दशरथाचल पर्वत पर काव्यलेखन जारी रहा । काव्यलेखन की शक्ति मुझमें नैसर्गिक रूप से थी एसा कहना गलत नहीं होगा । कविताएँ पढने और लिखने में मुझे शुरू से दिलचस्पी थी और वह हिमालय आने के बाद भी जारी रही । वाचकों के मन में यह प्रश्न होना स्वाभाविक है की दशरथाचल पर मैं संपूर्ण साधनारत था, आत्मोन्नति की उत्कट इच्छा की पूर्ति के लिये अविरत प्रयास कर रहा था, तो फिर ऐसे हालात में कविताएँ लिखना कैसे संभव हुआ ? उसके प्रत्युत्तर में मैं यह कहना चाहता हूँ की कविता मेरे लिये कल्पना की उडान, मनोरंजन या दिलबहेलाव का साधन नहीं है । मैं केवल लिखने के लिये कविता नहीं लिखता, कविता मेरे लिये साधना है, कला है, सत्यम्, शिवम् और सुंदरम् का साक्षात्कार करानेवाली शक्ति है । मैं मानता हूँ की कविता के माध्यम से आदमी परमात्मा को अपने भाव समर्पित करता है, हृदय के भावों को अभिव्यक्त करता है, परमात्मा से संवाद करता है और इसी प्रकार परमात्मा की कृपा का अनुभव करता है । व्यक्ति और समष्टि को प्रेरणा प्रदान करने के साथ साथ कविता सामाजिक और राष्ट्रीय उन्नति में बहुमूल्य योगदान देती है ।
हाँ, यहाँ पर मैं अपनी बात कर रहा हूँ । कविता के माध्यम से मैंने अपने हृदय के भावों को ईश्वर के चरणों में समर्पित किये हैं । मेरे साधनापथ पर कविता सदैव पूरक और सहायक सिद्ध हुई है । अगर जीवन-विकास की साधना में कविता बाधारूप होती, तो उसका त्याग करने का प्रश्न मन में अवश्य उठता मगर हकीकत ऐसी न थी इसलिये साधना के दिनों में भी काव्यलेखन जारी रहा । कविता अथवा साहित्य मेरे लिये साधना-संवर्धक सिद्ध हुए, आशीर्वादरूप हुए । हम जानते हैं की तुलसीदास, सुरदास, मीरां, नरसी और तुकाराम जैसे भक्तों के लिये उनके भजन परमात्मा के साथ रिश्ता जोडने में सहायक हुए थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे जप, ध्यान, अनुष्ठान आदि अन्य साधन होते हैं । समंदर के पानी को जिस तरह एक पंछी अपने पंख हिलाकर संस्पर्श करता है, बिल्कुल उसी तरह कवितारूपी पंख से भक्तों ने अध्यात्म-गगन में उड्डयन करके परमात्मा के विशाल स्वरूप को छूआ है । उनके लिये कविता अमोघ मंत्र के समान लाभदायी हुई है । मेरे लिये भी यह बात सत्य हुई और यही कारण है की साधना की उत्कट अवस्था में भी काव्यलेखन यथावत रहा ।
हाँ, हिमालय आनेके बाद उसके स्वरूप में परिवर्तन आया । आदमी जो माहौल में जीता है, जिस प्रकार से सोचता है, जिसको अपना आदर्श मानता है, उसकी प्रतिच्छबि उसकी काव्यकृति में होती है, फिर चाहे वो गद्य हो या पद्य । उसके व्यक्तित्व, उसके अनुभव, उसके चिंतन-मनन और निदिध्यासन की झलक उनकी रचनाओं में दिखती है । इसी कारण साहित्य को जीवन का दर्पण कहा गया है । गांधीजी, विनोबा, टागोर, मेक्सीम, गोर्की, टोलस्टोय, अरविंद, न्हानालाल जैसे सर्जको के साहित्य को हमें उसी नजरीयें से देखना चाहिए । मैं एसा महान लेखक तो नहीं, मगर मेरे लेखन के बारे में यही बात लागू होती है । हिमालय जाने के बाद आत्मोन्नति की साधना मेरे जीवन का प्रमुख लक्ष्य थी, यूँ कहो की मेरा जीवन आध्यात्मिक बन चुका था । इसलिये मेरे साहित्य और सर्जन में पाठकों को उसकी गहरी छाप दिखेगी ।
