बदरीनाथ की पुण्यभूमि में

उस साल बदरीनाथ की पुण्यभूमि में जाकर कुछ वक्त साधना में गुजारनेका खयाल मन में आया । जब मैं बदरीनाथ के लिये निकला तो मेरे साथ महात्मा कुलानंद जुडें । महात्मा कुलानंद प्रयाग के किसी मठ में रहते थे मगर वहाँ का तत्कालीन माहौल ठीक नहीं होने-से देवप्रयाग आये थे और रघुनाथ मंदिर की कुटिया में ठहरे थे । उनकी आध्यात्मिक अवस्था उच्च थी । वे काशी में समाधिस्थ हुए प्रसिद्ध संत सच्चेबाबा के शिष्य थे । सच्चेबाबा की प्रेरणा एवं पथप्रदर्शन से उनका जीवन चलता था । कुलानंदजी ने मुझे उनके अनुभव सुनाये, जिनमें से एक का जीक्र करना मैं जरूरी समजता हूँ ।

बदरीनाथ के मार्ग में श्रीनगर पडता है । रात होने पर हम वहाँ रुके थे । सुबह में उन्होंने कहा : 'मेरे गुरु सच्चेबाबा समर्थ महापुरुष है । उनकी मुझ पर विशेष कृपादृष्टि है । वे मेरा निरंतर मार्गदर्शन करते है । आज सुबह उन्होंने मुझे आपके पूर्वजन्म के बारे में बताया ।'
मुझे बडा आश्चर्य हुआ ।

'मेरे पूर्वजन्म के बारे में ?'
'हा, आपके पूर्वजन्म के बारे में ।'
मैंने पूछा : 'आपको उन्होंने क्या कहा ?'
'उन्होंने कहा की आप पूर्वजन्म में ... थे । क्या यह सच है ?'
'आपके समर्थ गुरु द्वारा बतायी गई बात गलत कैसे हो सकती है ?'
फिर मैंने धीरे-से कहा : 'कृपया, आप इस बात को अपने तक ही रखना । किसीको इसके बारे में मत बताना । यह माहिती गोपनीय है, और केवल मेरी भलाई के लिये उपलब्ध की गई है । लोग इसे समज नहीं पायेंगे और बात का बतंगड बना देंगे ।'
'आपकी बात मैं समज सकता हूँ ।'

इस घटना के बाद महात्मा कुलानंद तथा उनके गुरु के प्रति मुझे विशेष पूज्यभाव हुआ ।

सन १९४४ में अतिन्द्रीय अवस्था में मुझे मिले पूर्वजन्म के ज्ञान के बाद संत शिरोमणी ज्ञानेश्वर महाराज, रमण महर्षि तथा अन्य स्वनामधन्य संतोने मेरे पूर्वजन्म के बारे में बताया था । मगर अब तक मुझे यह ज्ञान ध्यानावस्था में दिया गया था । किसी संत-महात्मा द्वारा जाग्रत अवस्था में एसा बताये जाना पहली बार था इसलिये यह अनुभव का मेरे लिये कीमती था ।

कुलानंदजी ने बताया : 'मौजूदा वक्त में कई समर्थ सिद्धपुरुष धरती पर अवतीर्ण हुए है, जिनके द्वारा लोककल्याण का कार्य हो रहे है और होते रहेंगे ।'

मेरा विचार बदरीनाथ में रहकर साधना द्वारा पूर्ण सिद्धि एवं शांति प्राप्त करना था । मगर एकाद महिना रहने के बाद मुझे पतले दस्त(पेचिश) की बिमारी हुई । शायद वहाँ की आबोहवा मुझे रास नहीं आयी । दवाईयों से कुछ खास लाभ नहीं हुआ । मैं बदरीनाथ आया था साधना करने और सेहत के कारण साधना में विक्षेप आ गया । बदरीनाथ की पुण्यभूमि में रहने का सुनहरा मौका मिला था, चारों ओर हिमाच्छादित पर्वतशिखर थे, कलकल निनाद करके बहेती अलकनंदा नदी थी, मगर सेहत की वजह से इसका पूरी तरह से लाभ नहीं ले सका ।

हालाकि बदरीनाथ की पुण्यभूमि में मुझे दो अदभूत अनुभव मिले जिससे मेरी यात्रा सफल हो गई । ४ जून, १९४७ के दिन मैं अपने नित्यक्रम के मुताबिक ध्यान में बैठा था तो मुझे भगवान नर-नारायण के दर्शन हुए । उन्होंने सुस्पष्ट स्वर में कहा 'आप विश्व-विधाता होंगे, विश्वशांति के दाता होंगे ।' यह सुनकर मुझे हर्ष हुआ और मैंने अनुभव प्रदान करने के लिये इश्वर का आभार माना ।

उसी दिन सुबह में एक ओर अनुभव मिला । असाधारण सौंदर्य से संपन्न और एक-सी दिखनेवाली उन्नीस कन्याओं ने एक-एक करके मेरे गले में मालाएँ पहनाई । कन्याओं का स्वरूप इतना अलौकिक था की इसका वर्णन करना असंभव है । संसार में आज तक मैंने एसा लावण्य और ऐश्वर्य नहीं देखा । अनुभूति के समय दिल में अंतःस्फूरणा हुई की यह अष्ट सिद्धि एवं नव निधि है । इस अनुभव का अर्थ एसा कर सकते हैं की इश्वर की परम कृपा से मुझे रिद्धिसिद्धि की प्राप्ति हुई । एसा अनुभव मेरे लिये अपूर्व था, इसलिये इसे समजने में मुझे थोडा वक्त लगा । साधना के सुमेरु शिखर पर आसिन्न सिद्ध महापुरुष एसे अनुभवों को ठीक तरह से समज पायेंगे ।

जब मैं बदरीनाथ से निकला तो मेरा मन निराशा और चिंता के बजाय आशा और निश्चिंतता से भरा था । मुझे मिले अनुभव जरूर महत्वपूर्ण थे मगर लक्ष्य को हासिल करने के लिये मुझे लंबा रास्ता तय करना था । मैं इस सच्चाई से वाकिफ था ।

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To observe without evaluating is the highest form of intelligence.
- J. Krishnamurti

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