Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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इस वर्ष हिमालय में कुंभमेला लगा था । चैत्र वद ग्यारस के दिन मेले का आखरी स्नान था । मेरा विचार उस वक्त हिमालय जाने का था । मेरे साथ साबरमती से कुछ लोग आना चाहते थे । हमने चैत्र वद सातम या आठम के दिन बडौदा से प्रस्थान करने की योजना बनाई ।

माताजी के भाई, रमणभाई, बडौदा में लोहाणा बोर्डींग में काम करते थे । हम उनके घर जाकर ठहरे । प्रस्थान करने की पूर्वसंध्या पर मेरी भेंट बडौदा के एक प्रतिष्ठित वकील से हुई । मैं उनको पहले एक बार मिल चुका था । देश के मौजूदा हालात को लेकर उनसे कुछ विचारविमर्श हुआ ।

मैंने कहा, 'गांधीजी के चले जाने से भारत का आध्यात्मिक केन्द्रबल मानो चला गया । उनकी जगह किसीको लेनी होगी । विश्व में शांति और समृद्धि की स्थापना के लिये प्रयास करे एसा व्यक्तित्व भारत को तैयार करना होगा । एसा व्यक्तित्व जो स्वयं पूर्ण हो और विश्वशांति के कल्याणकारी यज्ञ में अपना योगदान दे सके । भारत को सुखी एवं समृद्ध करें तथा पूरे विश्व में भारत का आध्यात्मिक संदेश फैलाये । गांधीजीने अब तक इसे बखूबी-से किया । अब उसे पूर्ण करने के लिये कोई नया व्यक्तित्व उभरना चाहिए ।'

वकील योगीराज अरविन्द के भक्त और प्रशंसक थे । मेरे विचारों के अनुसंधान में उन्होंने पूछा, 'आपका महर्षि अरविंद के बारे में क्या खयाल है ?'
मैंने कहा, 'महर्षि अरविन्द एक महान योगीपुरुष है । समर्थ चिंतक एवं तत्वज्ञ है । इससे ज्यादा मैं क्या कहूँ ?'
'वो तो ठीक है' उन्होंने कहा, 'मगर आपको एसा नहीं लगता की आपने जैसा कहा एसा व्यक्तित्व श्री अरविन्द का है ? वो भारत तथा विश्व का आध्यात्मिक मार्गदर्शन करेंगे एसा आप नहीं मानते ?'

मैंने कहा, 'उनकी साधना के बारे में निश्चित अभिप्राय देना मुश्किल है क्यूँकि इसके बारे में हमें ज्यादा कुछ पता नहीं है । फिर भी हम ये कह सकते है की इतने सालों के एकांतवास तथा कठिन प्रयासों से उन्होंने बहुत कुछ सिद्ध किया होगा । अरविन्द आश्रम में साक्षात्कार दिन मनाया जाता है, मगर साक्षात्कार शब्द विभिन्न रूप से प्रयोजित किया जाता है । गीता में कहा गया है की साक्षात्कार अंतिम अवस्था है, जिसे पाने के बाद आदमी को कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहेता । मानव मुक्त और परिपूर्ण हो जाता है, परम सुख और शांति का अनुभव करता है । उसका व्यक्तित्व परमात्मा या वैश्विक चेतना के साथ एकाकार हो जाता है । इस दृष्टि से देखा जाय तो श्री अरविन्द को साक्षात्कार नहीं हुआ क्योंकि उनकी साधना की इच्छा अब भी शेष है । एसा भी हो सकता है की उन्होंने पूर्णता की प्राप्ति कर ली हो, मगर हमे उसके बारे में पता नहीं हो । जो भी हो, मुझे व्यक्तिगत रूप से एसा नहीं लगता की गांधीजी के बाद श्री अरविन्द संसार का आध्यात्मिक पथप्रदर्शन करेंगे । मैं यह मेरे अनुभव एवं आंतरप्रेरणा के बल पर कह रहा हूँ ।

गांधीजी की मौत के बाद जयप्रकाश नारायण ने एसा बयान दिया था की रमण महर्षि और अरविन्द जैसे योगीपुरुषों को आगे आना चाहिये । अगर एसा सचमुच होता है तो वो खुशी की बात होगी । बहुत सारे लोग अरविन्द को भावि प्रेरणागुरु के रूप में देख रहे है । मगर मेरी आंतरप्रेरणा इससे विपरीत है । भारत से आध्यात्मिक विभूति जरूर प्रकट होगी मगर लोग या अखबार उससे अनजान होंगे । मंदिर में देवों को जो फूल चढाये जाते है वो किसी राजमहेल की शय्या पर पिछली रात बिछाये नहीं होते । उसको तो माली उपवन से तरोताजा चूँटकर लाता है । मेरा मानना है की यह व्यक्ति युवान होगा, वृद्ध नहीं । वो देश और दुनिया पर लंबे अरसे तक अपना प्रभाव बनाये रक्खे यह आवश्यक है ।'

