीं है । शंकराचार्य और ज्ञानेश्वर जैसे महापुरुष को आज हजारों लोग याद करते है । उनका वंश इस तरह कायम है । ईश्वर-प्राप्त महापुरुष अपने कर्मो से जनसमुदाय को प्रेरणा प्रदान करते है और इस तरह अपना नाम अमर करते है । उन्हें अपना नाम कायम रखने के लिए कोई पुत्र या पुत्री की आवश्यकता नहीं । ब्रह्माजी का वंश तो अपने आप चलता रहेगा क्यूँकि संसार में मेरे जैसे एक-दो व्यक्ति के शादी न करने से क्या ओर लोग थोडे शादी से मुँह मोडनेवाले है ? और रही बात मृत्यु पश्चात गति की तो ये बताया गया है कि प्रभुभक्तों और महापुरुषों के मातापिता और उनका पूरा खानदान उत्तम गति को प्राप्त करता है । प्रसिद्ध भक्तिकवि नरसिंह महेता ने अपने विख्यात पद में इसे दोहराया है । इसलिए मुझे अपने पितृओं की गति के लिए शादी करने की आवश्यकता नहीं है । और अगर बात मेरा श्राद्ध करने की है तो उसकी मुझे फिकर नहीं है । मेरी शांति और गति के लिए मुझे किसी और के सहारे की जरूरत नहीं पडेगी । प्रबल पुरुषार्थ से अपने वर्तमान जीवन में ही मैं ईश्वर का साक्षात्कार करके परम गति को प्राप्त कर लूँगा ।'

मेरा प्रत्युत्तर सुनके बुझर्ग थोडे सोच में पड गये । शायद उन्हें मेरे ऐसे उत्तर की अपेक्षा नहीं थी । फिर भी जिस तरह एक सैनिक युद्धभूमि में अपने सभी शस्त्रों का प्रयोग करने के बाद ही पराजय स्वीकार करता है उस तरह उन्होंने नये वाग्बाणों का प्रयोग किया । वो कहने लगे, 'हमारे ऋषिमुनि भी वैवाहिक जीवन बीताते थे, और हमारे शास्त्रों मे ब्रह्मचर्याश्रम के बाद गृहस्थाश्रम की सूचना दी गई है ।'

मैंने कहा, 'आपकी बात ठीक है मगर ये सूचना साधारण मनुष्यों ते लिए है । जिसका मन ईश्वर के साक्षात्कार के लिए तरस रहा हो उसके लिए इसका आग्रह रखना ठीक नहीं है । शास्त्रों में तो बचपन से ही ईश्वरस्मरण औऱ त्याग की बातें कही गई है । और कुछ ऋषि शादीशुदा थे उसका ये मतलब नहीं की सबको शादी करनी चाहिए । हरएक आदमी को अपनी रुचि और मति अनुसार चलने की संमति होनी चाहिए ।'

उनकी सभी दलीलों का मैंने सक्षम प्रत्युत्तर दिया । जब उनके पास और कोई दलील नहीं रही तब वो निराश होकर कहने लगे, 'आप अब भले मना कर रहे हो, मगर बाद में जब आपका मन परिवर्तन होगा तब कोई कन्या शादी-लायक नहीं मिलेगी । तब क्या करोगे ?'

मैंने कहा, 'उसकी चिंता आप मुझ पर छोड दो । मेरा निर्णय दृढ है ।'

जब जाने के लिए वो खडे हुए तो मेरे विचारों के लिए उन्होंने मुझे शाबाशी दी । मुझे लगा कि मेरे विचारों को वो कुछ हद तक समझ पायें । शादी के लिए मुझे समझानेवाले वो ना तो पहले आदमी थे ना ही आखिरी । ये सिलसिला उनके बाद भी जारी रहा मगर मेरे विचारों में कोई बदलाव नहीं आया । गाँव के एक बूझर्ग ने तो सन १९४४ तक मेरी सोच में बदलाव आने की उम्मीद रखी थी मगर उनकी आशा पर भी पानी फिर गया । हाँ, गाँव में सोमाभाई व्यास नामक एक सज्जन पुरुष निवास करते थे । उन्हें मुझ पर प्यार था । जब भी वो मेरे घर आते थे, तो वो माताजी को कहते, 'अगर आप ईन्हें (मुझे) संसार में डाल दो, तब भी ये माया में नही फँसेगा । मैं इसको अच्छी से तरह पहचानता हूँ । मेरी मानो तो ये ब्रह्मज्ञानी है और आपका कुलदीपक है, वो संसार में आपका नाम रोशन करेगा ।' शायद मेरे विचारों और भावो का उन्हें कुछ अंदाजा था ।  

 

Today's Quote

You can get everything you want if you help enough others get what they want.
- Zig Ziglar

prabhu-handwriting

We use cookies

We use cookies on our website. Some of them are essential for the operation of the site, while others help us to improve this site and the user experience (tracking cookies). You can decide for yourself whether you want to allow cookies or not. Please note that if you reject them, you may not be able to use all the functionalities of the site.