महुवा से हम सरोडा गये और करीब एक महिना रहें । सरोडा जाते वक्त मार्ग में एक अजीब घटना घटी । भात और कासीन्द्रा गाँव की सीम से गुजर रहे थे तब एक लम्बा और काला साँप रास्ते के बीचोबीच आकर खडा रहा । कुछ देर उसने अपना सर हिलाया और फिर आसपास की झाडीओं में गायब हो गया । साँप से बचने के लिये, या यूँ कहो की साँप को बचाने के लिये, ड्राईवर ने गाडी थोडी पीछे ली, फिर उसे घुमाकर मुख्य मार्ग पर ले आया ।
क्या शुकन और अपशुकन जैसी कोई चिज होती है ? इसमें कितना तथ्य है इसकी चर्चा हम यहाँ नहीं करेंगे, फिर भी एक बात तो माननी पडेगी की लोग उसमें विश्वास करते है । अगर साँप किसीका रास्ता काटे तो वो अपशगुन माना जाता है, इससे कुछ अनिष्ट होने की आशंका जतायी जाती है । औरों का पता नहीं, हमारे लिये ये बात सत्य साबित हुई । साँप ने हमारा रास्ता काटकर मानो हमें आनेवाले खतरे से आगाह किया था । सरोडा-निवास के दौरान एसी दो घटनाएँ घटी, जिसे आम तौर पर अमंगल कह सकते है ।
सरोडा में आये चार दिन हुए थे । रात को दो बजे मैं घर में प्रभुस्मरण कर रहा था । इतने में किसीने घर का मुख्य द्वार खटखटाया । मुझे आश्चर्य हुआ की इतनी रात गये कौन होगा । दरार से झाँखकर देखा तो एक आदमी हाथ में डंडा लेकर खडा था ।
मैंने पूछा: 'कौन है ?'
'दरवाजा खोल' कहकर वो मुझे गालीयाँ देने लगा । मैंने टोर्च लेकर फिर-से देखा तो वो वहाँ ही खडा था । उसके साथ एक और आदमी था । उसके हाथ में कोई हथियार था ।
मैंने पूछा, क्या काम है ?
जवाब में उसने गन्दी गालियाँ दी ।
मुझे लगा की बात गंभीर है, इसलिये मैं जरा कठोरता-से बात करने लगा । घर में माताजी, ताराबेन और उनके बच्चे थे इसलिये द्वार खोलना ठीक नहीं था । अंधेरी रात थी, आसपास कोई नहीं था । मेरी आवाज से ताराबेन और माताजी की नींद खुल गयी । वो जोर जोर-से चोर-चोर चिल्लाने लगी । करीब पाँच मिनट तक दोनों आदमी गालीगलोच करते रहे । इतने में गाँव के कुछ आदमी वहाँ आ पहूँचे । उसे देखकर वो भाग गये । गाँववालो के मुताबिक वो तीन आदमी थे ।
यह बनाव असाधारण और अकल्पनीय था । चोरों का मकसद केवल चोरी करना नहीं था । एसा होता तो वो लंबे अरसे तक गालीगलोच न करते । ये तो अच्छा हुआ की एन मौके पर गाँव के रणछोडभाई ठक्कर ने हमारी मदद की वरना कुछ अमंगल जरुर होता ।
इस घटना के बाद गाँव में तरह-तरह की बातें होने लगी । लोग कहने लगे की 'महात्मा के घर चोर क्यूँ आये ? अगर वो सचमुच के महात्मा है तो चोर को मौन क्यूँ नहीं किया ?' गाँव के लोगों को बात करने का विषय मिल गया । हमें सहानुभूति के दो शब्द कहने का शिष्टाचार तो बाजू पर रहा, लोग हमारी निंदा-टीका करने लगे । अब उन्हें कौन बताये की मंदिरो में भी चोर आते है और चोरी करते है । जगन्नाथपूरी के सुप्रसिद्ध मंदिर में दिनदहाडे लुटेरुओं ने आकर पूजारी की हत्या की थी और धन चुराया था । रमण महर्षि और तुलसीदास जैसे महान संतो को उन्होंने नहीं छोडा था तो मैं भला किस खेत की मूली ? और एसा किसने कह दिया की महान संतो के घर चोर-लूटेरु नहीं आते ? एसा कोई नियम थोडा है ? मगर जिसे बूरा देखना है, वो बूरा ही देखेगा । उसे कुछ और नजर नहीं आयेगा ।
इश्वर की दुनिया में सबकुछ मंगल है । जो हमें अमंगल लगता है वो भी मंगलमय होता है । अविवेकी आदमी मंगल का दर्शन नहीं करता, इसलिये मंगल और अमंगल का भेदभाव करता है और अमंगल होने से डरता है ।
ज्यादातर लोग मौत को अमंगल समजते है । इसी दृष्टि से देखा जाय तो हमारे साथ एक और अमंगल घटना घटी । ताराबेन की छोटी लडकी प्रेरणा का कुछ दिनों की बिमारी के बाद अवसान हुआ । हमारी मौजूदगी के कारण ताराबेन स्वस्थ रही । जन्म और मृत्यु देह के धर्म है, और प्रत्येक शरीरधारी से जुडे है । कोई समर्थ योगी या भक्त इससे बच सकता है, साधारण मनुष्य का इससे बचना नामुमकिन है ।
सरोडा से हम साबरमती गये । वहाँ सुरेन्द्रभाई और नलिनीबेन के घर करीब सवा महिना रहे । वहाँ से माँ की प्रेरणा मिलने पर हम ऋषिकेश आये ।