वकील को मेरा मंतव्य रुचिकर नहीं लगा । उनको श्री अरविन्द में पूर्ण विश्वास था । वो कहने लगे, 'मुझे तो लगता है की ज्यादा से ज्यादा पाँच साल में अरविन्द का युग आनेवाला है । अरविन्द जगमंच पर प्रकट होंगे एसा उनके निकटवर्ती शिष्यों का मानना है ।'

मैंने कहा 'वो जो भी हो, मुझे जो ठीक लगा वो मैंने आपको कहा । मेरा कहने का ये मतलब कतई नहीं है की मुझे श्री अरविन्द के प्रति मान नहीं है । उनकी मेधा, कार्यशक्ति तथा इच्छाशक्ति अदभूत है । उनके विचार उच्च है । मैं उनको महापुरुष मानता हूँ मगर इससे उनके बारे में कोई कुछ कहे और मैं मान लूँ एसा नहीं है । रमण महर्षि ने एक दफा कहा था की अरविन्द जो करना चाहते है वो नहीं होगा । मगर इससे उनकी महत्ता कम नहीं हो जाती । उन्होंने जो महान आदर्श के लिये प्रयास किये है, वो बडेबडे विचारकों को हैरत में डाल देते है, उससे अनेक साधकों को प्रेरणा मिलती है ।'

कुछ देर के बाद वकील बोले, 'आप भी देखो, उनका जन्म पंद्रहवी अगस्त को हुआ और उसी दिन उन्होंने भारत को आजादी दिलायी । दूसरे विश्वयुद्ध में उन्हीं के योगबल के कारण मित्रराष्ट्रों की जीत हुई । यह बात खुद अरविन्द और उनके शिष्योंने बताई है ।'

मैंने कहा, 'उसमें न माननेवाली कोई बात नहीं है । मगर हमें अपनी और से सोचना चाहिए । पंद्रह अगस्त को तो मेरे जैसे साधारण व्यक्ति का भी जन्म हुआ है और बहुत सारे लोगों का हुआ होगा । सिर्फ इसके बलबूते पर कोई ये कहे तो हम थोडा मान ले ? हाँ, आजादी के पहले श्री अरविन्द ने एसा बताया होता की मेरे जन्मदिन पर भारत को आजादी मिलेगी तो एसी मान्यता को बल मिलता । मैं तो ये कहता हूँ की भारत की आझादी इश्वर की मंगलमयी इच्छा का परिणाम है एसा मानने में हर्ज नहीं है । और बाह्यरूप से देखा जाय तो, गांधीजीने इसमें सबसे बडा योगदान दिया है ।'

फिर उन्होंने कहा, 'अरविन्द आश्रम के श्री अंबालाल पुराणी यहाँ चार-पाँच दिन के बाद आनेवाले है । उनसे मिलकर आपकी शंका का समाधान हो जायेगा ।'
मैंने कहा, 'मुझे कोई शंका है ही नहीं की किसीको पूछने की आवश्यकता हो । मेरी शंका का समाधान परमकृपालु परमात्मा करता रहता है । आप अंबालाल भाई को पूछकर अपने मन का समाधान कर लेना । मैं उनसे जरूर मिलता मगर कल मैं हिमालय के लिये निकल रहा हूँ ।'
फिर कहा, 'आपने बात पूछी इसलिये मुझे जो ठीक लगा वो मैंने बताया । श्री अरविन्द भारत और संसार के महापुरुष है, इसमें कोई शक नहीं है । मेरे दिल में उनके लिये आदर और सम्मान की भावना है । मेरा विरोध सिर्फ उनके प्रति लोगों की गलतफहमी से है ।'

वकील को मेरी बातें सुनकर कैसा लगा ये मैं नहीं जानता । शायद उन्होंने मुझे गलत समजा । जो भी हो, इस वार्तालाप के करीब आठ महिने बाद श्री अरविन्द का देहावसान हुआ । इससे कोई मुझे भविष्यवेत्ता न मान ले । मेरा एसा दावा नहीं है न तो मैं अपने बारे में एसा जताना चाहता हूँ । मैं एक साधारण आदमी हूँ और इश्वरकृपा से जो आंतरप्रेरणा मिलती है, वो बताता हूँ । मुझे माँ की प्रेरणा पर परम श्रद्धा है । इस बात को यहाँ विराम देकर चलो चलते है कुंभमेले में ।