प्रश्न – कृपया मुक्ति के बारे में सिंहावलोकन प्रस्तुत करेंगे ॽ
उत्तर – मुक्ति का वास्तविक स्वरूप जानने के लिए उनको तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है । जिसे मुक्ति की कामना है वह बंधन में अवश्य ही होना चाहिए क्योंकि बंधन के अभाव में मुक्ति की जरूरत कैसे पड़ सकती है ॽ इसलिए सोचना चाहिए कि मनुष्य किससे बद्ध हुआ है ।
१. प्रथम बंधन तो दुर्वृत्तिओं का है जिसे गीता ने आसुरी संपत्ति की संज्ञा दी है । मनुष्य में काम व क्रोध है, वे उन्हें बाँधते हैं । मद, अभिमान, अज्ञान, कठोरता या निर्दयता, दंभ, स्वार्थ – ये सब बंधन मनुष्य को चंगुल में फंसाते है । इनसे मुक्त होकर नम्रता, प्रेम, मैत्री, दया, क्षमा, परोपकार, निःस्वार्थ, सत्य, अहिंसा आदि सद्गुणों से प्रतिष्ठित होना, यह प्रथम प्रकार की मुक्ति है । व्यवहार में रहकर इन वस्तुओं को सुचारु रूप से सिद्ध कर सकते हैं ।
२. दूसरा बंधन है अहंता और ममता, जिससे मनुष्य बंधा हुआ है । घर-गृहस्थी, स्त्री-पुत्र, धन-प्रतिष्ठा, संपत्ति आदि में ममता होने से मनुष्य उनके संयोग एवं वियोग से सुखी व दुःखी बनता है, हर्ष एवं शोक प्राप्त करता है । वह मानसिक स्थिरता नहीं पा सकता । मन का संतुलन प्राप्त करने के लिए हमें इस ममता से छुटकारा पाना है । इसका यह मतलब नहीं हैं कि हमें व्यवहार या पदार्थों का त्याग करना है । इन्हें छोड देना हमारी इच्छा की बात है किंतु उनके बीच रहकर हमें उनके आघात-प्रत्याघात से पर रहना सीखना है । जो कुछ भी है वह ईश्वर का है । यह विचार मन में यदि दृढ हो जाय तो ममत्व बुद्धि टल सकती है ।
इसके साथ ही हमे अहंकार के बंधन को तोड़ना है । अहंता अपने तक ही सीमित है जबकि ममता में बाह्य पदार्थो की भी आसक्ति है । मनुष्य शरीर में आसक्त होकर उसे ही अपनी आत्मा समझ लेता है इसलिये वह जड़ बनता है और शरीर के लिये ही जीता है और मरता है । सोचने से मनुष्य को ज्ञात होता है कि जो अहंता का वाचक है वह तो शरीर के भीतर ही है और वह जड न होकर चेतन है । अतः उसके लिए ही जीना और केवल उसे ही प्राप्त करना चाहिए । यही परम पुरुषार्थ है । इसके द्वारा ही परम शांति, परमानंद, निर्वाण मिल सकता है । इस चेतन आत्मा को ब्रह्म आदि संज्ञा से अभिहित किया गया है । जब यह निश्चित हो गया कि वह शरीर के अंदर है तब उसकी अनुभूति के लिये मनुष्य तड़पता है, तरसता है और सूक्ष्म मन से-सूक्ष्म मनोवृत्ति से मनुष्य उसका दर्शन करता है । यदि प्रेम-भाव से उसे प्राप्त करने की कामना है तो उसके लिए भक्ति मार्ग है जिसके द्वारा यही चेतन तत्त्व आपके आगे साकार रूप में उपस्थित होता है क्योंकि वे सर्व समर्थ है । आत्म-साक्षात्कार के पश्चात् चराचर में सर्वत्र आत्मा की अनुभूति होती है, भेदभाव दूर होते हैं, भय मिट जाता है और परम शांति प्राप्त होती है । यही सच्ची शांति है । बिना इसके मनुष्य जिसे शांति मान लेता है, वह सच्ची शांति नहीं है । उदाहरणार्थ कोई निरक्षर मनुष्य यह कहे कि पढ़ने से क्या फायदा ॽ बिना पढ़े-लिखे ही हमारा जीवन सुचारु रुप से चलता है तो उसके कथन के बारे में क्या समझा जाय ॽ वह मूढ दशा की वाणी है इसलिये उस पर ध्यान देना उचित नहीं है । हम पढ़ने के फायदे अच्छी तरह से जानते है । इसी तरह जो केवल सदाचारी जीवन या सांसारिक सुखोपभोग से तृप्त है वह मूढ दशा में है । जीवन के यथार्थ विकास का या मानव शरीर के संभवित पुरुषार्थ का उसे खयाल नहीं है । इसलिए उसके कथन की ओर भी ध्यान देने की जरूरत नहीं है । जो जीवनविकास की परिपूर्णता को भली भांति जानता है वह किसी प्राथमिक विकास के पश्चात् उसे इतिकर्तव्यता नहीं मान लेगा । यह तो मिथ्या संतोष है इसलिए वह तो जीवन के परिपूर्ण विकास को हासिल करके ही रहेगा ।
३. इन दो प्रकार की मुक्ति मिलने के बाद तीसरी मुक्ति मिल सकती है । क्योंकि तीसरी मुक्ति इन दोनों का परिपक्व फल है । हम देखते हैं कि मनुष्य ज्ञान, शक्ति और अवस्था से बंधा हुआ है । कल क्या होनेवाला है इसका उसे पता नहीं । उसकी शक्ति स्वल्प है । अभीष्ट कार्य करने में वह समर्थ नहीं है । व्याधि, वार्धक्य, मृत्यु आदि अवस्था के सामने वह विवश है । इस मजबुरी से मुक्त होकर मनुष्य परमात्मा की भांति सर्वसमर्थ, सनातन एवं सर्वव्यापक बन सकता है । वह त्रिकालज्ञ भी हो सकता है । यह मुक्ति अत्यंत उच्च कोटि की है और वह किसी विरले को ही मिल सकती है । अक्सर प्रथम दो प्रकार की मुक्ति से ही मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है । परमानंद के लिये प्रथम दो प्रकार की मुक्ति पर्याप्त है ।
इस प्रकार मानव पशुता को दूर करके सच्चा मानव बनता है, फिर देव तुल्य बनता है और अंततोगत्वा ईश्वर बन जाता है । मानव जीवन का इस तरह क्रमिक विकास होता रहता है यह विकास शरीर द्वारा ही और शरीर में रहकर ही करना है । देहत्याग करने के पश्चात् ही मुक्ति मिलेगी ऐसा नहीं है । मुक्ति का आनंद शरीर त्यागने से पूर्व ही प्राप्त करना है ।
- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

