Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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ज्यादातर लोग धर्म के नाम पर संकीर्णता को बढावा देते है । अपना मनपसंद संप्रदाय ही सच्चा है, सर्वश्रेष्ठ है और दूसरे सब धर्म या संप्रदाय निरर्थक व निकम्मे है ऐसी विचारधारा वाले लोगों की संख्या कम नहीं है । एक तरह से देखा जाय तो ऐसे लोग नाना मनुष्यों के बीच भेदभाव की कृत्रिम दिवार खडी कर देते हैं और धर्म या संप्रदाय के नाम वितंडावाद, बहस, असहिष्णुता, वैर-द्वेष, विरोध व घर्षण पैदा कर देते है । ऐसे लोग अपने आपको तो हानि पहुँचाते ही है पर साथ ही जिस समाज में वे रहते है उसको भी हानि पहुँचाते है । वे तो बदनाम होते ही हैं, साथ में उनका धर्म भी बदनाम होता है । वे यह भूल जाते हैं कि सच्चा धर्म इन्सान को सच्चे अर्थ में इन्सान बनाता है । वह उसे समभावी व विशाल हृदय संपन्न मानव बनाता है । वह उसमें विवेक की ऐसी ज्योत जगाता है जिसके आलोक में वह सब प्रकार की कटुता व पूर्वग्रहों को खत्म कर देता है ।

ऐसे ज्ञानी पुरुष कभी मिल जाते है पर वे विरले होते है । जब उनसे मिलाप होता है तो हमारे अंतर में अकथ्य आनंद का अनुभव होता है और ऐसा प्रतीत हुए बिना नहीं रहता कि आज भी संसार में सच्चे मानव साँस ले रहे है । जगत में जो थोडी शांति या सुखानुभूति दृष्टिगत होती है वह ऐसे सज्जन सत्वगुण-संपन्न मनुष्यों पर आधारित है । हमारी पृथ्वी पर के ऐसे मानव-देवता को देख मन-मयूर नाच उठता है ।

यह बात मैं पालीताणा के मेरे प्रवास को याद कर कह रहा हूँ । प्रायः पाँच साल पहले मैं पालीताणा गया था । वहाँ के सुविख्यात जैन मंदिरो को देखा । वे मंदिर अत्यंत सुंदर व आकर्षक है इसमें संदेह नहीं । पर्वत के समुन्नत शिखर पर ऐसे रम्य मंदिरो को देख मुझे सचमुच प्रसन्नता व शांति हुई । उस दिन हजारों लोग उन मंदिरो के दर्शन के लिए आये थे । वे उन्हे देख दंग रह गये ।

थोडी ही देर में एक पालकी आई । उसमें एक धनिक स्त्री बैठी थी जिसकी देह गहनों से लदी थी । उसके साथ उनके परिवार के अन्य सदस्य भी थे । पालकीवाले कहार आराम करने बैठे तो वो औरत भी नीचे उतरी । हमारी साथ आये सज्जन ने उस स्त्री तथा अन्य सज्जनों को पहचान लिया और कहा, ‘आप यहाँ कहाँ से ?’

‘क्यों ? हम यात्रा करने नहीं आ सकते क्या ? भावनगर से दो-चार आदमीयों का साथ मिल गया तो सोचा चलो यात्रा पर ।’ मंडली के भाई ने कहा ।

‘किन्तु पालीताणा से क्या ताल्लुक ? तुम जैन थोडे ही हो ? तुम तो वैष्णव हो, वैष्णव ।’

‘वैष्णव हूँ इसलिए तो पालीताणा आया हूँ, नहीं तो नहीं आता ।’

‘यह कैसे मान लिया जाय ? पालीताणा तो जैनो का तीर्थधाम है ।’ उस सज्जन को आश्चर्य हुआ।

‘देखिये मैं आपको समझाता हूँ । विष्णु अर्थात् सर्वव्यापक परब्रह्म परमात्मा, जो सब में निवास करते है, उनमें जो भावभक्ति रखते है और उनको जो मानते है वह वैष्णव । वह विष्णु क्या पालीताणा में नहीं है ? वह तो चराचर जगत में विद्यमान है । अतएव मैंने कहा, ‘मैं वैष्णव हूँ इसलिये यहाँ आया हूँ ।’  वैष्णव यानि सर्वव्यापक ईश्वर में माननेवाला उदारदिल इन्सान । कट्टर होता तो यहाँ क्यों आता ?’

आसपास के लोग यह सुन अचम्भे में पड गये । उन्होंने इसकी कल्पना तक न की थी । मुझे उस सज्जन का ज्ञान व विवेक देख आनंद हुआ । मैंने मन-ही-मन में उसको धन्यवाद दिया । मुझे लगा, इतने विशाल हृदय और ऐसा सच्चा समझनेवाले मनुष्य कितने हैं ? अगर सब ऐसा सच्चा समजते हो तो कितना अच्छा ?

पालकी और वह परिवार आगे चला पर उसकी याद पीछे रह गई । इसे याद कर मैं भी आगे चलने लगा ।

- श्री योगेश्वरजी