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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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व्यक्ति की आत्मकथा और कुछ नहीं मगर संसार में आकर लिये गये साँसो को लेखाजोखा है । व्यक्ति की आत्मकथा से हम ये जान सकते है की उसने पृथ्वी पर आकर अपना वक्त कैसे बीताया, और अपने जीवन में क्या सविशेष किया । आत्मकथा के लेखन से व्यक्ति को अपने बारे में बहुत कुछ जानने को मिलता है । तटस्थ रूप से किया गया जीवन का पृथ्थकरण व्यक्ति के लिये हमेशा लाभदायी होता है ।

आत्मकथा लिखने का आनंद अवर्णनीय होता है । व्यक्ति की आत्मकथा का स्थान साहित्यजगत में क्या है, इससे साहित्य जगत धनी होता है या नहीं, ये महत्व का नहीं है । मेरे लिये उसकी महत्ता वो मानवमन पर क्या असर छोडती है, तथा अन्य व्यक्तिओं को अल्प या अधिक मात्रा में जीवनोपयोगी प्रेरणा प्रदान करती है या नहीं, इस पर निर्भर है । यही बात मुझे आत्मकथा लिखने के लिये प्रेरीत करती रही है । जब मैं छात्र था तब मुझे अन्य महापुरुषों की आत्मकथा से जीवनोपयोगी प्रेरणा मिली थी । इसी तरह अगर किसीको मेरी आत्मकथा से प्रेरणा मिलती है, अपने जीवन को अधिक उज्जवल बनाने की सामग्री मिलती है, तो मेरा परिश्रम सार्थक है । मेरी आत्मकथा पढकर किसीको उजालों की ओर जाने में सहायता मिलती है तो मेरी महेनत फिजूल नहीं होगी । आत्मकथा का मूल्यांकन मानवजीवन की उपयोगिता की दृष्टि से होना चाहिये और मुझे लगता है की इस हिसाब से यह आत्मकथा साधकों के लिये अनमोल होगी, बेशकीमती होगी ।

इस आत्मकथा के लेखन से मुझे आत्मतृप्ति और सुकून मिला है । इसे लिखने से मुझे जीवन के बीते हुए लम्हों को फिर से जीने का मौका मिला है । एक गहरा आत्मसंतोष मिला है की मैं अपना जीवन को अपने तरीके से जी सका हूँ । मुझे लगता है की इस पंचमहाभूत के देह को धारण करके मैं पृथ्वीपट पर कोई महामूल्यवान मंगल महोत्सव में शामिल हुआ हूँ ।

उजालों की ओर चलने की मेरी यह कथा यहाँ खत्म जरूर होती है, मगर ये संपूर्ण होती है एसा कहना उचित नहीं होगा । आप ये कह सकते है की इसका एक महत्वपूर्ण अंक समाप्त हुआ । जब तक साँसे है, जीवनकथा चलती रहेगी । मेरी जीवनकथा से किसीको किसी भी प्रकार से प्रेरणा मिलती है, नवजीवन की राह मिलती है, तो मेरा परिश्रम सार्थक होगा । मैं आपके भावि की मंगल कामना करके इसका समापन करता हूँ ।

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समाप्त

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