प्रभुदत्त ब्रह्मचारी से भेंट

हिमालय की शोभा अवर्णनीय है । आसमाँ को छूने के लिये उत्सुक बर्फिले पहाडों को देखकर जी नहीं भरता । चांदनी रात में जब चंद्रमा के चारु किरण गंगाजी पर, बर्फिली चोटीयों पर तथा आसपास सर्वत्र फैल जाते हैं तो लगता है की अमृतवर्षा हो रही है । एसे अलौकिक वातावरण में मन अपने आप शांत-स्थिर होता हो जाता है तथा परमात्मा का चिंतन करने लगता है । हमारे शास्त्रों तथा महापुरुषों ने एकांत में जाकर साधना करने की बात कही है, उसका मर्म यहाँ आने पर पता चलता है । संसार की नश्वरता तथा परिवर्तनशीलता के बारे में मन अपने आप सोचने लगता है । हमें लगता है की जीवन परमात्मा की प्राप्ति के लिये ही मिला है । हमें हो सके इतना जल्दी इस ध्येय को हासिल करना है ।

मानवजीवन असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से ज्ञान की ओर, अल्पता से पूर्णता की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर प्रयाण करने के लिये मिला है । विषय-सुख को त्यागकर हमें प्रभु के दिव्यरस का आस्वाद करना है । प्रार्थना के यह शब्द मन में गूँजने लगते है ..

असत्यो मांहेथी प्रभु, परम सत्ये तुं लई जा,
ऊंडा अंधारेथी प्रभु, परम तेजे तुं लई जा,
महामृत्युमांथी अमृत समीपे नाथ, लई जा,
तुं-हीणो हुं छुं तो तुज दरशनां दान दई जा !

तीर्थयात्रा से, कथाकीर्तन या किसी संतमहात्मा के सत्संग से, मन में एसे भाव पैदा होते है । मगर अफसोस, वर्षाऋतु में चमकनेवाली बीजली की भाँति ये प्रकट होकर अदृश्य भी हो जाते हैं । जैसे स्मशान जाने से वैराग्य की भावना प्रदीप्त हो उठती है मगर वहाँ से निकलने के बाद वह अपने आप शांत हो जाती है, बिल्कुल वैसे ही तीर्थ, देवमंदिर, कथाकीर्तन या सत्संग से मन में जो पवित्र तरंग उठते है वो आदमी की जडता की वजह से झट-से शांत हो जाते है । हमें एसे पवित्र भावों को लंबे अरसे तक, सानुकूल या प्रतिकूल – किसी भी परिस्थिति में यथावत रखना हैं । जागृति और सतत साधना से हम एसा कर सकते हैं । एसी स्थिति होने पर व्यक्ति पूर्ण आनंद का अनुभव करता है । वो फिर स्वयं तीर्थरूप बन जाता है । वो जहाँ कहीं भी जाता है, तीर्थ के जैसा पवित्र वातावरण वहाँ पैदा हो जाता है । उसके विचार, भाव तथा संस्कार की त्रिवेणी में स्नान करनेवाले लोग धन्यता का अनुभव करते हैं ।

विवेकी पुरुषों को बदरीनाथ के शांत और पवित्र वातावरण में एसी ही धन्यता का अनुभव होता है मगर यहाँ लम्बे अरसे तक रहना आसान नहीं है । खानेपीने की असुविधा तथा कडाके की सर्दी के कारण लोग एक-दो दिन में यहाँ से चल पडते हैं ।

बदरीनाथ में चरणपादुका नामक अत्यंत मनोहर स्थान है । यह स्थान पहाड की चोटी पर स्थित है, उसके आसपास विशाल मेदान है, पानी के झरने है, तथा रंगबिरंगी फुलों का नजारा है । यहाँ से थोडी दूरी पर छोटी-सी गुफा है ।

जब हम बदरीनाथ गये तब श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारीजी बदरीनाथ में थे । मंदिर के पास ही उनका कमरा था इसलिये उनके दर्शन का लाभ हमें अनायास मिल गया । उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवनचरित्र का श्री चैतन्य चरितावलि नामक गुजराती अनुवाद किया था । उसको पढने के बाद उनकी विद्वता और चैतन्य-प्रीति के लिये मुझे मान हुआ था । हरिद्वार में सर्वप्रथम उनसे मेरी भेंट हुई थी । तबसे हमारे बीच परस्पर प्रेम का प्रादुर्भाव हुआ था । बदरीनाथ में उनको मिलकर हमें बडी खुशी हुई ।

