Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
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कुछ ही देर में अंधेरा हो गया । मुझे लगा की अब मुझे रास्ता नहीं दिखाई देगा । आसपास दूर तक कोई धर्मशाला नहीं थी । अब मैं क्या करूँ ? जहाँ रास्ता ही न दिखाई दे तो आगे बढने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता । या तो गंगाजी के तट पर किसी बडे-से पत्थर पर सो जाउँगा या फिर सडक के किनारे रात गुजारूँगा । हाँ, जंगली जनावर यहाँ आ सकते हैं मगर उससे मुझे क्या ? इश्वर की कृपा से मुझे कुछ नहीं होगा । वो जो भी करेगा, अच्छा करेगा - इसी भरोंसे के साथ मैं 'श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव' मंत्र का गान करते करते चलने लगा । तभी कहीं से मुझे आवाज सुनाई दी । मुझे लगा की शायद इश्वर ने मेरी सहायता के लिये किसीको भेजा है । कुछ ही क्षणों में मैंने दो पुरुष और एक स्त्री को मेरी करीब आते हुए देखा ।

पास आने पर आदमी बोला, 'बाबा, किसके बल पर इतनी अंधेरी रात में चल रहे हो ?'

'और किसके ?' मैंने उत्तर दिया, 'ईश्वर के भरोंसे पर । इसके अलावा और किसका भरोसा हो सकता है भला ?'

मगर मेरे उत्तर से उसको तसल्ली नहीं हुई । ऊँची आवाज में वो बोला, 'ईश्वर के बल पर ? ठीक है, तो फिर चलते रहो ईश्वर के बल पर ।'

और वे अंधकार में गर्त हो गये । मैं प्रभुस्मरण करते हुए फिर आगे चलने लगा ।

कुछ ही देर में वह आदमी फिर आया और मुझे प्यार से कहने लगा : 'आपको कहाँ जाना है ?'

'टिहरी ।'

'टिहरी ? टिहरी तो अभी कम-से-कम वीस माइल की दूरी पर है । पास में कोई धर्मशाला भी नहीं है । हमारा गाँव यहाँ पास में है, आप वहाँ चलो और रात हमारे घर रुको । सुबह होते फिर निकल जाना । हम आपको टिहरी के रास्ते पर छोड देंगे । यहाँ से तकरीबन देढ मील की दूरी पर महादेव का मंदिर है । आज वहाँ मेला लगा था, इसलिये वहाँ जाकर हम वापिस लौट रहें हैं । आपको हमारे यहाँ किसी भी प्रकार की कोई तकलिफ नहीं होगी ।'

चारों ओर अंधेरा फैल चुका था । मुझसे एक बार बात करके चले जाने के बाद वो वापिस आया था । मुझे लगा की इसके पीछे अवश्य ईश्वर की प्रेरणा है, इसलिये मैंने उसके निमंत्रण का स्वीकार किया । ईश्वर ने एन मौके पर मेरे लिये ही उन्हें भेजा, यह सोचकर मेरा मन भावविभोर हो गया । उनमें से एक के पास बैटरी थी, उसके प्रकाश में सडक छोडकर पहाडी रास्तों पर हम चलने लगे ।

आधे घण्टे के बाद हम पहाड पर बसे छोटे-से गाँव में आ पहूँचे । पहाड की टोच पर मैदान था । फैले हुए छोटे-छोटे मकान कोई स्वप्ननगरी का आभास देते थे । बेटरी के उजाले में चारों ओर हरियाली दिखाई दी, मुझे लगा की यहाँ खेतीबाडी अच्छी होगी । अंधरे में ओर जो भी दिखाई पडा उससे गाँव ठीकठाक होने का अनुमान लगाया ।

मेरे साथ चल रहे आदमी के साथ मैंने छोटे-से घर में प्रवेश किया । ठंड सख्त थी और हम पहाड की चोटी पर पहूँच चुके थे । हवा जोरों से चल रही थी । एक छोटे-से कमरे में ले जाकर उसने मुझे प्यार से बैठने को कहा, वो भी साथ में बैठा । फिर मिलकर उन्हों ने लकडीयाँ जलायी और हमारे बीच वार्तालाप का प्रारंभ हुआ ।

एक आदमी ने पूछा : 'बाबा, इतनी कम उम्र में साधु क्यूँ हुए ?'

