अयोध्या और काशी

जब ऋषिकेश से हम निकले, तब देश के राजकीय हालात तंग थे । देशभर में 'भारत छोडो' आंदोलन जोरों से चल रहा था । देशवासीओं में जागृति, संगठन और एकता की लहर फैली थी । राजकीय नेता तथा जनता आजादी पाने की जल्दी में थे । मेरा ध्यान वैसे तो आत्मिक उन्नति में लगा था, मगर देश जल्द-से-जल्द आजाद हो, इसके लिये मैं हमेशा प्रार्थना करता था । मैं चाहता थी की भारत अपना खोया हुआ सम्मान फिर से हासिल करे । मेरे विचार खत के माध्यम से मैं नारायणभाई को लिखता रहेता था । वे मुझे अच्छी तरह से समझते थे ।

माताजी को हरिद्वार के सिद्धाश्रम में छोडकर मैं दहेरादून गया । चंपकभाई की तबियत अभी भी नाजुक थी । वो मेरे साथ गुजरात आना चाहते थे मगर उनकी अस्वस्थता उन्हें इजाजत नहीं दे रही थी । अतः मैं और माताजी गुजरात चलें और स्वास्थ्य ठीक होने पर चंपकभाई गुजरात आयें एसा तय हुआ । दहेरादून से हरिद्वार लौटने पर मेरी महात्मा वेदबंधु से भेंट हुई । कुछ वक्त हरिद्वार में बीताकर हम गुजरात के लिये निकले ।

हिमालय की पवित्र भूमि में मुझे लंबे अरसे तक रहने का सौभाग्य मिला, यह ईश्वर की परम कृपा थी । उसे मैं कैसे भूल सकता था ? इस संसार में बहुत सारे लोग है जो ईश्वर के अनंत उपकारों को भूल जाते हैं । ईश्वर की बात छोडो, स्वार्थी लोग तो आम आदमी से मिली सहायता को भूल जाते हैं । ईश्वर ने हमें बहुमूल्य मानव-जीवन दिया है, ताकि हम इस सृष्टि को बहेतर बना सकें । हमें चाहिए की हम अपने अविचारी कृत्यों से उसे नष्ट न करें । कृतज्ञ होना या कृतघ्न होना हमारे हाथ में है ।

हरिद्वार से निकलने के बाद मेरी तबियत खराब हुई । माताजी की तबियत पहेले-से नाजुक थी, अब मुझे जुलाब की बिमारी हुई । फिर भी हिंमत रखकर हम हरिद्वार से अयोध्या होकर काशी पहूँचे । सात मोक्षदायी नगरों में अयोध्या और काशी की गणना होती है । हालाकि इसका यह मतलब कतै नहीं की दुसरे शहरों में रहने से मुक्ति का महाआनंद नहीं मिलता । मुक्ति का संबंध किसी स्थान से नहीं मगर हमारे कर्म और मन से है । अगर हमारा मन निर्मल, निरहंकारी है तो परमात्मा का साक्षात्कार करके हम मुक्ति पा सकते हैं ।

अयोध्या और काशी की महिमा के पीछे उसका पौराणिक इतिहास कारणभूत है । अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि तथा राजधानी है । सरयू नदी का पट यहाँ काफि चौडा है । नदी के तट पर कई मंदिर है । अयोध्या में सभी जगह बंदरो के समुह दिखाई पडते है । राम-जन्मस्थान के करीब मस्जीद है, जो मध्ययुग में मुस्लीमों द्वारा की गई असहिष्णुता की याद दिलाती है । अयोध्या की यात्रा करते वक्त मन में राम और सीता की मूर्ति उभर के सामने आती है । हाँलाकि भगवान राम की महिमा को निकाल कर देखें तो अयोध्या अपने आप में इतना आकर्षक नहीं है ।

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काशी प्राचीन भारत की विद्याभूमि है । यहाँ रामानंद, कबीर, तुलसीदास जैसे कई महान संतपुरुष हो गए । 'काशी में मरनेवाला मुक्ति पाता है' – यह वचन में आस्था रखकर आम आदमी से लेकर मेधावी संतपुरुष यहाँ आते रहें हैं । काशी में गंगाजी का प्रवाह अत्यंत मनोहर लगता है । हम विश्वनाथ मंदिर के करीब ठहरे थे इसलिये हमें गंगादर्शन का लाभ मिलता रहा । यहाँ भगवान विश्वनाथ-मंदिर के बगल में मस्जीद है । भगवान विश्वनाथ का मंदिर छोटा है । काशी के पंडीतो ने इसी मंदिर में तुलसीदास के रामचरितमानस की परीक्षा ली थी । विभिन्न ग्रंथो को एक के उपर एक करके रखने के बाद मंदिर के द्वार बन्द कर दिये गये थे और भगवान से प्रार्थना की गई थी की जो ग्रंथ श्रेष्ठ हो वो सबसे उपर मिले । दूसरे दिन जब मंदिर के द्वार खोले गये तो तुलसी-रामायण सबसे उपर पाया गया था । भगवान शंकर ने इस तरह से तुलसीदास पर कृपा की थी । प्रसिद्ध विद्वान श्री मधुसुदन सरस्वती तब काशी में रहते थे । उन्होंने इसी घटना के पश्चात तुलसीदास के रामायण की प्रसंशा की थी ।

काशी के मार्ग गन्दकी से भरें है । हम अपने तीर्थों के लिये गौरव लेते है मगर हमारे तीर्थधाम स्वच्छ नहीं है । हम अपने यात्राधामों को गंदकी, अनीति तथा अधर्म से बचाने होंगे । विदेशी पर्यटक हमारे तीर्थधामों को देखकर हमारी संस्कृति का मूल्यांकन करते हैं । उनके लिये तथा हमारे लिये भी हमें अपने तीर्थधामों को स्वच्छ रखना चाहिए ।

काशी में असिघाट तथा मणिकर्णिका घाट सुप्रसिद्ध है । असिघाट की बगल में तुलसीघाट है जहाँ पर तुलसीदास ने निवास किया था और समाधि ली थी । रामचरितमानस की रचना करके तुलसीदासजी ने भारतीय धर्म और संस्कृति की बहुमूल्य सेवा की है । असिघाट को देखकर हमें तुलसी का यह प्रसिद्ध दोहा याद आया -

संवत सोलहसें असी असि गंग के तीर ।
श्रावन शुकला सप्तमी तुलसी तज्यो शरीर ॥

बहुत सारे लोगों को शायद यह मालूम नहीं होगा की तुलसीदास ने ८० साल की उम्र में रामचरितमानस की रचना की थी ।

असिघाट पर नाव में हरिहर बाबा रहते थे । उनके दर्शन का लाभ हमें मिला । उन्होंने मौनव्रत धारण किया था । उनके भक्त वहाँ रामधून कर रहे थे ।

काशी के निवास दौरान माताजी और मुझे पेट में खराबी से राहत नहीं मिली । इसलिये हम मालवियाजी के हिन्दु विश्वविद्यालय को देखने के लिये न जा सकें ।

काशी में हम पांच दिन रूके । काशी आने से पहले हम प्रयागराज गये थे । बारिश की मौसम होने के कारण गंगा तथा जमना में पानी का प्रवाह प्रचंड था । त्रिवेणी में स्नान करने के बाद हमने पूरे दिन नौकाविहार किया । तबियत खराब होने के कारण हम प्रयाग में ज्यादा नहीं रुके । हमने काशी होकर मथुरा जाने का निर्णय किया ।

 

Today's Quote

If you want to make God laugh, tell him about your plans.
- Woody Allen

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