वृद्ध महात्मा
गोपीनाथ भगवान के मंदिर जाते वक्त रास्ते में गौडीय मठ के मेनेजर मिले । उन्होंने हमे लौटते वक्त मठ में आने का निमंत्रण दिया । जब हम मंदिर से वापिस आये तो वो हमे आग्रहपूर्वक मठ में ले गये ।
वो बोले, 'पुरी में देखनेलायक स्थान एक ही है – गौडीय मठ ।'
मैंने कहा, 'जगन्नाथजी का मंदिर भी नहीं ?'
मेरा कटाक्ष सुनकर वो अपनी अतिशयोक्ति समज गये ।
फिर उन्होंने कहा : 'श्री चैतन्य महाप्रभु तथा भक्तिमार्ग पर जिन्होंने कई विद्वत्तापूर्ण ग्रंथ लिखे है एसे परम विद्याव्यासंगी वैष्णव महापुरुष यहाँ बिराजमान है । क्या आप उनको मिलना पसंद करेंगे ?'
मठ में अन्य कुछ देखने जैसा नहीं था । मैंने उनकी बात में हामी भरी ।
वो हमें महात्मा पुरुष के पास ले गये । महात्मा अतिशय वृद्ध थे । एक आकर्षक आसन पर वो बिराजे थे । उनकी पीठ के पीछे तकीया था ।
कुछ देर माला करने के बाद वो अत्यंत मृदु स्वर में बोले : 'मैं भगवान के चरण के दास के दास का भी दास हूँ । मैं साधु हूँ और मेरा धर्म सेवा करने का है । बोलो, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?'
उनकी वाणी बेहद मीठी थी । इससे उनकी विनम्रता तथा साफ दिल का पता चलता था ।
मैंने कहा : 'आपके दर्शन करके हमें बडी प्रसन्नता हुई । इसके अलावा कोई सेवा लेने की हमारी कामना नहीं है ।'
उन्होंने कहा : 'शरीर का दर्शन करके क्या प्रसन्नता मिलेगी ?'
मैंने कहा : 'शरीर का नहीं, मगर शरीर के माध्यम से जो अभिव्यक्त हो रहा है वो आत्मा का दर्शन करके हमें प्रसन्नता हुई ।'
वो बोले : 'मुझे अभी तक आत्मा का अनुभव नहीं हुआ । मुझे आशीर्वाद दो की मुझ पर प्रभु की कृपा हो और मैं आत्मा का दर्शन कर सकूँ, आत्मसाक्षात्कार कर सकूँ ।'
आपबडाई के इस युग में एक वयोवृद्ध महात्मा के मुँह से निकले एसे शब्द उनकी विनम्रता के द्योतक थे ।
मैंने कहा : 'आपने भले आत्मा का दर्शन नहीं किया मगर आपको इसका अहेसास है, ये क्या कम है ? इश्वर की कृपा के अलावा एसी जागृति संभव नहीं है । मैं तो एक साधारण मनुष्य हूँ, मैं आपको क्या आशीर्वाद दूँ ? आप पर तो इश्वर महेरबान है ।'
उन्होंने मेरा नाम पूछा । मैंने कहा, 'लोग मुझे गुजराती महात्मा के नाम से जानते है ।'
'क्या आपके गुरु ने आपको कोई नाम नहीं दिया ?'
मैंने कहा, 'गुरु ने मुझे देनेलायक सबकुछ दिया है, सिर्फ नाम नहीं दिया । मुझे इसकी फिक्र नहीं है । वो अपनी मरजी से जो नाम देगा, मेरे लिये ठीक होगा । वो सभी गुरु का गुरु है ।'
कुछ देर तक शांति बनी रही । फिर वो बोले, 'हे कृष्ण, हे गोविंद !'
मैंने कहा, 'बस यही नाम सबसे प्यारा है । उसे याद रखने से परमशांति मिलती है । वैसे तो दुनिया में हजारों नाम है, मगर इससे क्या होता है ?'
