Tue, Jan 26, 2021

मृत्यु के भय से मुक्ति प्राप्त कीजिए

मामूली लोग ऐसी विजय प्राप्त नहीं कर सकते । उनके लिए गीता एक सुंदर मार्ग दिखाती है । गीता का कथन है कि मृत्यु स्वाभाविक एवं अवश्यम्भावी है अतः उसकी चिंता या शोक व्यर्थ है । अगर मनुष्य इतनी ही सिद्धि प्राप्त कर ले तो भी काफी है । अगर वह मृत्यु से भयभीत न हो, मृत्यु का शोक न करे तथा समय आने पर बिना कष्ट या विषाद के हँसते हुए देहत्याग कर सके तो भी पर्याप्त है । मृत्यु उसके लिये नवजीवन के द्वार समान एवं ईश्वरी दूत के समान बन जाय तो यह भी कम महत्वपूर्ण सिद्धि नहीं मानी जायगी । इसके लिये उसे इसी जीवन में ऐसा कर्म करना चाहिए, ऐसा पुरुषार्थ करना चाहिए कि मृत्यु उसके लिये उलज़न न बनकर उत्सव स्वरूप हो जाए ।

शकुन्तला को ससुराल विदा करते समय कण्व ऋषि कृतार्थ हुए थे । पराई अमानत लौटाते हुए आनंद और संतोष होता है, उसका अनुभव उन्होंने किया । शकुन्तला को वह बहुत चाहते थे । अपने पूरे अस्तित्व से वे उसे प्यार करते थे । शकुन्तला उसके जीवन में ओतप्रोत हो गई थी । फिर भी उसे यही शोभा देता है, यह मानकर उसे ससुराल भेजते हुए उन्होंने अपने को ऋण मुक्त समजा ।

मनुष्य को भी देह त्यागते वक्त उसी तरह माया मुक्त बन जाना चाहिए । ईश्वर की अमानत ईश्वर को ही लौटा देने की भावना मन में रखनी चाहिए । जो जिसका है उसे उसीको देते हुए शोकग्रस्त क्यों होना चाहिए ? अन्य द्वारा दी गई जायदाद पर अपना स्वामित्व स्थापित करने का मोह क्यों रखना चाहिए ? अतः दूसरे के द्वारा दी गई अमानत योग्य समय आने पर वापिस देने में आनाकानी नहीं करनी चाहिए ।

शरीर पर भी मनुष्य को स्वामित्व का अभिमान करने की आवश्यकता नहीं । यह अभिमान व्यर्थ है तथा उससे मनुष्य का पतन होता है । शरीर ईश्वर की धरोहर है ऐसा माननेवाला व्यक्ति जब ईश्वर शरीर की माँग करेगा तब देते हुए हिचकिचाएगा नहीं । महात्माओं, आचार्यों तथा महापुरुषों की दशा ऐसी ही होती है । कबीर कहते हैं – “यह पंच महाभूत से बनी शरीररुपी चादर मैं प्रभु को जैसी उन्होंने दी थी, वैसी ही बेदाग़, समर्पित करना चाहता हूँ ।”

महापुरुषों के लिए तो यह बिल्कुल स्वाभाविक है । मृत्यु का समय आता है तब महापुरुष फूले नहीं समाते । अपने प्यारे प्रभु के पास पहुँचने का प्रसंग आ पहुंचा है इस ख्याल से वे हर्षित होते हैं । शरीर का आवरण दूर होने पर अपनी जीवात्मा परमात्मा के साथ एकाकार हो जायगी, इस विचार से वे प्रसन्न होते हैं । इसीलिये वे मृत्यु को आशीर्वाद मानते हैं और प्रियतम की भाँति उसे गले लगाते हैं । उनकी मृत्यु मंगलमय होती है । वे हँसते हँसते संसार से विदा हो जाते हैं, किन्तु साधारण लोगों की दशा इनसे भिन्न होती है । मृत्यु के समय से पहले ही वे कुहराम मचा देते हैं तथा शोक में डूब जाते हैं । लम्बे अर्से से जिस शरीर को अपना मानकर प्रीतिपात्र बना रखा है, इसे छोड़ते समय वे डर जाते हैं और अनेक प्रकार के तर्क वितर्क करने लगते हैं । फिर भी मृत्यु के आगे उनकी दाल नहीं गलती । मृत्यु के जाल में उन्हें फँसना ही पड़ता है ।

मृत्यु के समय ऐसी दुर्दशा न हो तथा मृत्यु के भय पर सदा के लिए विजय पाने के लिए मनुष्य को पहले से तैयारी करनी चाहिए । मृत्यु किसी भी काल या स्थल पर त्यौहार बन जाए, ऐसी तैयारी करने की आवश्यकता है । जीवन में सदैव उत्तम कर्म करते रहना चाहिए । जो जीवन को उत्सवमय बना सकेंगे, उनके लिए मृत्यु महोत्सव के समान बन जाएगी, इसमें संदेह नहीं । इसके साथ ही मनुष्य को समज लेना चाहिए कि मृत्यु शोक करने की चीज नहीं । एक न एक दिन संसार से जाना ही पडेगा । अतः मृत्यु का आलिंगन करने की तैयारी करनी चाहिए ।

मृत्यु का अनुभव मनुष्य को दैनिक जीवन में हो सकता है । हम जब सो जाते है तब शरीर व संसार का होश चला जाता है । यह छोटी मृत्यु है । दूर देश में प्रवास पर गया हुआ व्यक्ति अपने स्नेही सम्बन्धियों से दूर चला जाता है । भिन्न भिन्न देशों में वह घूमता है, पर अपने घर या परिवार से बिछड़ा रहता है । यह भी एक प्रकार की मृत्यु ही है, किन्तु वह ज़िंदा मौत है । इस हालत में आदमी परदेश में रहने पर भी अपने स्वजनों के समाचार प्राप्त कर सकता है तथा इच्छा होने पर उनसे मिलने भी जा सकता है । सच्ची मृत्यु में कोई अवकाश नहीं रहता । मरे हुए आदमी के समाचार उसके प्रियजनों को नहीं मिलते तथा वे लोग भी अपने समाचार उसके पास नहीं पहुँचा सकते ।

तात्पर्य यह कि व्यवहारिक जीवन में ही मनुष्य को मृत्यु की तालीम लेनी चाहिए । इस संसार से विदा होने की शक्ति धीरे-धीरे हासिल करनी चाहिए । अगर ऐसा हो तो मृत्यु के भय से मुक्त होने का कार्य उसके लिए आसान बन जाएगा ।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

We use cookies

We use cookies on our website. Some of them are essential for the operation of the site, while others help us to improve this site and the user experience (tracking cookies). You can decide for yourself whether you want to allow cookies or not. Please note that if you reject them, you may not be able to use all the functionalities of the site.