*
समाधि का अनुभव होने से मुझे असाधारण आनंद हुआ । मेरी श्रध्धा दूगुनी हो गई । मुझे लगा की इश्वर की परम कृपा से मुझे आगे चलते अन्य अनुभव मिलते रहेंगे । मेरे दिलमें इश्वर के साकार दर्शन की भावना थी । उसकी पूर्ति के लिये मैं निरंतर प्रार्थना करता था । उन दिनों प्रार्थना मेरे लिये एकमात्र साधन था एसा कहना गलत नहीं होगा । जो चिज की मुझे जरूरत होती, मैं ईश्वर के आगे प्रार्थना के माध्यम से व्यक्त करता, उसकी कृपा की कामना करता । जिस तरह बच्चा अपनी माँ के लिये रोता-बिलखता है, बेचैन होता है, मैं भी ईश्वर के लिये बेचैन होकर रोता था । तीव्र भावसंवेदन और उत्कट प्रार्थना में मेरे दिन कब निकलते उसका मुझे पता भी नहीं चलता । आज तक प्रार्थना का क्रम जारी है । किसी भी इच्छा की पूर्ति के लिये मैं आज भी प्रार्थना का सहारा लेता हूँ । प्रार्थना ने मेरे लिये किसी सिद्ध मंत्र का कार्य किया है । ये कहने में मुझे कोई हिचकिचाहट नहीं की प्रार्थना के फलस्वरूप ईश्वर ने मुझे अपनी कृपावर्षा से लाभान्वित किया है, साधना के विभिन्न अनुभवों से कृतार्थ किया है ।
इश्वर के साकार दर्शन के लिये मैं अपनी रुचि अनुसार हररोज प्रार्थना करता था । ध्यान में बैठने के लिये सुबह द्वार बन्द करता और फिर मेरी दशा करुण हो जाती । मुझे लगता की एक ओर दिन बीत गया और मेरी अभिलाषा की पूर्ति नहीं हूई । प्रभु मेरी ईच्छा कब पूर्ण करेंगे ? और यही सोचकर आँख से भावाश्रु चलने लगते ।
एक दिन प्रभु की कृपा हुई । वो दिन मेरे लिये आशीर्वादरूप सिद्ध हुआ । सुबह ध्यान और प्रार्थना करते-करते मेरा देहाध्यास छूट गया, शरीर मानो निश्चेत हो गया । उस अवस्था में मुझे जो अलौकिक अनुभव मिला उसे याद करते हुए आज भी मेरा हृदय भावविभोर हो जाता है । मुझे भगवान राम के दर्शन हुए । उनका स्वरूप अत्यंत मधुर था, मैंने एसा सुंदर स्वरूप पहले कभी देखा नहीं था । वे खडे थे, उन्होंने पितांबर धारण किया था, उनके गले में माला और सर पर मुकुट था । वो मेरी तरफ देख रहे थे । उनकी दृष्टि की मधुरता का वर्णन करने के लिये मेरे पास शब्द नहीं है । तकरीबन पांच मिनीट तक दर्शनानुभव चला । फिर मुझे होश आया, मैं ध्यान से उठा मगर मेरा मन शांति के सागर में डूबा था, अंतर आनंद से उछल रहा था ।
कुछ देर के बाद मैं कमरे से बाहर निकला तब मेरे मुख पर छलक रहे आनंद से चंपकभाई को अंदाजा हुआ । मैंने चंपकभाइ को लिखकर मेरे अनुभव के बारे में बताया । दर्शन के अनुभव की बात से चंपकभाइ बहुत प्रसन्न हुए ।