शाम होने आयी थी इसलिये हम ज्यादा देर नहीं रुके । आसमान संध्या के गुलाबी रंगों से भर गया था । उस वृद्ध महापुरुष की नम्रता को याद करके हम वहाँ से निकले । अगर हम उनसे सिर्फ नम्रता का महामंत्र सिख ले, तो भी हमारा जीवन धन्य हो जाय ।
जैसे हम उनको मिलकर निकले, वो अखबार पढने लगे ! महापुरुषों की लीला अजीब होती है । उनके बाह्य आचरण से हम उनके बारे में कोई निश्चित अभिप्राय नहीं दे सकते ।
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रसिकानंदजी
एक दिन जगन्नाथजी के दर्शन करके लौट रहे थे की बारिश शुरु हो गयी । मुझे लगा की कहीं पर रुकना चाहिये । आसपास देखा तो एक छोटा-सा मंदिर नजर आया । उसकी छत के नीचे दो साधु बैठे थे । उनमें से एक साधु, पहली नजर में, उच्च कोटि के महात्मा लगे । मैंने सोचा की वहाँ चलने से दो काम साथ में हो जायेंगे, बारिश से बच जायेंगे और साधुपुरुष का परिचय भी हो जायेगा ।
और जैसे मेरी धारणा थी, वह साधुपुरुष सचमुच उच्च कोटि के महात्मा निकले । उनके साथ बातचीत करने पर पता चला की उनका नाम रसिकानंदजी है । वो गुजराती थे, और उन्होंने बंबई से एम. ए. किया था । आजकल वो संन्यास का न्यास करके, हरिदास नाम धारण करके, प्रेमभक्ति में मग्न रहते थे । जब वो वृंदावन में थे तो एक दिन चैतन्य महाप्रभु ने उनको साक्षात् दर्शन दिया था । महाप्रभुजी ने पीतांबर पहना था और उनके कंठ में फूलों की माला थी । दर्शन देकर उन्होंने हरिदासजी को संकेत से आदेश किया की 'जगन्नाथपुरी जाओ । वहाँ आपकी कृष्णदर्शन की इच्छा पूरी होगी ।'
पीछले पंद्रह दिन से वो जगन्नाथपुरी आये थे और प्रभुप्रेम में अपना समय व्यतीत कर रहे थे । सारी रात वो समुद्रतट पर रेत में बैठे रहते थे । उनके बारे में जानकर मुझे उन पर स्नेह हुआ । हमने काफि सारी बातें की । फिर मेरे कहने पर वो हमारी धर्मशाला में आये और हमारे साथ में खाना खाया । मैंने कुछ भजन सुनाएँ जिससे वो बहुत प्रसन्न हुए ।
आपसी वार्तालाप के दौरान उन्होंने पूछा, 'आपके जीवन का लक्ष्य क्या है ?'
मैंने उत्तर दिया, 'जिस तरह मैं आपके पास बैठा हूँ, आपको देख रहा हूँ, आपके साथ बात कर रहा हूँ, ऐसे ही मैं अपने इष्ट का दर्शन करुँ, उनका सान्निध्य पाउँ । यूँ कहो की, तुम मुझे देखा करो और मैं तुम्हे देखा करुं !'
फिर मैंने कहा, 'योग तथा साधना के सभी लक्ष्यों की इस विराट लक्ष्य में पूर्ति हो जाती है । समाधि, रिद्धिसिद्धि की संप्राप्ति, अमृतपद तथा परमशांति की प्राप्ति - यह सब इष्ट की कृपा से साध्य होता है । प्रेममार्ग के साधक को इसी लक्ष्य को मध्येनजर रखके चलना चाहिये तथा इसके लिये आवश्यक साधना करनी चाहिए । तीव्र ईश्वरप्रेम और आतुर हृदय से होनेवाली प्रार्थना - परमात्मा को पाने के अकसीर और अमोघ साधन है । जब अंतर के अंतरतम से केवल इश्वर के लिये पुकार निकलती है तो इश्वर इसका प्रत्युत्तर अवश्य देता है । कभीकभी वो खुद प्रकट हो जाता है । साधक को चाहिये की अन्य सभी साधन गौण मानकर सिर्फ इस पर ध्यान दे । तभी उसकी साधना सफल होगी ।'
हरिदास अनुभवी महापुरुष थे । मेरे विचार उनके विचारों से मेल खाते देखकर वो स्वाभाविक प्रसन्न हुए ।

