Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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विजयादशमी के दिन मैंने अनशन पूर्ण किया मगर मन का समाधान नहीं हुआ । मुझे कोई निश्चित अनुभव की आवश्यकता थी । मेरी पूर्णता की साधना कब पूरी होगी उसकी चिंता मुझे खाये जा रही थी ।

विजयादशमी के बाद मेरे सभी दिन प्रार्थना में व्यतीत हुए । सिद्धि नहीं मिलने पर भी मेरा उत्साह, मेरा जोश-और-जूनून बरकरार था । मुझे सिद्धि का दिन मिलता था, उस दिन की प्रतीक्षा करके मैं भरचक प्रयास करता था, फिर वो दिन निष्फल सिद्ध होता था । मैं फिर-से महेनत करने लगता था । एसा करते-करते तीन साल हो गये । वक्त निकलता जा रहा था फिर भी मेरी श्रद्धा बनी हुई थी । मुझे पक्का विश्वास था की मेरे प्रयासों का फल कभी-न-कभी अवश्य मिलेगा । मैं माँ की प्रेरणा से ये प्रयास कर रहा था इसलिये मुझे यकिन था की मैं अपने मकसद में जरूर कामयाब हूँगा । मेरी जीवनकथा को पढनेवाले हरेक व्यक्ति को मैं यह कहना चाहता हूँ की आध्यात्मिक विकास का मार्ग अचल श्रद्धा से भरें साधक के लिये है । उसके जीवन में निराशा या विषाद का कोई स्थान नहीं है । उसे अपने लक्ष्य की सिद्धि के लिये सबकुछ न्योछावर करना है, तभी वो अपने मुकाम पर पहूँच सकेगा । साधना के मार्ग में दृढ मनोबल आवश्यक है । जो कायर है, विफलता से डरकर अपना प्रयास छोड देता है, उसका यहाँ काम नहीं बनेगा । साधक को अपने आप-से पूछना चाहिये की मेरा ध्येय इश्वरप्रेरित या इश्वरमान्य है या नहीं ? अगर इसका उत्तर हाँ है तो उसे निराश होने की आवश्यकता नहीं है । इश्वर खुद उसे अपने लक्ष्य तक ले जायेगा । याद रहें की हमेशा उसकी इच्छा का विजय होता है ।

नवरात्री पूरी होने के बाद भी मैंने अपनी प्रार्थना जारी रखी । माँ पर श्रद्धा बनाये रखने के अलावा मेरे पास अन्य कोई चारा नहीं था । जब तक मेरा कार्य पूरा नहीं हो जाता मुझे चैन नहीं मिलनेवाला था ।

पूरा आसो माह व्रत और प्रार्थना में पूर्ण हुआ । दशहरे के बाद आठ दिन दूध लेकर और दो दिन को छोडकर बाकी सभी दिन एक वक्त खाना खाकर मैंने अपने प्रयास जारी रक्खें । अब मेरी नजर दिपावली पर थी । मैं चाहता थी दिपावली के पहले मैं अपने मकसद में कामियाब हो जाउँ । मगर मेरी सफलता मेरे प्रयास पर आधारित नहीं थी, माँ की कृपा और करुणा पर निर्भर थी । इसलिये माँ की दया की याचना करने में मेरे दिन व्यतीत होने लगे ।

जवाहरलाल सहानी, जो की शेठ के मकान में रहते थे, और जिनकी अनुमति से हम उस मकान में रह सकें, बडे श्रद्धालु और सरल आदमी थे । वो कश्मीरी थे और धनी माँबाप की एकलौती औलाद थे । अपने पैरों पर खडे रहने के लिये उन्होंने नौकरी कर ली थी ।

हम उनके साथ रहें थे, इसलिये मेरे न बताने पर भी उनको पता चल गया की नवरात्री के बाद मेरा व्रत जारी रहा है । उनकी अध्यात्म में रुचि थी । वो शीतला माता में श्रद्धा रखते थे । एक डेन्टीस्ट, जिसे शीतला माता का आवेश आता था, वो अपना गुरु मानते थे ।

मेरे व्रत के दिनों में उन्होंने पूछा, 'अगर आप जैसे महापुरुष को एसी कठिन साधना करनी पडती है तो हमारे जैसे साधारण जीवों का क्या होगा ? पूर्णता या परमशांति के लिये हमें कितने प्रयास करने पडेंगे ? मुझे तो लगता है की कई जन्म लग जायेंगे तब हमारा उद्धार होगा ।'

मैंने कहा, 'नहीं, मेरी महेनत देखकर आपको निराश नहीं होना चाहिए । आपको इससे प्रेरणा लेनी चाहिये की अपने लक्ष्य के लिये आखरी साँस तक प्रयास करते रहें । अगर आप एसा करते है तो संभव है की आप पर प्रभु की कृपा जल्दी हो जाय । काम जितना मुश्किल होता है, उसके लिये उतना अधिक परिश्रम करना पडता है । मेरी साधना का लक्ष्य क्या है ये मैं आपको नहीं बता सकता । मगर ये जरुर कहूँगा की आपको मेरे जैसे प्रयास करने की जरूरत नहीं है । हाँ, ये बात सही है की अध्यात्म मार्ग में बिना कुछ किये कुछ नहीं मिलता । कुछ पाने के लिये श्रद्धा और लगन से साधना करनी पडती है । ज्यादातर लोग एसा नहीं करते, इसलिये सफल नहीं होते ।'

