Sat, Jan 23, 2021

पिताजी की मृत्यु

सांकुबा (पिताजी की माताजी) पिताजी को कृषि में सहयोग प्रदान करती थी । वे बडी-ही मेहनती और बहादुर थी । खेतों में पानी मोडना व कोस चलाना उनके लिए मानो बाँये हाथ का खेल था । वे पढी-लिखी नहीं थी किन्तु ईश्वरमें उनकी अटूट आस्था थी ।

कुछ लोगों को अपने बचपन की बातें ठीक तरह से याद रहती है । बचपन के कई छोटे-मोटे  किस्से वे हुबहु बयाँ कर सकते है । ऐसा सिर्फ युवानों में ही नहीं लेकिन बुजूर्गो में भी पाया जाता है । जब अपने अनुभव प्रस्तुत करने की उनकी बारी आती है तो वो उनको ईतनी बारिकी से पेश करते है की सुननेवाले दंग रह जाते है । उनकी स्मरणशक्ति पर हमें आश्चर्य एवं आदर होता है । एसे लोग बुढापे में भी अपनी बीती हुई जिंदगी को याद करके फिर बचपन के दिनों का आस्वाद ले लेते है ।

मेरी बात कुछ अनोखी है । मेरे बचपन के अधिकतर प्रसंग मुझे याद नहीं । इस बात का मुझे कोई ग़म नहीं । यह बात ठीक है या नहीं इसकी चर्चा मैं नहीं करना चाहता । यहाँ पर तो मुझे जो भी कुछ याद है वो मैं बताने की कोशिश कर रहा हूँ । वैसे तो हम अनगिनत बार जन्म ले चुके है और शैशव की अनुभूति कर चुके हैं । हम में से किसीको उनके बारें में कुछ याद नहीं । इसके लिए हमें कभी अफसोस नहीं होता । तो फिर इस जन्म की कुछ स्मृतियाँ याद न रहने से मैं भला क्यूँ शोक करुँ ? यह जीवन भी कहाँ हमेशा रहनेवाला है ? इसलिए मुझे जो कुछ भी याद है उससे मुझे खुशी है मगर मैं जो भूल चुका हूँ उसका मुझे कोई आपत्ति नहीं ।

बचपन में मुझे उदर की व्याधि रहा करती थी । मेरे माताजी के बताने पर मैं यह कह रहा हूँ । मेरी यादशक्ति तेज थी । गाँव में रमताशंकर नामक एक सज्जन पुरुष रहते थे जो बच्चों को संध्या-वंदन करना सिखाते थे । उन्हीं से मैं संध्या, रुद्री व शिवमहिम्न के पाठ सिखा । हररोज शिवजी के मंदिर में मैं संध्या करने जाता था ।

बचपन के दिन गुजरते हुए देर लगती है भला ? जब सारा जीवन ही पानी की तरह क्षण में बह जाता है तो बचपन का क्या कहना ? जीवन के आठ साल तो यूँ करके बीत गये और मेरा ९ वें साल में प्रवेश हुआ । यह साल मेरे लिये क्रांतिकारी सिध्ध हुआ । श्रावण सुद बारस को मेरा नौवें साल में प्रवेश हुआ । भाद्रपद में पिताजी को चेचक की बीमारी हुई और कुछ ही दिनों में वे चल बसे । युवान वय में मौत होने से कुटुंब में कोहराम मच गया । गाँव के लोग उनके सदगुणों को याद करके शोक करने लगे । मेरी माँ की उम्र उस वक्त सिर्फ पच्चीस साल की थी । अपना सुहाग खंडित होने पर वह शोकग्रस्त हो गई । उसकी यथाकिंचित स्मृति मुझे आज भी है ।

लेकिन शोक करने से क्या होता है ? जो चला जाता है वो वापिस तो नहीं आता । जन्म और मृत्यु सनातन है, अटल है । सबको एक न एक दिन उसका मेहमान होना है । जो भक्ति द्वारा परमात्मा की प्राप्ति कर लेता है वह अमर हो जाता है । जन्म और मृत्यु एक दूसरे के पूरक है । सूर्य अस्त होने से क्या सूर्य का अंत हो जाता है ? वो तो कहीं ओर निकलता है । एक जगह का सूर्यास्त किसी और के लिए सूर्योदय है । मृत्यु के बारे में भी एसा सोचकर हमें हर्ष-शोक से परे होना है । जो ईश्वर के चरणों में प्रेम करता है उसका सुहाग कभी नहीं मिटता । मौत उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती । संसार के सब ऐश्वर्य क्षणभंगुर है, विनाशशील है, शाश्वत नहीं है । ये शरीर भी इसी तरह चीरस्थायी नहीं, उसका अंत कभी न कभी तो होना ही है । धीरा भगत ने गाया है कि

काच नो कूपो काया तारी,

वणसताँ न लागे वार ।

जीव काया ने सगाई केटली,

मूकी चाले वन मोझार ।

अर्थात् तेरी काया काँच के बरतन की तरह क्षणभंगुर है, उसे टूटते हुए देर नहीं लगती । जीव और देह का साथ आखिर कब तक ? जीव तो शरीर को बीच-रास्ते छोड़कर चला जायेगा ।

लेकिन अधिकांश लोग यह विवेकज्ञान से अनभिज्ञ है इसलिए शोक करते है । हमारे घर में मातम छा गया । इतना गम क्या कम था कि पिताजी के मृत्यु के पंद्रह दिन पश्चात हम तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी बहन चल बसी ।

ईश्वर की लीला अपरंपार है । वह जो भी करता है मंगलमय होता है, अनुभवी संतो का यह कहना है । पिताजी के मृत्यु पश्चात मेरी पढ़ाई के लिये योजना बनाई गई । माताजी के बड़े भाई रमताशंकर चौपाटी में किसी शेठ के घर चपरासी की नौकरी करते थे । उनके मकान के पास एक अनाथ बच्चों का आश्रम था । उन्होंने मेरे प्रवेश के लिए अरजी दी और वो मंजूर हो गई । उस जमाने में बंबई पढ़ने के लिए जाना सरोडा जैसे पिछड़े हुए गाँव के लिए लंदन जाने के बराबर था । कई गाँववालों ने इसका विरोध किया, लेकिन मेरी इच्छा दृढ़ थी । ईश्वर ने भी यही चाहा था । मानो मेरे पूर्व-संस्कार मुझे वहाँ जाने के लिए बाध्य कर रहे थे । माताजी तथा मेरे दोनों मामाजी अपने प्रस्ताव पर जूटे रहे और किस्मत से मैं बंबई आ गया । उस वक्त मेरी उम्र सिर्फ नौ साल की थी और में चौथी कक्षा में पढ़ता था ।

 

Today's Quote

There is a sufficiency in the world for man's need but not for man's greed.
- Mahatma Gandhi

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