Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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कुछ देर तक कमरे में खामोशी छायी रही । तुलसीदासने सत्य कहा है की बिन हरिकृपा मिलत नहीं संता । ईश्वर की कृपा के अलावा एसे महापुरुष से भेंट होना मेरे लिए असंभव था । मैंने देखा की बातचीत करते हुए त्रिकालज्ञ महापुरुष अपनी अंगुली को नासिका पर लगाते थे, ज्यादा वक्त के लिए नहीं मगर एकाद सेकंड । मुझे लगा कि शायद वे स्वरोदय शास्त्र के अभ्यासी है और उसके आधार पर भूत और भविष्य की बातें बता रहे थे । मगर उनकी इष्टकृपा की बात सुनकर मेरी सोच गलत और निराधार लगी । इष्ट की कृपा से आदमी कुछ भी कर सकता है । पूर्ण शांति और सिद्धि का स्वामी बन सकता है । मुझे भी इष्टकृपा पाने की कामना थी, मगर उसे कैसे हासिल की जाए ? और फिर इष्ट को राजी करने के लिए सर्वप्रथम किसी देव-देवी को ईष्ट चुनना पडता है । मैं तो अभी तक ये भी तय नहीं कर पाया था कि मेरे लिए कौन ईष्ट है । हाँ, वैसे मुझे माँ जगदंबा पर प्यार था मगर हनुमानजी की बात मेरे लिए नविन थी ।

मेरे विचारों को शायद उन्होंने जान लिया इसलिए वो कहने लगे, काली माता का एक मंत्र है जो अमोघ और अकसीर है । उसका विधिपूर्वक जप करने से केवल सप्ताह में माँ काली के दर्शन हो सकते है ।

काली काली महाकाली,
दोनों हाथ बजावे ताली,
ब्रह्मा की बेटी ओर इन्द्र की साली,
बेठी पीपल की डाली,
तेरा वचन न जाय खाली ।
पढाउँ वहाँ जा, मेरा वचन मान के आ,
शबद साचा, गुरु वाचा
गुरु वचन आदेश ।

फिर उन्होंने मंत्रजाप की विधि बताकर बडी गंभीरता से कहा, सप्ताह में पाँच हजार जप पूर्ण करने के बाद पिपल के पैड के नीचे कुंभ रखना । एसा करने पर आपको पिपल की शाखा पर बैठी माँ काली का दर्शन होगा ।

आज यह बात सुने बरसों बीत गये है, मगर इस मंत्र का प्रयोग करने का मन नहीं हुआ । केवल सात दिन में साक्षात्कार पाने की बात लुभावनी जरुर है मगर मंत्र के शब्दों के बारे में सोचकर मन निरुत्साही हो जाता है । खास करके, ब्रह्मा की बेटी और इन्द्र की साली का शब्दप्रयोग विचित्र लगता है । कहीं एसा न हो कि माता काली यह सुनकर प्रसन्न होने के बजाय नाखुश हो जाय । मंत्र को जब पहली बार सुना तब भी मेरे मन में एसे विरोधी भाव उठे थे । अगर मंत्र को सुनकर सकारात्मक भाव पैदा न हो तो उसका अनुष्ठान करने से क्या फायदा ? प्यार और श्रद्धा के बिना की गइ किसी भी साधना शायद ही सफल हो सकती है ।

शायद किसी वाचक को यह मंत्र पढकर हँसी आये मगर सिर्फ विचित्र शब्दप्रयोग के कारण मंत्र को निरर्थक मान लेना सही नहीं है । हमारे यहाँ एसे कई साधक व सिद्ध है जो संस्कृत का ज्ञान नहीं रखते । उनको गुरुपरंपरा से एसे मंत्रो की प्राप्ति होती है । आज भी एसे बहुत सारे मंत्र विद्यमान है और काफि लोग उसमें विश्वास करते है । मंत्र चाहे संस्कृत हो या प्राकृत, अहम् बात यह है कि उसमें साधक की श्रद्धा होनी चाहिए । गुरुपरंपरा से मिलनेवाले मंत्र में बहुत सारे लोग विश्वास करते है । साधक को कौन से मंत्र और कौन से इष्ट में श्रद्धा हो, यह कौन बता सकता है ? अब एकलव्य की बात ले लो । उसने मिट्टी से बने द्रोण के पूतले में अपनी श्रद्धा प्रस्थापित की । बिल्कुल इसी तरह साधक को कहीं पर भी श्रद्धा हो सकती है । सच पूछो तो साधना में सफल होने के लिए केवल श्रद्धा आवश्यक है । हम कोई मंत्र, इष्ट या कोई विधिविधान में विश्वास नहीं करते तो इसका यह मतलब कतै नहीं की ये सब गलत है । एसे हजारों लोग है जो उन पर विश्वास करते है और उसीसे प्रेरणा पाकर जीवन की उन्नति के लिए प्रयास करते है । हमें उनको समजना होगा । इतनी चर्चा करने के बाद पाठको कों त्रिकालज्ञ महात्मा पुरुष द्वारा बताये गए मंत्र को सही ढंग से समझने में सहायता मिलेगी ।