मैंने श्रीराम के दर्शन की कामना नहीं की थी, और ना ही कोई विशेष परीश्रम किया था । फिर भी ईश्वर ने मेरी भावना की पूर्ति की, यह मेरे लिये आनंद की बात थी । शायद उसके लिये मेरे पूर्वजन्म के संस्कार कारणभूत थे । जो भी हो, भगवान राम के दर्शनानुभव से मुझे अत्यंत हर्ष हुआ । अनुभव ध्यान या समाधि दशा में हुआ था, और किसी भी प्रकार का शाब्दिक वार्तालाप से रहित था, फिर भी मेरे लिये अनमोल था । हर्षाश्रु से छलकती हुई आँखों से मैंने भगवान राम के चरणों में प्रणिपात किया ।
हाँ, यहाँ पर मैं अपनी बात कर रहा हूँ । कविता के माध्यम से मैंने अपने हृदय के भावों को ईश्वर के चरणों में समर्पित किये हैं । मेरे साधनापथ पर कविता सदैव पूरक और सहायक सिद्ध हुई है । अगर जीवन-विकास की साधना में कविता बाधारूप होती, तो उसका त्याग करने का प्रश्न मन में अवश्य उठता मगर हकीकत ऐसी न थी इसलिये साधना के दिनों में भी काव्यलेखन जारी रहा । कविता अथवा साहित्य मेरे लिये साधना-संवर्धक सिद्ध हुए, आशीर्वादरूप हुए । हम जानते हैं की तुलसीदास, सुरदास, मीरां, नरसी और तुकाराम जैसे भक्तों के लिये उनके भजन परमात्मा के साथ रिश्ता जोडने में सहायक हुए थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे जप, ध्यान, अनुष्ठान आदि अन्य साधन होते हैं । समंदर के पानी को जिस तरह एक पंछी अपने पंख हिलाकर संस्पर्श करता है, बिल्कुल उसी तरह कवितारूपी पंख से भक्तों ने अध्यात्म-गगन में उड्डयन करके परमात्मा के विशाल स्वरूप को छूआ है । उनके लिये कविता अमोघ मंत्र के समान लाभदायी हुई है । मेरे लिये भी यह बात सत्य हुई और यही कारण है की साधना की उत्कट अवस्था में भी काव्यलेखन यथावत रहा ।
हाँ, हिमालय आनेके बाद उसके स्वरूप में परिवर्तन आया । आदमी जो माहौल में जीता है, जिस प्रकार से सोचता है, जिसको अपना आदर्श मानता है, उसकी प्रतिच्छबि उसकी काव्यकृति में होती है, फिर चाहे वो गद्य हो या पद्य । उसके व्यक्तित्व, उसके अनुभव, उसके चिंतन-मनन और निदिध्यासन की झलक उनकी रचनाओं में दिखती है । इसी कारण साहित्य को जीवन का दर्पण कहा गया है । गांधीजी, विनोबा, टागोर, मेक्सीम, गोर्की, टोलस्टोय, अरविंद, न्हानालाल जैसे सर्जको के साहित्य को हमें उसी नजरीयें से देखना चाहिए । मैं एसा महान लेखक तो नहीं, मगर मेरे लेखन के बारे में यही बात लागू होती है । हिमालय जाने के बाद आत्मोन्नति की साधना मेरे जीवन का प्रमुख लक्ष्य थी, यूँ कहो की मेरा जीवन आध्यात्मिक बन चुका था । इसलिये मेरे साहित्य और सर्जन में पाठकों को उसकी गहरी छाप दिखेगी ।
