प्रश्न – केवल ज्ञान से शांति मिल सकती है क्या ॽ ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ऐसा मानने से ही मुक्ति नहीं मिल जाती क्या ॽ
उत्तर – ज्ञान केवल पढ़ने से मिला हो मगर आचार में अनुवादित न हुआ हो तो इससे शांति नहीं मिल सकती । अगर आप मान लें की आप ब्रह्म है फिर भी आपके अंदर काम-क्रोध, अहंता-ममता और विषयों की आसक्ति का नाश नहीं हुआ तो आपको मुक्ति कहाँ से मिलेगी ॽ आपको दुर्गुणों से उपर उठना है, विषय और वासना के बंधनों से मुक्त होना है, तभी आपको मुक्ति का अनुभव होगा और आप ईश्वर तुल्य बन सकेंगे । केवल अपने आपको ईश्वर मानने से ईश्वर तुल्य नहीं बना जाता । इसके लिए आपको ईश्वरत्व यानि ईश्वर जैसे गुणों से संपन्न होना पड़ेगा ।
पाकशाश्त्र की कई किताबें बाज़ार में उपलब्ध है, जिसमें स्वादिष्ट व्यंजन बनाने की विधि का वर्णन होता है । मगर सिर्फ उसे पढ़ने से क्या भूख का शमन होता है ॽ तृप्ति मिलती है ॽ ड़कार आते हैं ॽ नहीं न । इसके लिए तो आपको रसोईघर में जाकर खाना बनाना पड़ेगा और उसे खाना पड़ेगा । अगर कोई व्याधि हुई हैं तो चरक, सुश्रुत या नागार्जुन जैसे औषधाचार्यों के ग्रंथ पढ़ने से दर्द थोड़ा चला जायेगा ॽ इसके लिए तो आपको ग्रंथो में जैसे बताया गया है, औषधियाँ लेकर उपचार करना पड़ेगा । ज्ञान का भी बिल्कुल वैसा है । सदगुरु द्वारा जो ज्ञान आपको दिया जाता है, या किसी ग्रंथविशेष से आपको जो ज्ञान मिलता है, उसे प्राप्त करने के पश्चात आपको उसे आचरण में अनुवादित करना होगा । ब्रह्म-तत्व का अनुभव करने के लिए आपको ध्यान, धारणा या भक्ति का आधार लेना होगा । इसके अलावा आपको शांति और मुक्ति नहीं मिलेगी ।
बहोत सारा अध्ययन करके भी क्या फायदा ॽ जितना जानते हो उसे आचरण में उतारने का प्रयास करो । अपनी गलतीओं को ढूँढो और सुधारो । जप और ध्यान में लगे रहो । तभी आप ईश्वर के करीब पहूँच सकोगे । याद रखो की ज्ञान का अभिमान साधनापथ पर सबसे बड़ा विघ्न है । सबकुछ छोडना आसान है मगर इसे छोडना अत्यंत कठिन है । अहं साधक को बहुत परेशान करता है । आप जप करने बैठेंगे तो आपका अहं कहेगा कि मैं तो ब्रह्म हूँ, मुझे जप करने की क्या आवश्यकता ॽ ध्यान करने बैठेंगे तो कहेगा, मैं स्वयं परमात्म-स्वरूप हूँ फिर मुझे किसीका ध्यान करूने की क्या आवश्यकता ॽ अहं के कारण आप ध्यान, जप, तप, कीर्तन ठीक तरह से नहीं कर पायेंगे । आपकी वासना और विषयासक्ति बरकरार रहेगी । क्या ब्रह्म आपकी तरह निर्बल, अल्प, कामी, क्रोधी या अभिमानी है ॽ ज्ञान के ऐसे मिथ्याभिमान से आपको बचना होगा । वरना ज्ञान आपको पार लगाने के बजाय डूबो देगा, मुक्त करने के बजाय बंधन में डाल देगा । आप जो भी कर्म करते हैं, इसका फल आपको अवश्य मिलता है । इसलिए केवल विचार का आधार लेकर बैठे ना रहें, उसे आचार में अनुवादित करें और अनुभवसिद्ध ज्ञानी बनें ।
प्रश्न – ज्ञानी या भक्त के एक-दो महत्वपूर्ण लक्षण बताएंगे आप ॽ
उत्तर – मेरे मतानुसार ज्ञानी या भक्त का सबसे महत्वपूर्ण लक्षण है चित्त की स्थिरता । अनेक प्रक्रियाएँ करने के बाद स्थिरता पैदा होती है । जब काम, क्रोध, अभिमान दूर हो जाते हैं और प्रेम, दया, तथा नम्रता का प्रादुर्भाव होता है तब ऐसी स्थिरता प्राप्त होती है । ऐसा स्थिर चित्तवाला साधक सुख-दुःख, निंदा-स्तुति और भले-बुरे प्रसंगों में शांत रह सकता है । गीता में जिन्हें दैवी संपत्ति के नाम से अभिहित किया गया है उसकी प्राप्ति के बिना यह स्थिरता नहीं आ सकती । मन की स्थिरता के अभाव में ध्यान, निदिध्यासन, उपासना या अखंड जप - इनमें से कुछ भी नहीं किया जा सकता । जैसे पवन रहित स्थान में दीपक नहीं हिलता ठीक ऐसी अवस्था स्थिरताप्राप्त पुरूष के मन की होती है ।
इसके पश्चात दूसरा महत्वपूर्ण लक्षण है समता । भक्त या ज्ञानी सर्वत्र परमात्मा का दर्शन करता है । केवल मनुष्यों में ही नहीं, जड, चेतन सभी पशु-पक्षियों में ईश्वर को ही देखता है । विभिन्न नाम व रूप के भीतर अंतरात्मा के रूप में जो परमात्मा विराजित है उनका दर्शन वह करता है । इसलिए उन में रागद्वेष या भेद-भाव पैदा नहीं होते । भेदभाव होने से ही किसी के प्रति राग तो किसी के प्रति द्वेष उत्त्पन्न होता है । जहाँ एक ही ईश्वर विविध भेष में सुशोभित हो रहा है वहाँ फिर किसके प्रति राग और किसके प्रति द्वेष उत्पन्न होगा ॽ किसीसे मोहित होने का प्रश्न ही कहाँ पैदा होता है ॽ स्त्री के हाड-चाम में वह आसक्त नहीं होता अपितु उसमें निहित शक्तिरूपी परमात्मा को निरखकर वह उससे अभेद सिद्ध करता है । ज्ञानी या भक्त, ब्राह्मण, हाथी, गाय, कुत्ते या चांडाल – सब में ईश्वरी आलोक को देखता है ।
तीसरा लक्षण है मुक्ति । ईश्वर-दर्शन करने के कारण भक्त हमेशा के लिए गुण या कर्म के विकार एवं बंधन से मुक्त हो जाता है । यह सब कुछ परमात्मा का ही है, सब कुछ परमात्मा ही है । इस भाव में स्थिति होने से उसकी अहंता और ममता मिट जाती है । ज्ञानी भी आत्मासाक्षात्कार करके सर्वत्र आत्मा का दर्शन करता है । वह भी अहंता-ममता से और प्रकृति के गुणधर्मों से मुक्त होता है । इस मुक्ति से ही परमानंद, सनातन शांति या धन्यता की अनुभूति होती है । इसे ही परमपद कहते हैं ।
- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

