पुलिनबाबु से भेंट

रामकृष्णदेव ने अपनी उपासना से जिसको प्रसन्न किया था तथा दिव्यरूप में हमेशा साथ रहने के लिये बाध्य किया था, एसे काली माता के आगे मैंने भावविभोर होकर हाथ जोडें । मेरे नैन प्रेमाश्रु से छलक उठे । मा ! आप अविचल क्यूँ हो ? आपके दर्शन करने के लिये मैं हिमालय से यहाँ आया हूँ, फिर भी आप चुपचाप हो ? आप मुझसे बातें क्यूँ नहीं करती, मुझे गले क्यूँ नहीं लगाती ! आप तो 'मा' हो, बच्चों की गलतियों को माफ करना, उन्हें बेवजह प्यार करना आपका स्वभाव है । 'मा', मुझे अपनी शरण में ले लो, अपने प्यार के आँचल में मुझे छुपा लो । आपको मुझे दर्शन देना ही होगा । मुझे श्रद्धा है की आप मुझे निराश नहीं करोगे ।

'मा' को प्रार्थना-स्तुति करके मैं मंदिर के ट्रस्टीओं को मिला और कुछ दिन रहने की अनुमति माँगी । उन्होंने मेरी बात यह कहकर टाल दी की मंदिर में किसीको रहने की अनुमति नहीं है ।

मैंने अपनी कोशीश जारी रखते हुए कहा, ठीक है, मगर किसी योग्य व्यक्ति को जाँच-पडताल करने के बाद तो आप रख सकते हैं । आप ही मंदिर के सर्वेसर्वा है । फैंसला करना आप पर निर्भर है ।

मगर ट्रस्टीओं ने मेरी बात सुनी-अनसुनी कर दी । उनके व्यवहार से मुझे ठेस पहूँची । मैंने दलील करना उचित नहीं समजा । मन-ही-मन सोचा की रामकृष्णदेव मुझे प्रेरणा करके यहाँ लाये है तो वो कुछ नहीं करेंगे ?

फिर भीतर-से आवाज आयी, क्यों नहीं करेंगे? जरूर करेंगे । मुझे अपने पास रखना मुमकिन नहीं तो वे मुझे हिमालय से यहाँ क्यूँ लाते ? इसी आशा से मेरे मन का समाधान हुआ ।

मंदिर से होते हुए मैं रामकृष्णदेव के कक्ष में आया । उनका कक्ष जैसा था वैसा ही - सुरक्षित रखा गया है । उनका पलंग, पानी का मटका, कुछ बरतन – सब वैसे-के-वैसे पडे थे । हाँ, उनकी अनुपस्थिति दिवाल पर टँगी उनकी और शारदा माता की तसवीरें बयाँ करती थी । मैंने उनको भावविभोर होकर प्रणाम किया । यहाँ नीरव शांति थी । मैं सोचता रहा की रामकृष्णदेव की मौजूदगी में यह स्थान कितना सजीव लगता होगा ! उनके मनमोहक वार्तालाप से गूँजता हुआ, उनके भक्त एवं प्रसंशकों से भरा-भरा यह स्थान कितना अलौकिक लगता होगा ! अब हमारे पास उन दिनों के दो ही साक्षी बचे हैं – एक तो यह कक्ष और दूसरी, पास में किलकिलाट करके बहती हुई गंगाजी । काश, ये हमें उन दिनों के बारे में कुछ बता सकतें तो न जाने कितनी कहाँनीया हम सुन पाते !

रामकृष्णदेव के कक्ष में बैठकर मुझे लगा, मानो मैं अपने ही घर में हूँ । मेरे आनंद की कोई सीमा नहीं थी । इतने में वहाँ एक सज्जन पुरुष दिखाई आये । उनके वस्त्र गीले होने से मैने अनुमान किया की वे गंगा-स्नान से लौटे है । उन्होंने आकर मुझे नमस्कार किया । मैंने सोचा, शायद मेरे प्रेमाश्रु देखकर वे मेरे प्रति आकर्षित हुए होंगे ।

उनका नाम पुलिनबाबु था । वे दक्षिणेश्वर की बगल के गाँव में निवास करते थे । जब उनके पिताजी जिवीत थे, तब रामकृष्णदेव उनके घर जाया करते थे । अपनी धर्मपत्नी के साथ पुलीनबाबु नियमित रूप से यहाँ दर्शन के लिये आते थे । दोनों रामकृष्णदेव के अनन्य भक्त थे, उनको ही अपना इष्ट मानते थे । पिछले दस सालों से पुलिनबाबु कोई नोकरी या व्यवसाय नहीं करते थे, इसलिये उनकी आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं थी । रामकृष्णदेव का सुमिरन करना मानो उनका एकमात्र व्यवसाय था । उनकी धर्मपत्नी धार्मिक प्रकृति की थी और रामकृष्णदेव में अपार आस्था रखती थी । समान रुचिवाले एसे भक्त-दंपती दुनिया में बहुत कम पाये जाते हैं ।

