सदभागी साक्षर
बडौदा में थियोसोफिकल सोसायटी की और से मेरे प्रवचन आयोजित किये गये थे । वहाँ मेरी भेंट एक सुप्रसिद्ध लेखक से हुई । उन्होंने मुझसे कुछ प्रश्न पूछें । जिससे प्रभावित होकर कुछ दिनों बाद वो हमें आग्रह करके अपने अलकापुरी स्थित निवासस्थान में ले गये ।
वहाँ से निकलते वक्त उन्होंने एक कोने में ले जाकर मुझे कहा: उस दिन थियोसोफिकल सोसायटी में जब मैं आपको प्रश्न पूछ रहा था, तो आपके मस्तक उपर मुझे रामकृष्ण परमहंस देव की आकृति दिखाई दी । क्या आप पूर्वजन्म में उनके शिष्य थे ? क्या आप उनसे कीसी प्रकार जुडे है ?
मैंने कहा: मेरा उनके साथ क्या संबंध है वो मैं आपको नहीं बताउँगा । हाँ, इतना जरूर कहूँगा की मैं उनका शिष्य नहीं हूँ ।
मेरी बात से उनको पूर्ण संतोष नहीं हुआ ।
मैंने कहा: आप खुशकिस्मत है की आपको रामकृष्णदेव के दर्शन का लाभ मिला ।
वो सदभागी साक्षर थे किशनसिंह चावडा ।
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अमुलख मानव
अगले साल जब हम बंबई गये तो प्रेमकुटिर में रहने की जगह नहीं थी । व्यवस्थापकों ने तीन बत्ती मार्ग पर स्थित एक मकान में हमारे रहने का इन्तजाम किया था । स्टेशन से जब वहाँ पहूँचे तो मुझे वहाँ का माहौल ठीक नहीं लगा । ये देखकर जगमोहन एन्जीनीयर ने कहा: 'सुबह जब मैंने ये स्थान देखा तो मुझे भी लगा था की ये स्थान आपके लिये ठीक नहीं है ।'
मैंने कहा, 'आपकी बात सही है, मगर अब यहाँ रहना पडेगा, और क्या विकल्प है ?'
'क्यूँ ? विकल्प तो है ।'
'कौन सा ?'
'आप मेरे घर चलो, वहाँ सभी प्रकार की सुविधा है । मेरा बडा लडका अमरिका गया है । उसका कमरा खाली पडा है । मैं आपका सामान ले जाता हूँ और मेरी गाडी आप दोनों को । मेरा यकीन किजीये, आपको किसी भी प्रकार की तकलिफ नहीं होगी ।'
'मगर आपको तकलिफ होगी ।'
'कैसी तकलिफ ? आप हमारे यहाँ पधारे इससे अधिक खुशी की बात मेरे लिये और क्या हो सकती है ?'
कुछ ही देर में हम चौपाटी के रत्नाकर पेलेस स्थित उनके निवासस्थान पर पहूँच गये । वहाँ जाकर देखा तो उनका घर उनके दिल से काफि बडा था ।
अगले साल जब माताजी का मोतिया का ओपरेशन करवाया तो जगमोहनजी ने हमें बहुत सहायता की । रत्नाकर पेलेस के वो अनमोल मोती थे ।
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नारायण स्वामी का प्रसंग
क्या समर्थ योगीपुरुष हमारे आसपास के वायुमंडल में सूक्ष्म रूप से निवास करते है ? क्या वो अपनी मरजी से किसीको दर्शन दे सकते है ? हमारे स्वानुभवसंपन्न संतो और शास्त्रों ने कहा है की हाँ, एसा हो सकता है ।
मेरी ताजेतर की आलंदी-यात्रा दौरान मेरा परिचय समाधिमंदिर के पूजारी गोविंद लक्ष्मणराव प्रसादे से हुआ । उन्होंने मेरा बहुत भाव से स्वागत किया, हमें समाधिमंदिर में घुमाया और हमसे कुछ बातें की । वो नारायण स्वामी को मानते थे । नारायण स्वामी का आश्रम आलमोडा से कुछ दूरी पर, कैलास के मार्ग में पडता है । मैं नारायण स्वामी को अच्छी तरह से जानता था, इसलिये उन्होंने कहा: 'जब नारायण स्वामी यहाँ आते थे, तो ज्ञानेश्वर महाराज की समाधि पर सर रखकर भावविभोर हो जाते थे । कभीकभी बेहोश भी हो जाते थे । फिर उन्हें उठाकर लाना पडता था । ये स्थान उनको बहुत प्रिय है ।'
फिर उन्होंने अपना स्वानुभव बताते हुए कहा: 'कोलकता में नारायण स्वामी का ओपरेशन हुआ और बाद में देहांत हो गया, ये जानकर मुझे बहुत दुःख हुआ । मैं उनका अंतिम दर्शन करने जा नहीं सका इसका असंतोष मुझे खाये जा रहा था । एक दिन जब मैं रात को सो रहा था, तो द्वार खटखटाने की आवाज आयी । मैंने द्वार खोला तो मेरे आश्चर्य का पार नहीं रहा । मेरे आगे नारायण स्वामी खडे थे । उनका स्वरूप अत्यंत आकर्षक और तेजस्वी था । मैं अवाचक होकर उन्हें देखता रहा ।
उन्होंने कहा: 'मुझे भूख लगी है, कुछ खिलाओ ।'
रात का वक्त था, इसलिये मैं सोच में पड गया की इस वक्त क्या खिलाउँ ?
मैंने उनको घर के भीतर आने का आग्रह किया मगर उन्होंने कहा, जो उपलब्ध है, ले आओ ।
मैं घर के भीतर खाना लेने गया । वापिस आकर देखा तो वो नहीं थे ! आसपास ढूँढा मगर वो नहीं मिले । मेरी समज में कुछ नहीं आया । इतनी जल्दी वो कहाँ गायब हो गये ? फिर मुझे लगा की मेरी इच्छा पूरी करने के लिये उन्होंने दर्शन दिया था ।'
पूजारी का स्वर भारी हो गया, वो ज्यादा नहीं बोल सकें । स्वस्थ होने पर उन्होंने कहा: 'क्या इस प्रकार किसी महापुरुष का मरणोपरांत दर्शन हो सकता है ?'
मैंने कहा, 'जरुर हो सकता है । आपको मरणोपरांत उनके दर्शन हुए है, आप इसे मानते है, फिर नहीं मानने की कोई वजह नहीं है । वो भले स्थूल रूप में नहीं रहे, मगर सूक्ष्म रूप में जरूर है । आप श्रद्धाभक्तिपूर्वक उनका स्मरण करो । उनके जीवन से प्रेरणा पाकर अपनी साधना आगे बढाओ । आप पर सिद्धों के स्वामी, ज्ञानेश्वर महाराज का अनुग्रह है ।'
मेरे शब्द सुनकर उनकी आँखे भर आयी । ज्ञानेश्वर महाराज का स्मरण करते हुए उन्होंने अपनी आँखे मूँद ली ।

