Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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एक दिन भोजन करने के पश्चात मैं अपने कमरे में आराम कर रहा था तब किसीने मेरे कमरे का दरवाजा खोला । एक कृशकाय और बिल्कुल काली स्याही जैसे वर्णवाले युवान साधु ने अंदर प्रवेश किया । मैंने उनको बडे प्यार और आदर से आसन दिया । मुझे लगा कि वो शायद गुजराती होंगे और किसी के कहने पर धर्मशाला में मुझे मेनेजर समझकर मिलने आए होंगे ।

मेरी कल्पना बिल्कुल निराधार नहीं थी । वे सौराष्ट्र के वतनी थे मगर बचपन में गृहत्याग करके निकल पडे थे । उन्होंने लंगोटी और बदन पर काला कुर्ता पहना था । सर की  जटा और कान के कुंडल उनकी शोभा में अभिवृद्धि करते थे । उनकी मुखाकृति काली मगर प्रभावी थी और उनकी आंखे तेजस्वी थी ।

उनका परिचय पूछने के बाद मैंने वार्तालाप का प्रारंभ किया ।

मैंने पूछा, आप कहाँ रहते हो और इस वक्त कहाँ से आ रहे है ?

उन्होंने उत्तर दिया, मैं वसुधारा रहता हूँ, जो बदरीनाथ से करीब छ मिल की दूरी पर है और इसी वक्त वहाँ से आ रहा हूँ ।

आप वहाँ कैसे पहूँचे ? मैंने जिज्ञासावश प्रश्न किया ।

मेरे संस्कारो की वजह से, उन्होंने उत्तर दिया, जब मैं यात्रा करते हुए बदरीनाथ जा पहूँचा तो वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर मोहित हो गया । बदरीनाथ का मंदिर बन्द होने पर मैं वहाँ रुक गया । मेरे साथ दो-तीन ओर साधु भी थे । उनकी सुचना से मैं वसुधारा की गुफा में जाकर रहने लगा ।

मगर वहाँ तो कडाके की ठंड पडती है । मंदिर बन्द होने के बाद खाने-पीने की कोई सुविधा नहीं होती । आप इतनी कठिनाईयों के बीच वहाँ कैसे रहे ? मैंने प्रश्न किया ।

आपकी बात सही है मगर मुझे खास दिक्कतों का सामना न करना पडा । वसुधारा के आसपास एसी जडीबुट्टीयाँ होती है जिसका सेवन करने से चालीस दिन तक भूख नहीं लगती । वहाँ निवास करनेवाले महात्माओं ने मुझे बुट्टी दिखाकर उसके सेवन करने का तरीका बताया इसलिए भोजन की चिंता न रही । ओर भी एक बुट्टी होती है जिसकी भस्म बनाकर, विधिपूर्वक सेवन करने से तथा उसके रस का शरीर पर लेपन करने से ठंड नहीं लगती । उसे शरीर पर लगाने से इतनी गर्मी उत्पन्न होती है कि आदमी खुले पैर बर्फ पर चल सकता है, यहाँ तक की बर्फ पर सो सकता है । इसी बुट्टी का सेवन करके कई संतमहात्मा बर्फिले रास्तों पर बदरीनाथ से पैदल चलकर केदारनाथ जाते है ।

यह कहकर उन्होंने अपने कंधों पर रखी झोली नीचे रखी और मुझे दोनों औषधियाँ बताई । मुझे देखकर आनन्द हुआ ।

उन्होंने बताया, यह औषधि के सेवन से भूख नहीं लगती, मगर कुछ दिनों के बाद शरीर थोडा कमजोर होता है । इसलिए केवल निर्जन और एकांत क्षेत्र में ही इसका इस्तमाल करना चाहिए ।

फिर थोडी प्राणायाम के बारे में चर्चा हुई । उन्होंने मुझे निमंत्रण देते हुए कहा, तुम भी मेरे साथ वसुधारा चलो । मैं आपको सब औषधियों से अवगत कराउँगा ।

मैंने कहा, फिलहाल वहाँ आपके साथ चलना मेरे लिए मुमकिन नहीं । अगर इश्वर की मरजी हुइ तो भविष्य में वहाँ आना होना ।

मैं मानता था कि भूख और ठंड से बचानेवाली साधारण औषधि से ईश्वर के प्याररूपी औषधि कहीं ज्यादा कीमती है । मेरा संपूर्ण ध्यान उसे पाने में लगा था । ईश्वर-दर्शन की प्यास लगने के बाद जीवन धन्य हो जाता है । फिर किसी जडीबुट्टी का जरूरत नहीं रहेती ।

आग्रह करके मैंने वसुधारा के उस वैरागी को दूध दिया । दूध का प्रसाद लेकर वे चल पडे मगर बदरीनाथ जाते रास्ते में बिमार होने की वजह से वापिस ऋषिकेश आए । हिमालय निवास के दौरान मैंने दो-तीन दफा बदरीनाथ की यात्रा कि । एक बार वसुधारा की मुलाकात ली, मगर वो तेजस्वी और आकर्षक युवान वैरागी से पुनः मिलाप नहीं हुआ । अब तो वो जीवित होंगे या नहीं और अगर जीवित है तो कहाँ होंगे वो सिर्फ ईश्वर बता सकता है । आज भी बसुधारा के योगीपुरुष का स्मरण करके हृदय आनंद से भर जाता है । हरिकृपा के बिना एसे बालब्रह्मचारी योगीपुरुष के दर्शन का सौभाग्य मिलना असंभव है, अतिशय दुर्लभ है ।

भारत के भव्य भूतकालिन इतिहास में कई बालयोगी पैदा हुए है, जिन्होंने सांसारिक पदार्थों में से अपने मन को हटाकर परमात्मा में जोडा । भारत का यह सदभाग्य है कि इसकी धरती पर एसे कई बडभागी आत्मा अवतरित होते रहें है । भारत के आध्यात्मिक इतिहास का यह एक सुवर्ण पृष्ठ है । सनकादि ऋषि से लेकर नारद, शुकदेव, जडभरत, दत्तात्रेय, अष्टावक्र और गार्गी तथा शंकराचार्य, ज्ञानेश्वर, एकनाथ और विवेकानंद जैसे कई नाम यहाँ मिसाल के तौर पर ले सकतें है । ये तो सुप्रसिद्ध बालयोगीओं की बात हुई मगर इनके अलावा एसे कितने अनगिनत बालयोगी हमारे देश में पैदा हुए होंगे ? उसकी निश्चित गिनती करना नामुमकिन है । जो देश में ध्रुव और प्रह्लाद जैसे धर्मपरायण बच्चे पैदा होते है, उस देश की संस्कृति का विनाश कभी नहीं हो सकता ।

एसे योगीपुरुषों के दर्शन का सौभाग्य आसानी से नहीं मिलता । मैं इतना खुशकिस्मत हूँ की औरों के लिए दुर्लभ माने जानेवाले संतमहात्माओं का संग मेरे लिए सुलभ हुआ है । जिनके दिल में संतपुरुषों के दर्शन की कामना रहती है, जिनका दिल उनके दर्शन के लिए बेचैन होता है, उनको वे अवश्य दर्शन देते है, इसमें कोई दोराई नहीं ।