मैंने कहा: 'इश्वर की इच्छा । उसकी इच्छा के बगैर कुछ होता है भला ? मानवजीवन अति दुर्लभ है, उसका सदुपयोग करके हमें परमात्मा की प्राप्ति करनी है । मन को संसार से हटाकर परमात्मा में लगाना है, और इसके लिये बूढे होने तक इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है । बूढे होने तक हम जीन्दा रहेंगे भी या नहीं इसका क्या भरोसा है ? जीवन तो चंचल छे, हर क्षण निकलता जा रहा है और कब खत्म हो जायेगा, कुछ पता नहीं । इसलिये हो सके उतना जल्दी इश्वरदर्शन के लिये प्रयास करने चाहिये । युवानी में साधना करने से प्रभु की प्राप्ति शीघ्र होती है । जवाँ आदमी जो चाहे कर सकता है क्योंकि उसका शरीर चुस्त और मन फूर्तीला होता है । जिस चिज में वो उसे लगाना चाहे, लगा सकता है । मगर ज्यादातर लोग ऐसा नहीं करते, वे अपनी शक्ति सांसारिक पदार्थों की प्राप्ति में गवाँ देते है । विषयी पदार्थों के पीछे भागते हैं और ईश्वर को भूल जाते हैं । मेरे कहेने का यह मतलब नहीं है की सबको संसार का त्याग करना चाहिये । मेरे कहने का यह मतलब है की जो श्रध्धावान है, उत्साह से भरा है, उसे संसारिक आकर्षणों से मुक्त होकर ईश्वर की कृपा के लिये प्रयास करने चाहिये । यह कार्य कठिन जरूर है मगर नामुमकिन नहीं है । मन तथा इन्द्रियों के संयम से वह एसा अवश्य कर सकता है, और एसा करनेवाला ही सही मायने में शूरवीर है ।'

पहाडों में चलने का ये मेरा पहला दिन था । मैं काफि थक चुका था और विश्राम करना चाहता था । उन्होंने कहा, 'कुछ खाये बिना आराम करना ठीक नहीं है । अभी रोटी बन रही है, खाना खाकर ही आप विश्राम करना ।'

उनके प्रेमाग्रह से मैंने भोजन किया और फिर विश्राम किया । सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर मैंने कहा, 'अब मुझे टिहरी का मार्ग दिखाईये ताकि मैं शाम तक वहाँ पहूँच जाउँ ।'

'रास्ता तो जरूर दिखायेंगे मगर इतनी जल्दी क्या है ?' उन्होंने कहा, 'आपको हम एसे ही थोडे जाने देंगे ? अभी कुछ देर में खाना हो जायेगा । आप भोजन करने के बाद चले जाना । आपको रास्ता दिखाने के बाद हम अपने खेत में चले जायेंगे । वैसे भी टिहरी के रास्ते में कोइ गाँव नहीं पडता और वहाँ पहूँचते-पहूँचते शाम हो जायेगी । आप के लिये बहेतर यही होगा की आप यहाँ से भोजन करके निकले ।'

मैंने कहा, 'मुझे चिंता नहीं है, ईश्वर दयालु है और मुझे पूरा भरोंसा है की जब जरूरत पडेगी वह आवश्यक सुविधा उपलब्ध कर देगा । आपने मेरी जो खातिरदारी की है वो काफि है ।'

मगर वे नहीं माने । मेरे लिये उनकी बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं था । थोडी देर में दालरोटी की थाली तैयार हो गई और मैंने भोजन किया । तत्पश्चात मैं अपना सामान लेकर जैसे ही निकला उन्होंने मुझे पैसे देने चाहें । कहने लगे 'पैसे आपको रास्ते में काम आयेंगे । यदि जरूरत न पडे, तो टिहरी जाकर शाम को दूध पी लेना ।'