मेरा परिचय पाकर पुलिनबाबु प्रसन्न हुए । मुझे तसल्ली देते हुए उन्होंने कहा, फिकर मत करो । मेरा मित्र, जो की रामकृष्णदेव का अनन्य भक्त है, यहाँ का ट्रस्टी है । उनको कहकर मैं आपके रहने का इन्तजाम कर दूँगा ।

मैंने कहा, आपका बहुत बहुत शुक्रिया । खाने-पीने की मुझे फिकर नहीं है, वो तो ईश्वरकृपा से हो जायेगा । मगर मेरे रहने का इन्तजाम हो जाता है तो मैं आपका आभारी रहूँगा ।

हम बातों में उलझे थे की उनका मित्र - नेपालबाबु वहाँ आ पहूँचे । उन्होंने मन्दिर के पूजारी और दरवान को सुचना देकर मेरे रहने का इन्तजाम कर दिया । ईश्वर की कृपा से, मेरी परेशानी का सुखद अंत हुआ ।

रामकृष्णदेव के कक्ष के बाहर बैठकर मैं भजन लिखने और गाने लगा । पुलीनबाबु या उनकी धर्मपत्नी को हिन्दी समज में नहीं आती थी और मुझे बंगाली । इसलिये बीच-बीच में रुककर मैं 'मा' काली तथा रामकृष्णदेव पर लिखी जानेवाली पंक्तियाँ उनको अंग्रेजी में समजाता था । भजन लिखते वक्त आँखों से निरंतर अश्रुप्रवाह बहेता था । कभी कभी तो भावावेश में आकर मैं इतना जोर से रो पडता की मंदिर के पूजारी तथा अन्य लोग विस्मय से इकट्ठा हो जाते । मेरी अवस्था कुछ एसी हो जाती थी जिसके उपर मेरा कोई अंकुश नहीं था । रामकृष्णदेव के पास आकर मेरे हृदय के भाव रुकनेवाले नहीं थे । मन्दिर का पूजारी सुबह-शाम नमस्कार करके मुझे कहता, की आपके दर्शन से हम पावन हो गये । इश्वर के लिये इतना प्रबल प्रेम हमने आज तक नहीं देखा । वो बडे प्यार से रामकृष्णदेव को चढाया हुआ भोग मुझे प्रसाद में देते थे, जिससे शाम को खाने की जरूरत नहीं रही । सुबह खाने के लिये पुलिनबाबु मुझे अपने घर ले गये ।

जैसे ही मैं पुलिनबाबु के घर खाने के लिये बैठा की पुलिनबाबु बोल पडे, 'पिताजी के वक्त जब रामकृष्णदेव यहाँ आते थे तो जहाँ आप अभी बैठे हो, वहीँ बैठते थे ।' रामकृष्णदेव के प्रति उनका प्रेम और पूज्यभाव वंदनीय था । अपने घर में उन्होने परमहंसदेव की पूजा के लिये अलग कमरा रखा था । रात को दोनों, पतिपत्नी वहाँ बैठकर ध्यान-जप एवं पूजा करते थे ! धन्य है एसा गृहस्थाश्रम ! एसे अदभुत सेवाभावी और भक्त दंपति के महेमान बनकर मुझे असाधारण आनंद हुआ ।

वहाँ से लौटकर शाम को मैं फिर रामकृष्णदेव के कक्ष के निकट बैठा । वहाँ आते ही मेरा हृदय आक्रंद करने लगा । अंतर के अंतरतम से पुकार हुयी, हे प्रभु, हे देव ! मेरे हृदय के भावों को स्वीकार करो, मुझे अपने दर्शन का दान दो । मुझे शांति प्रदान करो, मुझे पूर्णता का वरदान दो । मैं आपके महिमा को सुनकर यहाँ आया हूँ, अब आप मुझे दर्शन देने में देर न करो !

रामकृष्णदेव ने जहाँ अपने हाथों से पंचवटी की रचना की थी, उस छोटे-से मकान की छत पर मैं रात गुजारता रहा । वैसे भी, रात को सोने मुझे आदत नहीं थी । मेरा ज्यादातर वक्त जप और ध्यान में व्यतीत हो जाता था । पंचवटी के इस पवित्र स्थान में रामकृष्णदेव ने अपने हाथों से वृंदावन की मिट्टी बिछाई थी । यहाँ रहकर उन्होंने रातभर ध्यान-साधना की थी । वही स्थान में बैठकर साधना करने का अनुभव कितना अलौकिक था वो मैं लब्जों में कैसे बयाँ करूँ ? रात की नीरव शांति में हिमालय, रामकृष्णदेव और मेरी आगे की साधना के बारे में चिंतन करते हुए मैं दक्षिणेश्वर की अदभूत शांति में खो जाता था ।

 

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We are not human beings on a spiritual journey, We are spiritual beings on a human journey.
- Stephen Covey

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