संतो का समागम हमेशा सुखदायी होता है । सत्संग की सरिता में स्नान करने से मन धन्यता का अनुभव करता है । सत्संग का आकर्षण कभी कम नहीं होता, और यही कारण है की हम हमेशा सत्संग की कामना करते हैं । मेरे साथ माताजी को देखखर प्रभुदत्तजी को विशेष हर्ष हुआ । हमें देखकर वे बार-बार प्रसिद्ध श्लोक 'कुलम् पवित्रं जननी कृतार्था' बोलने लगे । सच्चे संतो का स्वभाव उदार और सरल होता है । सच्चे संतपुरुष हंसो की भाँति होते है, वे केवल औरों के गुण देखते हैं, और उनके अवगुणों को नजरअंदाज करते है । स्वयं मान के अधिकारी होने के बावजूद वे औरों का सन्मान करते है । उनके विचार, वाणी और वर्तन मंगलमय होतें हैं । वे सारे संसार की शोभा हैं । उनके दर्शन प्रेरणादायक होते हैं । प्रभुदत्तजी एसे ही उच्च कोटि के संत थे । वे मेरा सम्मान और प्रशंसा करे, उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी । संसार त्रिगुणात्मक प्रकृति से भरा है, उसमें शुभ तथा अशुभ - दोनों हैं । किसीका बुरा देखकर उसका तिरस्कार करना ठीक नहीं है । हमें तो सब में शुभ का दर्शन करना चाहिये ।

जब तक हम बदरीनाथ रहें, हमें प्रभुदत्तजी की ओर से मंदिर का प्रसाद मिलता रहा । प्रभुदत्तजी को भजनकीर्तन पर विशेष प्रेम था इसलिये रात को मैं उन्हें गुजराती भजन सुनाता था । गुजराती पूर्णतया न समजने के बावजूद वे मेरे भजन के भावों को ठीक तरह से समझ लेते थे ।

उस दिनों प्रभुदत्तजी के पास एक ओर महात्मा आते थे । वे लाल वस्त्र पहनते थे और बडे गंभीर होकर चलते थे । उन्हें देखकर लगता था मानों हनुमानजी स्वयं प्रकट हुए हो । उनकी प्रणाम करने की रीत अनोखी थी । योग की विभिन्न मुद्राएँ तथा आसनों का समन्वय करके वे प्रभुदत्तजी को प्रणाम करते थे । जो भी उन्हें देखता वो आश्चर्यचकित हो जाता था । मैंने भी आज तक किसीको इस प्रकार प्रणाम करते हुए नहीं देखा । जैसे ही वे प्रभुदत्तजी के कमरे में प्रवेश करते, प्रभुदत्तजी हनुमान-स्तुति के श्लोक बोलकर उनका सत्कार करते थे । दोनों महापुरुषों को साथ में देखकर लगता था की विद्वता और अनुराग का संगम हो रहा है ।

मनोजवं मारुततुल्यवेग जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरीष्ठम्,
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्री रामदूतं शरणं प्रपद्ये.
अतुलित बलधामं  स्वर्णशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं  ज्ञानिनामग्रगण्यम्,
सकलगुणनिधानं  वानराणामधीश रघुपतिवरदूतं वातजातं नमामि ।

उनकी बैठने की शैली भी अनोखी थी । हनुमानजी की तरह वे एक पैर खडा रखकर अर्ध वज्रासन में बैठते थे । वे मौनव्रत रखते थे फिर भी हररोज सुबह प्रभुदत्तजी के पास आते थे । उन्हें देखकर मुझे बडी प्रसन्नता होती थी । जो लोग दूसरों के सत्कार और नमस्कार स्वीकार करने के आदी हो गये हैं उन्हें कैसे पता चलेगा की औरों को नमस्कार करने तथा औरों का सत्कार करने के लिये कितनी विनम्रता आवश्यक है ? इन दो महापुरुषों के परस्पर प्रेममय आचार से हमें बहुत कुछ सिखना है ।

बदरीनाथ की हमारी यात्रा विभिन्न कारणों से यादगार हो गई । मैं चाहता था की कुछ दिन यहाँ रहें मगर एसा करना संभव नहीं था । आखिरकार बदरीनाथ की पुण्यभूमि को अलविदा कहकर हम निकल पडें ।

 

Today's Quote

Wise people talk because they have something to say; fools, because they have to say something.
- Plato

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