मंत्र का रहस्य बताकर महात्मा पुरुष निकल पडे । मैंने उनको भावपूर्ण विदाय दी । जाते जाते उन्होंने अपने निवासस्थान - अपनी पर्णकुटि, के बारे में मुझे बताया और मुझे आने का प्यारभरा निमंत्रण दिया ।

प्रथम मुलाकात के बाद हमारी आपसी जानपहचान बढती चली । कभी कभी मैं उनकी पर्णकुटि पर उनको मिलने चला जाता था । वे मेरा प्यार से सत्कार करते थे, मुझे दूध का प्रसाद देते थे । कभी दूध कम पड जाता तो मेरे सामने ही दूध में थोडा गंगाजल मिलाकर मुझे देते थे । उनकी सादाई प्रसंशनीय थी । महात्माजी के पास विशेष शक्ति और सिद्धि होने पर भी उनका स्वभाव अभिमान और दंभरहित था । उनमें एक शिशुसहज सरलता थी । सुबह-शाम दोनों वक्त वे अन्नक्षेत्र से अपना भोजन लाते थे । कभी कभी मैं सोचता हूँ कि अन्नक्षेत्र की भिक्षा पर एसे कई गुप्त रत्नपुरुष अपना पेट भरतें होंगे । मैं मानता हूँ कि कई लोग अन्नक्षेत्र से भिक्षा लेने की सुविधा का दुरुपयोग करते है । मगर अन्नक्षेत्र से यह महात्मा पुरुष जैसे कई सुपात्र व्यक्ति को लाभ होता है ये भी उतना ही सच है । अन्नक्षेत्र के संचालको को यह बात का ख्याल रखना चाहिए और सुपात्र व्यक्ति को भिक्षा मिले यह देखना चाहिए । मुझे कई बार लगता कि एसे महापुरुष अगर बडे शहरों में जाकर अपनी सिद्धियों का खुलेआम प्रदर्शन करें तो बेशुमार धन-दौलत या मान-सम्मान पा सकते है, फिर भी वे यहाँ भिक्षा की रोटी से संतुष्ट है । जो निस्पृही है उसे धन मिले या न मिले, भला क्या फर्क पडता है ? उनके लिए तो कुबेर का धनवैभव भी तिनके के बराबर है ।

एक दफा, मैंने सरोडा माताजी को मनीआर्डर भेजा । तकरीबन बीस दिन हो गये मगर ना तो मुझे मनीओर्डर की रसीद मिली थी और ना ही माताजी का कोई खत आया । इसी वजह से मैं थोडा परेशान था । उन दिनों मैं गंगातट पर स्थित महात्मा पुरुष की पर्णकुटि में उनसे मिलने गया । मैंने मनीओर्डर के बारे में उनको बताया । अपनी सहज आदत के मुताबिक उन्होंने अपनी उंगली को नासिका पर रखा और फिर उत्तर दिया, चिंता करने की कोई बात नहीं है । माताजी को मनीओर्डर मिल गया है । माताजी गाँव से कहीं बाहर गई थी इसलिए पोस्टमास्टर ने मनीओर्डर को रोक रखा था । आज ही माताजी वापिस गाँव आई है, और उनको पैसे मिल गये है । मनीओर्डर की रसीद आपको आज से ठीक सातवेँ दिन मिल जाएगी । साथ में माताजी का खत भी मिलेगा ।

मैंने पूछा, इस वक्त माताजी क्या कर रही है ?

उन्होंने कहा, घर में बैठकर घंटी धुमा रहे है और कुछ गुनगुना रही है ।

मैंने सोचा कि सात दिन तो यूँ निकल जायेंगे और इस महात्मा पुरुष के कथन की सत्यासत्यता की परीक्षा हो जाएगी । उन्होंने धर्मशाला में आकर मेरे कमरे में जो बात बताई थी उसे सही या गलत बताने के लिए कइ साल लग जायेंगे । मगर यह मनीओर्डर की बात कुछ ही दिनों में उनकी समर्थता का प्रमाणपत्र दे देगी ।

आखिरकार महात्मा पुरुष के वचन सत्य सिद्ध हुए । जैसे कि उन्होंने बताया था, ठीक सातवें दिन मनीओर्डर की रसीद मुझे मिली । साथ में माताजी का लिखा हुआ खत भी मिला, जिसमें उन्होंने गाँव से बाहर जाने की और पोस्टमास्टर ने मनीओर्डर को रोक रखने की बात लिखी थी । महापुरुष की बात के प्रत्यक्ष प्रमाण से मुझे अपार आनंद हुआ । एसे सिद्ध महापुरुष से मेरी भेंट कराने के लिए मैंने ईश्वर को शुक्रिया कहा । हमारे देश में त्रिकालज्ञ महात्मा जैसे कितने अनगिनत रत्न छीपे हुए है, यह तो सिर्फ इश्वर जानता है ।