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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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सरोडा आकर मैंने आत्मशांति के लिये पानी पर नौ दिन का अनशन किया । फिर ४ अगस्त से लेकर ११ सितम्बर तक अडतीस दिन का अनशन किया । ये सब मेरी मरजी से नहीं हो रहा था मगर इश्वरीय प्रेरणा से हो रहा था । अनशन के कारण शरीर दुर्बल हो गया मगर श्रद्धा, हिम्मत, धैर्य और मानसिक स्वास्थ्य बना रहा । यह इश्वर की कृपा का परिणाम था । साधारण मनुष्य सांसारिक चिजवस्तुओं के लिये कष्ट सहन करता है मगर इश्वर के लिये एसा नहीं करता । तभी तो इसे तप का नाम दिया गया है । इश्वर की कृपा बगैर तपस्या कर पाना संभव नहीं है ।

माँ के दर्शन के लिये दिल में जो बैचेनी थी, सरोडा आने के बाद और प्रबल हुई । दिल में भावनाओं का तूफान उमड पडा । ये रहे उनके कुछ अंश :
'माँ, आप इतने दिनों से सबकुछ चूपचाप देख रही हो और मैं यहाँ कितनी बेकरारी से आपका इन्तजार कर रहा हूँ ? मैं आपके लिये रोता हूँ, छटपटाता हूँ, और आप है जो पत्थर की मूरत बनकर बैठी हो ? आप किसी भी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया ही नहीं देती ? एसा क्या है जो आप मेरे सामने प्रगट नहीं होती ? आपने कई भक्तों की लाज रखी है, क्या मैं आपका दुलारा नहीं ? क्या आपने माँ का बिरुद छोड दिया है ? आपने नरसिंह, मीरां, तुकाराम, रामकृष्णदेव – सबकी सहायता की है । फिर मेरे लिये ही एसा क्यूँ ? कैसे करूँ मैं आप पर यकीन ? कृपया मेरी प्रार्थना का तत्काल स्वीकार करो । मुझे कृतार्थ करो ।'

'आपके दिव्य दर्शन की चाह हमेशा मन में रहेती है । आपको मिलने के लिये दिल बेचैन रहता है । आप इसी क्षण मेरे सामने प्रगट हो जाओ । मेरे सभी मनोरथ पूर्ण करो । आपके दैवी दर्शन की क्षण कितनी मधुर होगी ! इसकी कल्पना भी कितनी सुखद लगती है ।'

'आपके प्यार का सागर अनंत है । जो केवल उसकी लहरों को देखता है, उसे पता भी नहीं चलता की उसमें कितने हीरे, मोती और जवाहर पडें है । मैं आपका हूँ और सदैव आपका रहूँगा । आपकी कृपा-करुणा से जीवन का उत्सव करूँगा । ये सृष्टि में आपका हो जाना ही परम सौभाग्य है । आपके अलावा इस संसार में कुछ नहीं है ।'

'कब होंगे मुझे आपके अमी-नयनों के दर्शन ? कब पाउँगा मैं आपका सुधासभर शीतल संजीवनप्रदायक स्पर्श ? कब एकाकार होकर गाउँगा मैं आपसे अभेदभाव का गीत ? कब आयेगा वो दिन ? जब भी आयेगा, मेरे लिये किसी त्यौहार से कम नहीं होगा । जैसे लोभी धन का क्षणभर त्याग नहीं करता, योगी अपने प्राण का त्याग नहीं करता, वैसे ही मैं आपका पलभर त्याग नहीं करूँगा ।'

'वक्त तेजी से बह रहा है । क्या मेरा जीवन आपकी प्रतीक्षा करते-करते ही पूर्ण हो जायेगा ? आप तो करुणा के सागर हो । आप मेरी सभी प्रार्थना का प्रत्युत्तर देते हो । मैं बडी उम्मीद लेकर आपकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ । आखीर कब तक करुँ मैं आपकी प्रतीक्षा ? एक दिन तो आपको आना ही है तो फिर देरी क्यूँ ? आज क्यूँ नहीं ? आज ही आकर मेरी तकलीफों का अंत करो ।'

सच्चे दिल की पुकार कभी विफल होती है ? ईश्वर के चरणों में की गयी बिनती कभी अनसुनी रहेती है ? माँ के लिये बहाया गया प्रत्येक आँसू, उसके द्वार पे की गयी कोई भी पुकार असफल नहीं होती । कर्म का सिद्धांत है, हर प्रयत्न का फल मिलता है । शास्त्र और संतपुरुष सर्वसंमति से ये बात कहते है । शरणागत भक्त की श्रद्धा अचल होती है, तभी तो वो विरह में मिलन की आश लेकर जीता है । साधारण मनुष्य का मन दुर्बल होता है । इसलिये वो विषयों में फँस जाता है और मुक्ति के महारस से वंचित रहता है ।

सरोडा में तकरीबन पाँच महिना रहा । वहाँ माँ की कृपा के अनुभव मिलते रहे । अनशन के ३१ वे दिन माँ ने अर्धजाग्रत अवस्था में दर्शन दिया । माँ ने सिद्ध महापुरुष के माध्यम से पूर्ण कृपा के लिये पंद्रह अगस्त का दिन सूचित किया । सरोडा छोडने से पहले घटी एक घटना का उल्लेख करना यहाँ आवश्यक समजता हूँ । वो घटना अत्यंत खेदजनक और चिरस्मरणीय थी ।

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