Sat, Jan 23, 2021

स्वागत

महात्मा योगेश्वरजी भारत के एक महान ज्योतिर्धर थे । युगपुरुष इस धरती पर अवतरित होते है और अपने चरणचिह्न अंकित कर चले जाते हैं । ऐसे समर्थ महापुरुष जिधर दृष्टि करते हैं, इतिहास उधर नत हो जाता है । अर्थात् युगपुरुष इतिहास के संकेत पर नही चलते वरन् इतिहास उनके आदेशानुसार चलता है । किसी कवि ने ठीक ही कहा है - ‘आदेश जिधर को देते हैं, इतिहास उधर झुक जाता है ।’ महात्मा योगेश्वरजी ऐसे ही युगपुरुष थे, जिनका उदय भारतीय क्षितिज पर हुआ । महात्मा योगेश्वरजी सिंधु नहीं, बिंदु नहीं किंतु बिंदु एवं सिंधु में तरंग उत्पन्न करने वाले निष्कलंक इंदु है ।

'प्रकाश पथ का यात्री' महात्मा योगेश्वरजी की आत्मकथा है । आत्मकथा के स्वरूप की दृष्टि से यह एक सफल रचना है । इसमें लेखक अधिक सत्यता और वास्तविकता के साथ प्रकट हुआ है । इसमें महात्माजी के जीवन का एक श्रृंखलाबद्ध विवरण प्रस्तुत हुआ है । उन्होंने अपनी विशाल जीवन-सामग्री की पृष्ठभूमि से कुछ महत्वपूर्ण बातों एवं घटनाओं को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया है । अपनी सीधी-सादी सरल, सुबोध भाषा शैली में अपनी जीवनसाधना की विविध सिद्धियों को स्वमुख से वर्णित की है ।

छोटी अवस्था में ही वे साधना के गहन व जटिल पथ पर चल पड़े । साधनामार्ग की अनेक कठिनाइयों को झेलते हुए, उनसे अकेले जूझते हुए, आखिरकार आत्मसाक्षात्कार का अनुभव किया । उन्होंने परम कृपालु परब्रह्म की माँ के रूप में उपासना की । उनके कोई परंपरागत गुरु नहीं थे, जगदम्बा ही जगदगुरु के रूप में उनका आध्यात्मिक पथ प्रदर्शित करती रही । माँ की प्रेरणा से ही उन्होंने योगसाधना का, भगीरथ व्रत-उपवासों का, प्रार्थना और तपश्चर्याओं का आश्रय लिया ।

उनको अनेक सदेह व विदेह संत-महात्माओं के दर्शन हुए, उदाहरणार्थ नारद मुनि, भगवान रमण महर्षि, सन्त ज्ञानेश्वर, शिरडी के सांईबाबा, भक्त जलाराम, स्वामी सहजानंद, भिक्षु अखंडानंद, वेदबंधु, उडिया बाबा, नेपाली बाबा, महात्मा गांधी आदि । शिवानंद आश्रम ऋषिकेश में भगवान कृष्ण का, दशरथाचल पहाड़ पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र तथा भगवान शंकर का, वड़ौदा तथा ऋषिकेश में भगवान बुद्ध का । ऋषिकेश में ही जगदम्बा का और भक्त जलाराम का, उत्तरकाशी और मसूरी में रमण महर्षि का और बंबई में स्वामी नित्यानंदजी का, महेसाणा तथा अन्य स्थलों में शिरडी के महान संत सांईबाबा का, लक्षेश्वर महादेव की कुटिया में प्रकाश का, दक्षिणेश्वर में कुमारी के रूप में जगदम्बा का, जमनोत्री में अपने पूर्व जन्मों का, आलंदी में संत ज्ञानेश्वर एवं निवृतिनाथ के भी दर्शन हुए ।

अनेक ज्ञात-अज्ञात सिद्ध पुरुषों के दर्शन हुए और अपने ही दिव्य स्वरूप का भी दर्शन हुआ जो अत्यधिक अदभूत है । बदरीनाथ की पुण्यभूमि में उन्हें नर-नारायण के दर्शन हुए और अष्टसिद्धि व नवनिधि की दुर्लभ प्राप्ति हुई, जो किसी विरले को ही परम कृपालु परमात्मा की कृपा से और पातंजल योगदर्शनानुसार पंचमहाभूत पर विजय प्राप्त कर लेने पर होती है । स्वानुभव संपन्न साधना के सुमेरु शिखर पर पहुंचे हुए कुछ सिद्ध पुरुष ही उन्हें समझ सकेंगे ।

मेरा सदभाग्य रहा है कि इस आत्मकथा के बहुधा प्रसंग मैंने उनके प्रवचन और सत्संग की बैठको में उनकी अमृतवाणी में सुने है । अध्यात्म पथ के पथिकों को निश्चय ही यह ग्रंथ प्रकाश पथ पर प्रयाण करने के लिए पथ-प्रदर्शक का काम करेगा ।

- प्रो. शशिकांत कोन्ट्राकटर (एम. ए.)

 

 

Today's Quote

God, grant me the serenity to accept the things I cannot change, the courage to change the things I can, and the wisdom to know the difference.
- Dr. Reinhold Niebuhr

prabhu-handwriting

We use cookies

We use cookies on our website. Some of them are essential for the operation of the site, while others help us to improve this site and the user experience (tracking cookies). You can decide for yourself whether you want to allow cookies or not. Please note that if you reject them, you may not be able to use all the functionalities of the site.