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समाधि का अनुभव होने से मुझे असाधारण आनंद हुआ । मेरी श्रध्धा दूगुनी हो गई । मुझे लगा की इश्वर की परम कृपा से मुझे आगे चलते अन्य अनुभव मिलते रहेंगे । मेरे दिलमें इश्वर के साकार दर्शन की भावना थी । उसकी पूर्ति के लिये मैं निरंतर प्रार्थना करता था । उन दिनों प्रार्थना मेरे लिये एकमात्र साधन था एसा कहना गलत नहीं होगा । जो चिज की मुझे जरूरत होती, मैं ईश्वर के आगे प्रार्थना के माध्यम से व्यक्त करता, उसकी कृपा की कामना करता । जिस तरह बच्चा अपनी माँ के लिये रोता-बिलखता है, बेचैन होता है, मैं भी ईश्वर के लिये बेचैन होकर रोता था । तीव्र भावसंवेदन और उत्कट प्रार्थना में मेरे दिन कब निकलते उसका मुझे पता भी नहीं चलता । आज तक प्रार्थना का क्रम जारी है । किसी भी इच्छा की पूर्ति के लिये मैं आज भी प्रार्थना का सहारा लेता हूँ । प्रार्थना ने मेरे लिये किसी सिद्ध मंत्र का कार्य किया है । ये कहने में मुझे कोई हिचकिचाहट नहीं की प्रार्थना के फलस्वरूप ईश्वर ने मुझे अपनी कृपावर्षा से लाभान्वित किया है, साधना के विभिन्न अनुभवों से कृतार्थ किया है ।
इश्वर के साकार दर्शन के लिये मैं अपनी रुचि अनुसार हररोज प्रार्थना करता था । ध्यान में बैठने के लिये सुबह द्वार बन्द करता और फिर मेरी दशा करुण हो जाती । मुझे लगता की एक ओर दिन बीत गया और मेरी अभिलाषा की पूर्ति नहीं हूई । प्रभु मेरी ईच्छा कब पूर्ण करेंगे ? और यही सोचकर आँख से भावाश्रु चलने लगते ।
एक दिन प्रभु की कृपा हुई । वो दिन मेरे लिये आशीर्वादरूप सिद्ध हुआ । सुबह ध्यान और प्रार्थना करते-करते मेरा देहाध्यास छूट गया, शरीर मानो निश्चेत हो गया । उस अवस्था में मुझे जो अलौकिक अनुभव मिला उसे याद करते हुए आज भी मेरा हृदय भावविभोर हो जाता है । मुझे भगवान राम के दर्शन हुए । उनका स्वरूप अत्यंत मधुर था, मैंने एसा सुंदर स्वरूप पहले कभी देखा नहीं था । वे खडे थे, उन्होंने पितांबर धारण किया था, उनके गले में माला और सर पर मुकुट था । वो मेरी तरफ देख रहे थे । उनकी दृष्टि की मधुरता का वर्णन करने के लिये मेरे पास शब्द नहीं है । तकरीबन पांच मिनीट तक दर्शनानुभव चला । फिर मुझे होश आया, मैं ध्यान से उठा मगर मेरा मन शांति के सागर में डूबा था, अंतर आनंद से उछल रहा था ।
कुछ देर के बाद मैं कमरे से बाहर निकला तब मेरे मुख पर छलक रहे आनंद से चंपकभाई को अंदाजा हुआ । मैंने चंपकभाइ को लिखकर मेरे अनुभव के बारे में बताया । दर्शन के अनुभव की बात से चंपकभाइ बहुत प्रसन्न हुए ।
मैंने श्रीराम के दर्शन की कामना नहीं की थी, और ना ही कोई विशेष परीश्रम किया था । फिर भी ईश्वर ने मेरी भावना की पूर्ति की, यह मेरे लिये आनंद की बात थी । शायद उसके लिये मेरे पूर्वजन्म के संस्कार कारणभूत थे । जो भी हो, भगवान राम के दर्शनानुभव से मुझे अत्यंत हर्ष हुआ । अनुभव ध्यान या समाधि दशा में हुआ था, और किसी भी प्रकार का शाब्दिक वार्तालाप से रहित था, फिर भी मेरे लिये अनमोल था । हर्षाश्रु से छलकती हुई आँखों से मैंने भगवान राम के चरणों में प्रणिपात किया ।

