गुरु नहीं बन सकता

परमहंस योगानंद बंगाल में जन्मे थे । उन्होंने अपने जीवन के उत्तर काल में बरसों तक अमरिका में निवास किया था । उन्होंने समर्थ स्वामी विवेकानंद और रामतीर्थ की भाँति भारत के आध्यात्मिक गौरव का पश्चिम की प्रजा को परिचय देने का अनमोल काम किया । इसी लोकोपयोगी महान कार्य के लिए वे अमर हो गये । उनकी ‘ओटोबायोग्राफी ओफ ए योगी’ नामक आत्मकथा आज भी सुविख्यात है, जिसमें उन्होंने अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियों का प्रकाशन किया है ।

प्रस्तुत कृति में योगानंदजी ने अपनी जवानी की एक घटना आलेखित की है जो विशेष उल्लेखनीय है । उस वक्त उन्होंने कोई गुरु नहीं किये थे ।

योग की आभ्यंतर साधना में गुरु की महिमा को वे जानते थे अतएव गुरु बनाने की इच्छा उन्हें थी पर गुरु किसे करें ? इसमें वे जल्दबाजी से काम लेना नहीं चाहते थे । अखियों की प्यास बुझाये और दिल की कली खिलाये ऐसे गुरु न मिले वहाँ तक इंतजार करना और खोज जारी रखना - यही रास्ता उन्हें योग्य लगा ।

इसका मतलब यह नहीं कि वे सत्संग ही नहीं करते थे । अनके महात्माओं से वे मिलते भी, लेकिन उनके अंतर को कोई आकर्षित न कर सका । वे साधना भी करते और संतो का समागम भी ।

इन दिनों उन्हें मास्टर महाशय का मिलाप हुआ । मास्टर महाशय ओर कोई नहीं पर रामकृष्ण परमहंस के जीवनी-लेखक श्री महेन्द्रनाथ गुप्त । उन्होंने श्री रामकृष्ण परमहंसदेव के जीवनप्रसंगो और संवादो को लेकर ‘गोस्पेल ओफ रामकृष्ण’ नामक ग्रंथ रचा था । इसी ग्रंथ से वे अमर हो गये । इसके द्वारा उन्होंने जनता की असाधारण सेवा की । अत्यंत अदभुत व अनुपम था उनका व्यक्तित्व । उसी व्यक्तित्व ने योगानंदजी के हृदय पर रंग डाला ।

वे श्री रामकृष्ण के संसारी शिष्य थे फिर भी अपनी साधना और जगदंबा की कृपा से सर्वोच्च्य अवस्था पर पहुँचे थे । जीवन के रहस्य को सुलझाकर, सनातन शांति प्राप्त कर, वे अपने जीवन को एक आदर्श, आप्तकाम या कृतार्थ मनुष्य की भाँति बिताते थे । उनका प्रबल प्रभाव जवान योगानंद पर कैसे नहीं पडता ?

योगानंद उनके चमत्कारिक व्यक्तित्व से आकृष्ट हो बार-बार उनके निकट जाने लगे । उनके उपदेशों का श्रवण कर शांति का अनुभव करने लगे । धीरे-धीरे उनके प्रति उनकी आदर-भावना बलवत्तर होती गई और उन्हें गुरु बनाने का संकल्प भी कर लिया ।

इसीसे प्रेरित होकर एक दिन पीले फूलों की माला लिए वे मास्टर महाशय के पास पहुँचे । मास्टर महाशय बडी शांति से अपने कमरे में बैठे थे । वहाँ पहुँचकर उन्होंने माला निकाली और बडी प्रसन्नता से पहनाने का प्रयत्न किया किन्तु मास्टर महाशय पीछे हट गये । उन्होंने माला का स्वीकार नहीं किया । यह देख योगानंदजी को दुःख होना बडा स्वाभाविक था । उनके दुःख को जानकर मास्टर महाशय बोले, ‘तुम्हारे दुःख को मैं समज सकता हूँ मगर जिस संकल्प से तुम माला पहनाते हो वह उचित नहीं है । मैं तुम्हारा गुरु नहीं बन सकता ।’

‘तो फिर मेरे गुरु कौन होंगे ?’ योगानंदजी ने पूछा ।

‘तुम्हें तुम्हारे गुरु थोडे ही दिनों में खुदबखुद मिल जाएँगे । वे तुम्हें पहचान जाएँगे और अपना परिचय देंगे । पूर्वसंबंध से वे तुम्हारे साथ सुसंबध्ध है । मैं तुम्हें उपदेश देकर मार्ग दिखा सकता हूँ लेकिन तुम्हारा गुरु नहीं बन सकता ।’

मास्टर महाशय के शब्दों को सुन योगानंद का हृदय भावना से भर गया । उनका आदरभाव बढ गया । वे गुरु बनने तैयार न हुए फिर भी योगानंद भक्तिभाव से प्रेरित होकर नियमित रूप से उनके पास जाने लगे । आकस्मिक रूप से उनके गुरु श्री युक्तेश्वर महाराज की उन्हें प्राप्ति हुई । गुरु ने स्वयं अपना परिचय दिया और उन्हें शिष्य के रुप में स्वीकारा ।

मास्टर महाशय के व्यक्तित्व को निरूपित करनेवाला यह प्रसंग कितना अनूठा है ? इसमें उनकी असाधारण विनम्रता, निरभीमानता, अखंड जाग्रति और कालदर्शी भविष्य-दृष्टि का दर्शन होता है । योगानंदजी ने इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए मास्टर महाशय की शक्ति का परिचय दिया है । गुरु करने की लगनवाले शिष्य तो बहुत मिलते हैं और शिष्य करने की अभिलाषा वाले गुरु भी बहुत मिलते हैं परंतु गुरुभाव से अतीत रहकर सेवा या सहायता करने की वृत्तिवाले मास्टर महाशय जैसे प्रातःस्मरणीय पुरुष तो कोई विरले ही होते हैं इसमें संदेह नहीं ।

- श्री योगेश्वरजी

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