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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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जब हम नवभारत होटल में रहते थे तो राजकोट से चंपकभाई सहकारी प्रवृत्ति की तालीम लेने मसूरी आये थे । धरमपुर में अलग होने के बाद वो हर साल मुझे मिलते रहें थे और मेरे जीवनप्रवाह से वाकिफ रहते थे । इस बार जब वो मुझे मिलने आये तो मुझे कल्पना नहीं थी की ये हमारी आखरी मुलाकात होगी, फिर हम कभी नहीं मिल पायेंगे । कुदरत का क्रम निश्चित होता है । कर्मफल के अनुसार जो होता है, उसे कोई टाल नहीं सकता ।

तारीख २७ अक्तूबर १९६४ के दिन चंपकभाई ने अपने पंचमहाभूत के देह का त्याग किया । लौकिक भाषा में कहें तो उनका अवसान हुआ । मृत्यु के लिये कोई-न-कोई कारण या निमित्त होता है । चंपकभाई की मौत के लिये अकस्मात एक दुःखद कारण बना । बेडीपार क्षेत्र के कृषकों से बातचीत करके वो रात के ग्यारह बजे वापिस लौट रहे थे । तब उनको थकान महसूस हुई और वो हाँफने लगे । घर पहूँचने के लिये उन्होंने रीक्षा ली और वही उनके लिये यमदूत साबित हुई । अग्निशामक के साथ रीक्षा का भयंकर अकस्मात हुआ । इससे चंपकभाई गंभीर रुप से घायल हुए । उन्हें अस्पताल ले जाया गया । डोक्टरों के भगीरथ प्रयासों के बावजूद वो बच नहीं पाये । तारीख २७ अक्तूबर, मंगलवार दोपहर को करीब बारह बजे उनका देहांत हो गया ।

उसी दिन हम मसूरी से दहेरादून होकर ऋषिकेश आये थे । दोपहर के बाद टेलीग्राम आया तो हमें इसकी खबर मिली । पहले तो मन नहीं माना मगर वास्तविकता का स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं था ।

चंपकभाई करीब पचपन वर्ष के थे । ये उनके मरने की उम्र नहीं थी मगर काल छोटे-बडे का हिसाब कहाँ रखता है ? वो अपना कार्य पूरा करके चला जाता है । संसार की सुमधुर वाटिका से एक महेकता हुआ फूल चला गया, मानवता का महादीपक बूझ गया । सौराष्ट्र और विशेष करके राजकोट की धरती श्री और चेतनाविहीन हो गयी ।

चंपकभाई एक आदर्श मानव थे । लोकसेवा के लिये जरूरी स्वार्पण की भावना उनकी रगरग में भरी थी । दूसरों की सुख-समृद्धि के लिये महेनत करना उनका स्वभाव था । १७ तारीख की रात को जब यह हादसा हुआ, तब वो लोगों की मुश्किलों के बारे में चर्चा करके वापिस लौट रहे थे । राजकोट म्युनिसिपालीटी के अध्यक्ष की हेसियत से उन्होंने जनता की जो सेवा की है वो सर्वविदित है । उनकी जगह कोई और आदमी होता तो अपने पद या प्रतिष्ठा का उपयोग करके बहुत सारा धन एंट लेता मगर उनके स्वभाव में ये चिज हरगीझ नहीं थी । अपने ओहदे का उन्होंने अगंत समृद्धि के लिये कभी उपयोग नहीं किया ।

मैं अक्सर सोचता हूँ की अगर देश के सभी प्रधान, अमलदार, पार्लामेन्ट के सभ्य तथा छोटा-बडे लोकसेवक चंपकभाई की तरह निस्वार्थ होकर काम करने लगें, तो पूरे देश का चित्र बदल जाये । आजकल राजकीय नेताओं तथा प्रधानों पर लांचरुश्वत और पद के दुरुपयोग की फरियाद होती है और वो सत्य साबित होती है, इसका हमेशा के लिये अंत हो जाय । सार्वजनिक जीवन से गंदकी चली जाय और प्रजा का विश्वास लोकतंत्र में फिर से स्थापित हो जाय । चंपकभाई भले राजकोट में रहे थे, उनका कार्यक्षेत्र मर्यादित था, मगर उन्हें व्यापक रुप से कार्य करने का मौका मिलता तो वो अनेक लोगों की प्रेरणा बन सकते थे ।

सार्वजनिक जीवन में रहने के बावजूद उनका आत्मा सियासत की दलदल से कोसों दूर रहा । हररोज सुबह उठकर वो इश्वर का स्मरण करते थे, प्रार्थना करते थे । वो मुझे बारबार कहते थे की मैं जो करता हूँ वो तो कुछ नहीं है । इश्वर मुझे इससे अधिक जिम्मेवारी दे तो मैं ज्यादा लोगों के काम आ सकूँ । मैं केवल ईश्वरकृपा से क्षयरोग से बचा हूँ । मेरा शेष जीवन मैं लोगों की सेवा में खर्च करना चाहता हूँ ।

सन १९४६ में क्षयरोग से मुक्त होकर उन्होंने मेरी सूचनानुसार वैवाहिक जीवन में प्रवेश किया था । तब-से उनका ये संकल्प रहा था की हर साल कम-से-कम एक बार मुझे मिलने आये । अपने इस संकल्प के मुताबिक वो हर साल मुझे मिलते रहे थे । हर बार, मुझे याद नहीं पडता की उन्होंने देश के मौजूदा हालात को लेकर बात न की हो, उसके बारे में चिंता न जताई हो । देश की समस्याओं पर वो हमेशा चिंतन मनन किया करते थे, मानों वो उनकी जिम्मेवारी हो । जब आखिरी बार वो मुझे सरोडा मिलने आये थे, तब नहेरुजी का इन्तकाल हुआ था । 'देश का क्या होगा, अब वडाप्रधान कौन बनेगा, गरीबी और मँहगाई को मिटाने के लिये क्या करना होगा' इन सबके बारे में हमने विस्तृत चर्चा की थी । देश की समस्याओं से उनका मन जुडा हुआ था । देश को बहेतर बनाने के लिये वो हमेशा सोचा करते थे । ये देखकर मुझे उनके प्रति अधिक प्रेम और आदर होता था ।

उनको देखकर मैं अक्सर सोचता की उनका हृदय कितना साफ, सरल और सेवाभावी है ! दूसरों की भलाई के लिये उनके दिल में भावनाओं का कैसा तूफान है ! दिन का ज्यादातर वक्त जो अपनी नहीं, औरों की भलाई के लिये सोचता है, वो कितना महान है ! चंपकभाई एसे ही इन्सान थे । अगर प्रत्येक देशवासी अपनी हैसियत के मुताबिक देश और समाज के भले के लिये काम करने लगे तो हमारा देश कितना समुन्नत हो जायें ! देश से गरीबी मिट जाये, सभी दुःखदर्दो का अन्त हो जाये । देश की सूरत बदल जाय, धरती पर स्वर्ग उतर आये ।

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