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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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१९५० का पूरा जनवरी विठ्ठलभाई और उनके स्वजनों के साथ काबोद्रा में व्यतीत हुआ । इन दिनों मेरा दिल माँ की पूर्ण कृपा के लिये लालायित था । जैसे लोभी किसी भी हालत में लोभ नहीं छोडता, पतिव्रता स्त्री किसी भी हालत में पति का विचार नहीं छोडती, उसी तरह आत्मिक पंथ के प्रवासी का मन हमेशा ईश्वर में लगा रहता है । वो अपने लक्ष्य को कभी नहीं भूलता । एसा होने का प्रमुख कारण ईश्वरीय प्रेम का रसास्वाद है । जिसने एक बार उसे चख लिया है, वो हमेशा के लिये इश्वर का हो जाता है । उसे फिर इश्वर के अलावा कुछ अच्छा नहीं लगता । जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति – तीनो अवस्थाओं में तथा जड-चेतन सभी में वो ईश्वर की आवाज सुनता है । उसके हृदय तथा रक्तवाहिनी से उसीका नाम गूँजता है । यह अवस्था कठिन है, तथा काफि कोशिश करने पर मिलती है मगर एक बार जो उसे हासिल कर लेता है, उसके लिये शांति, आनंद और मुक्ति दूर नहीं रहती । आत्मिक मार्ग के प्रवासी को एसी उच्च दशा पर पहूँचना है जहाँ स्थल-काल के बंधन नहीं है । उसकी प्रत्येक क्षण इश्वर के साथ आत्मिक अनुसंधान में व्यतीत होती है । वो जहाँ रहता है, उस जगह को तीर्थ बना देता है । मगर एसी अवस्था हासिल करने के लिये उसे चित्त की चंचलता का शमन करना होगा, ईश्वरप्रेम को बुलंदीओं पर ले जाना होगा ।

इश्वरीय प्रेम का प्रादुर्भाव होने से क्या होता है ? हृदय में दिनरात उसके फव्वारे फूटते है, दिल उसके दर्शन के लिये लालायित रहता है । मैंने एसी अवस्था का अनुभव किया है, कई दफा किया है । साधनापथ पर चलने के बाद मेरा जीवन इश्वरप्रेम से पूरी तरह भीग गया है ।
*
एक दिन हमने सुना की गाँव में हनुमानजी का प्राचीन मंदिर है । हनुमानजी के दर्शन की इच्छा किसे नहीं होगी ? सब उन्हें रामदूत और भक्तशिरोमणी के रूप में जानते है । 'जो राम को भजे, वो राम जैसा होता है ।' इसके मुताबिक हनुमानजी राम की भक्ति करते स्वयं राम स्वरूप हो गये । भक्तजन बडे आदर से उनकी पूजा करते है । भारत के ऋषिवरों ने आध्यात्मिक रहस्यों को जितनी खोज की है, पूरे विश्व में किसी देश ने नहीं की है । हनुमानजी को याद करके मेरा हृदय उनके प्रेम से परिप्लावित हो गया ।

दूसरे दिन हम हनुमानजी के मंदिर गये । मंदिर सुन्दर था, उसमें लगी हनुमानजी की मूर्ति भी आकर्षक थी । हमने हनुमानजी को प्रणाम किया, कुछ देर मंदिर में बैठे । मंदिर एकांत में था । एसे कई स्थान है जो अध्यात्म पथ के पथिको को साधना में जुडने की प्रेरणा देते है । यह भी सत्य है की एसे कई स्थान उच्च, जीवनमुक्त तपस्वीओं से सुशोभित होने चाहिये । मगर अब ज्यादातर स्थान या तो रिक्त हैं या तो कामिनी और कांचन के अनुरागी वेशधारी साधुओं से भरे पडे हैं । आजकल के साधुओं को एसे निर्जन, शांत और एकांत स्थानों में रहकर साधना तथा इष्टसिद्धि करने के बजाय मठ, मंदिर और आश्रम में रहकर एश करना ज्यादा पसंद आता है । तपश्चर्या की जगह पर वेदांत और उपरछल्ले ज्ञान का पोपट-पारायण होता है । कष्ट सहन करके एकांतवास करना कुछ गिनेचुने साधुओं को ही अच्छा लगता है । आध्यात्मिक रुचि की जगह सांसारिक विषयों के रसास्वाद ने ले ली है । मानव इश्वराभिमुख होने के बजाय इन्द्रियलोलुप होता जा रहा है । एसी परिस्थितिओं में एसे निर्जन और शांत स्थान का उपयोग कौन करेगा ?

मंदिर से घर आने के बाद मेरे मन में हनुमानजी के विचार आते रहें । मैंने मनोमन प्रार्थना की, 'हे हनुमानजी, अगर आप सच्चे हो, जीवंत हो, तो तीन दिन के अंदर मुझे मेरी साधना की पूर्णता के बारे में बताओ । मैं आपके स्थान में आया हूँ । आप मेरा इतना काम कर दो । इससे मुझे शांति मिलेगी और मैं फिर आपके दर्शन करने आउँगा । आप मेरी बिनती सुनो ।'

उसके तीसरे दिन सुबह स्वप्नावस्था में एक महात्मा का रूप धारण करके हनुमानजी ने मुझे दर्शन दिया और कहा, 'इस महा सुद पांचम को आपका कार्य सिद्ध हो जायेगा । उस वक्त आप सरोडा होंगे ।'
मैंने कहा, 'एसे कई दिन मिले है, मगर सब जूठे निकले है । क्या आपने बताया वो दिन मेरा कार्य सचमुच सिद्ध हो जायेगा ?'
उन्होंने कहा, 'अवश्य ।'

काबोद्रा के हनुमानजी ने अपनी सत्यता का परचा दे दिया । मुझे एक निश्चित दिन बताकर कुछ दिनों के लिये तसल्ली दे दी । कुछ दिनों के लिये लिख रहा हूँ क्योंकि महा सुद पांचम के दिन मैं सरोडा था फिर भी माँ की कृपा नहीं हुई । एक और दिन मिथ्या हो गया । एसा बारबार होना क्या कोई निश्चित योजना के भागरूप था ? मैं निराश न हो जाउँ इसलिये मुझे बहुत दूर-का नहीं मगर पास का कोई दिन कहा जाता था ? आजतक एसे कई दिन मिथ्या साबित हुए थे । माँ एसा क्यूँ करती है ? क्या मुझे धीरज और शांति देने के लिये कोई दिन सूचित करती है और मेरा वक्त प्रार्थना और तीव्र बैचेनी में व्यतीत कराती है ? मुझे यकीन था की एक दिन जरुर एसा आयेगा जब मेरी सभी इच्छा पूर्ण होगी, मेरा जीवन धन्य हो जायेगा । मगर माँ बार-बार मेरे साथ एसा क्यूँ करती है ? क्या उसे पता नहीं की एसा करने से मुझे कितनी तकलिफ होती है ? अब जो भी हो जाय, मैं निराश नहीं हूँगा । इश्वर के सभी कार्य सही वक्त पर होते है । ये भी तो इश्वर का कार्य है, फिर इसमें देरी क्यूँ ?

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