योगविद्या में दिलचस्पी लेनेवाले लोग केवल भारत में ही नहीं किन्तु विदेशों में भी मिलते है । इनमें से कुछ उच्च कोटि की जिज्ञासा से प्रेरित होकर भारत आते हैं तो कुछ उन्हीं देशों में रहकर साधना-पथ पर आगे बढते हैं । अपनी रुचि व प्रकृति के अनुसार उन्हें पथप्रदर्शक की प्राप्ति भी होती है । परंतु कोई ऐसा भी जिज्ञासु साधक होता हैं जिसे पथप्रदर्शक नहीं मिलता और वह अकेला ही इसमें प्रयोग करता रहता है ।
अमेरिका के ऐसे ही प्रयोगवीर को भारत के योगदर्शन के अध्ययन के पश्चात प्रश्न पैदा हुआ कि योग-ग्रंथो में मूलाधार चक्र में स्थित सर्पाकार कुंडलिनी शक्ति का वर्णन आता है और विभिन्न चक्रों का उल्लेख मिलता है तो वह कुंडलिनी शक्ति और चक्र शरीर में निहित हैं या उनका गलत वर्णन किया गया है ? अगर हैं तो उनका दर्शन शरीर के भीतर होना ही चाहिए । नहीं तो वह वर्णन केवल मनमानी रीति से, बिना किसी सबूत के किया गया मानना चाहिए ।
बस फिर क्या था ? प्रयोगवीर कोई साधारण मनुष्य नहीं, पर डोक्टर था । उन्होंने अपनी जिज्ञासावृति को तुष्ट करने का दृढ संकल्प किया । उस संकल्प की पूर्ति के लिए उन्होंने विचित्र प्रकार की प्रवृति शुरु की । आपको शायद इसकी कल्पना भी न हों ऐसी प्रवृति वे करने लगे । वे मृत शरीर को प्राप्त कर चीरने लगे ।
समग्र शरीर को चीर डाला पर जो प्राप्तव्य था वह न मिला । न तो चक्र दिखाई दिया, न कुंडलिनी के दर्शन हुए । फिर भी वे हताश न हुए । वैसी ही अदम्य जिज्ञासा व उत्साह से उन्होंने कई मुर्दो कों चीर दिया ।
इतने प्रयत्नों के बावजूद भी जब चक्र या कुण्डलिनी का अनुभव न हुआ तब उनकी धीरज न रही । योग के ग्रंथो से उनका विश्वास उठ गया और वे जहाँ तहाँ और हर किसी को कहते फिरते की भारतीय योगग्रंथ जूठे हैं । उनमें मिथ्या वर्णनों की भरमार है ।
परंतु जिसके दिल में सत्य के साक्षात्कार की सच्ची लगन लगी हो उसे ईश्वर एक या दूसरे रूप से शीघ्र या देरी से सहायता अवश्य करता है । यह एक अनिवार्य सत्य है ।
उन्हीं दिनों भारत के एक प्रतिभासंपन्न अनुभवी व महान योगी स्वामी योगानंद अमरिका के दौरे पर आए । इस दौरान वे अमरिकन डोक्टर से योगानंदजी की भेंट हुई । डोक्टर ने बात ही बात में अपनी योगमार्ग की अश्रद्धा व्यक्त की । चक्र व कुंडलिनी यह सब गलत है - ऐसा कहकर अपने प्रयोगों का इतिहास कहा ।
योगानंदजी ने कहा, ‘योग के ग्रंथो की बात गलत नहीं है पर आपकी प्रयोग करने की पद्धति गलत है इसलिए आपको निराशा हुई है । यदि उचित पथप्रदर्शन उपलब्ध कर सच्ची दिशा में यत्न करोगे तो ग्रंथो में कहे गये अनुभवों का तुम्हें अहेसास अवश्य होगा । कुंडलिनी, चक्र, आत्मा – ये सब सूक्ष्म पदार्थ है अतएव हजारों मुर्दों को चीरने पर भी इन्हें नहीं देख सकोगे । उनकी अनुभूति के लिए तो भीतरी साधना – अंतरंग साधना का आधार लेना पडेगा ।’
डोक्टर की इच्छानुसार योगानंदजी ने उन्हें योगदीक्षा दी और साधना का अभ्यासक्रम दिखाया । इसी साधना के फलस्वरूप दीर्घ समय के बाद उन्हें चक्र व कुंडलिनी का अनुभव हुआ । तब उन्हें पता चला कि योग की ये सब बातें सच है । फिर तो आगे चलकर उन्होंने अपनी निजी अनुभूति के आधार पर कुंडलिनी विषय पर ‘धी सर्पन्ट पावर’ नामक किताब लिखी ।
योग या साधना की शास्त्रीय बातों को बिना किसी वैयक्तिक अनुभूति या अनुभूति के लिए आवश्यक अखंड अभ्यास के बिना मिथ्या मानने और मनानेवाले लोग इस घटना से कुछ सबक लेंगे क्या ? उनके लिए और दूसरे सबके लिए यह घटना बोधपाठ के समान है ।
- श्री योगेश्वरजी