'और भी एक बात है । जो सबसे पहले नाव का निर्माण करता है उसे बहुत सारी तकलिफें झेलनी पडती है ! जंगल में जाकर लकडीयाँ ढूँढनी पडती है, उसे छानकर, काटकर, ठीक करके कई दिनों तक महेनत करनी पडती है, तब जाकर नाव तैयार होती है । मगर जब नाव तैयार हो जाती है, तो सबको एसी महेनत नहीं करनी पडती । उन्हें तो सिर्फ नाव में बैठना होता है । इसी तरह महापुरुष कठिन परिश्रम और साधना से लोगों की भलाई के लिये मार्ग तैयार करते है । जो संसार-सागर को पार करना चाहे उन्हें सिर्फ महापुरुषों का शरण लेना होता है । इससे उनका काम आसान हो जाता है । उन्हें निराश होने का कोई कारण नहीं है । मेरी साधना केवल माँ जगदंबा पर श्रद्धा रखकर हो रही है । वो ही मेरे लिये गुरु और सबकुछ है इसलिये मुझे थोडा ज्यादा प्रयास करना पडता है ।'
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एक बार उडीसा के प्रांत के कलेक्टर आये । उनके साथ, औरंगाबाद के हिन्दी तथा अंग्रेजी के प्रोफेसर भी थे । उन्होंने मुझे प्रश्न पूछा की 'अगर परमात्मा सबके गुरु है तो फिर आदमी को गुरु करने की क्या आवश्यकता है ?'

मैंने कहा, 'हाँ, परमात्मा सबके गुरु है वो ठीक है मगर ये एक आदर्श है । जैसे आत्मा नित्य मुक्त है यह एक आदर्श है मगर हम देखते हैं की व्यक्ति अनेक प्रकार के बंधनो में फँसा होता है, अल्पता का दास होता है । इससे छूटने के लिये उसे प्रयास करने पडते है । तो आत्मा भले ही मुक्त या पूर्ण है, मगर जब तक व्यक्ति इसका अनुभव नहीं करता तब तक उसे हकीकत मानकर नहीं चल सकते । आध्यात्मिक सत्य केवल सिद्धांत या रटने की चिज नहीं है मगर जीवन में प्रत्यक्ष करने की बात है ।'

'यही बात आपके प्रश्न के उत्तर में बताना चाहूँगा । परमात्मा सबके गुरु है, यह बात सैद्धांतिक रुप से सत्य है मगर आप सोचेंगे तो आपको पता चलेगा की हकीकत में एसा नहीं है । आदमी इश्वर की इच्छा के मुताबिक अपना जीवन कहाँ जीता है ? उसकी बुद्धि अहंकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह, तथा आसक्ति के आवरणों से कुंठित हो जाती है । वो इश्वर का संदेश नहीं सुनता, उसके मुताबिक आचरण नहीं करता । वो अपने मलिन मन और स्वभाव के मुताबिक वर्तन करता है । फिर उसका संबंध विश्वगुरु परमात्मा से है ये कैसे मान ले ? जब वो अहंता और ममता के बंधनो को तोडकर शुद्ध सत्वगुण में प्रतिष्ठित होगा तब इश्वर का संदेश सुन पायेगा और उसकी इच्छा के मुताबिक अपना जीवन चला पायेगा । महापुरुषों के जीवन इस तरह से चलते है इसलिये वो कह सकते है की इश्वर उनका गुरु है ।'

'साधारण आदमी अनुभव की इस अवस्था पर नहीं पहूँच पाता । उसका मन स्त्री, घन, संतान, आदि विविध पदार्थो में लगा रहता है । वो इश्वरीय चेतना के संपर्क में कहा होता है ?'

'इसलिये जो इश्वरीय चेतना का अनुभव नहीं करता, उसे एसे महापुरुषों की शरण लेनी चाहिये जो खुद इश्वर के संपर्क में हो । वो उसे ठीक तरह से बतायेंगे की इश्वर का संदेश क्या है । एसे महापुरुष को आप गुरु कह सकते है । गुरु का आधार लेने से जीवन का अंधकार नष्ट होता है, मन की जडता दूर होती है और परमगुरु परमात्मा से संपर्क स्थापित होता है । जो एसा करा सकता है वो सच्चा गुरु है । हमें एसे गुरु का शरण लेना चाहिये ।'

हिमालय की पावन भूमि में साधना करते हुए मेरे दिन तीव्र गति से जा रहे थे । प्रेमभक्ति के पुष्प चढाकर माँ जगदंबा की आराधना करने में दिन का ज्यादातर वक्त निकल जाता था । एसी आराधना जिसमें प्रेम दीपक था, श्रद्धा ज्योति थी, और धीरज की धूनी थी । दिवाली के दिन अनशन पूर्ण हुआ । हिमालय में ठंडी की मौसम जोर पकड रही थी । वहाँ चंपकभाई अपनी सेहत को बहेतर बनाने के लिये नासिक गये थे । उनके निमंत्रण के कई खत आ चुके थे । एक दिन माँ ने नासिक जाने की प्रेरणा की ।