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कर्म में अकर्म तथा अकर्म में कर्म का दर्शन

कर्म करके भी अकर्म का आनंद मिल सकता है। इसके लिए एक दूसरी कला सीखने की ज़रूरत है। यह कला कर्मफल में समता रखना है। कर्म करने में और कर्मफल की इच्छा रखने में भी कोई हर्ज नहीं। किन्तु फल के असर से मुक्त रहने की युक्ति सीखना है। सामान्यतया यह देखने में आता है कि अपनी इच्छा के अनुसार फल मिलने पर आदमी उन्मत हो जाता है और कभी कभी अहंकारी भी हो जाता है। और इच्छनुसार फल न मिलने पर वह दुःखी हो जाता है। दोनों ही अवस्थाओं में उद्योग में शिथिलता आ जाने का भय रहता है। यह अच्छा नहीं। मनुष्य को ऐसा मनोबल प्राप्त करना है जिससे वह कर्मफल से चंचल न हो जाय। कमल जल में रहता है फिर भी भीगा नहीं होता। इसी प्रकार कर्म एवं कर्म के फल से मनुष्य को अलिप्त रहना है। सम्पत्ति मिलने पर घमंडी नहीं होना है और न विवेक को खो बैठना है। विपत्ति से दुःखी या प्रमादी नहीं बनना है। यदि इच्छानुसार फल न मिले तो भी पुरुषार्थ का त्याग करके निठल्ले नहीं बैठना है। इसके अलावा जो कुछ फल मिले उसे भी ईश्वर के चरणों में न्योछावर करना है। ईश्वर एवं उसके संसार के लिए अपनी सभी सम्पत्ति का उपयोग करने के लिए तैयार रहना है। इस प्रकार कुशलता से कर्म करने से कर्म करते हुए भी मनुष्य अकर्म के आनंद को प्राप्त कर सकेगा। कुछ भी नहीं करते है एसा प्रतीत होगा और सारा काम सहज रूप से होगा। इस दशा के लिए मुख्यतः निम्नलिखित चीज़ों की आवश्यकता है।

(१) कर्तापन के अभिमान का त्याग
(२) प्रभु कर्म करवाते हैं, ऐसा मानकर प्रभु को समर्पण करना तथा प्रभु की प्रसन्नता के लिए करना
(३) फल मैं समता रखना

कर्म में अकर्म का दर्शन करने की यह बात गीता की अपनी बात है। भगवान अर्जुन को यह बात समजाकर कहते हैं, “तू कर्तापन के अहंकार से मुक्त होना और मैं (भगवान) करवाता हूँ ऐसा मानकर कर्म कर।” इसी बात को ज़रा विस्तार से वे आगे चलकर कहते हैं कि जिस में अहंभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्म से लोपायमान नहीं है, वह शायद सारे संसार का नाश कर डाले, फिर भी वास्तव में किसी का नाश नहीं करता और कर्म से बद्ध नहीं होता। संसार में रहकर कर्म करते हुए भी अकर्मी बने रहने की इस कला का उपयोग करके कोई भी आदमी कर्म के बंधन से मुक्त हो सकता हैं और अपने जीवन को सुखी बना सकता है। भगवान इस कला में कुशल हैं। तभी तो भिन्न भिन्न कार्य करते हैं। फिर भी बंधन में नहीं पड़ते।

आज साधु का नाम सुनकर कुछ लोग मुंह सिकोड़ लेते हैं। उनको लगता है कि साधु आलसी होते हैं, उन्होंने समाज का सत्यानाश किया है। इसलिए उन्हें भिक्षा नहीं देनी चाहिए। उनके लिए जो अन्नक्षेत्र हैं उनको बंद कर देना चाहिए। उनको गोली से मार देना चाहिए नहीं तो पलटन में भरती कर देना चाहिए। ऐसी सलाह वे देते हैं। हम साधु संस्था की विशेष वकालत नहीं करना चाहते, लेकिन साथ ही उसको नष्ट करने की सलाह भी नहीं देते। साधु संस्था में दोष होंगे और हैं भी। किन्तु दुनिया में दोष कहाँ नहीं है? गुण दोष का मिश्रण ही तो जगत हैं। अतएव अच्छा मार्ग तो यही है कि दोष दूर करने की सलाह दो, कोशिश करो और कोई पद्धति दिखाओ। पारी में यदि फोड़ा हो जाय तो पारी काट देने की ज़रूरत नहीं। ज़रा सोचो तो साधु आते कहाँ से हैं। कुछ आसमान से थोड़े ही उतर आते हैं। तुम में से या समाज ही में से आते हैं। क्या तुम संपूर्णतया अच्छे हो? तुम्हारा समाज क्या बिलकुल विशुद्ध है? तब तो साधु भी तुम्हारी तरह ही है। हमारे समाज में ऐसे कितने ही लोग हैं जो दूसरों का कोई हित नहीं करते। यहाँ तक तो अच्छा हैं, किन्तु दूसरों का बुरा करते हैं। किन्तु उन्हें गोलियों से मारने की सलाह कोई नहीं देता। इतना साहस किसीको नहीं होता। तो फिर साधुओं के लिए ही यह सलाह क्यों? रोटी का टुकड़ा तो तुम कुत्ते या बिल्ली को भी डाल देते हो। इतना दयाभाव तो तुम्हारा धर्म भी सिखाता है । अगर यह सच है तो साधु या मांगनेवालों को रोटी देने में क्या हर्ज है? इसमें तुम्हारी इच्छा का सवाल है, जबरदस्ती कहाँ है? अतः अन्नक्षेत्र बंद करने का साहस मिथ्या है और अनुचित भी है। साधु आलसी ही हैं ऐसा मत मानिए। कुछ लोग बाहर से अकर्मण्य दीखते हों फिर भी अंदर से महान एवं अविरत काम करते रहते हैं। हाँ, उसका काम हम से भिन्न होता है। उसमें अधिक दौड़धूप नहीं होती, किन्तु वे कर्म तो करते हैं। उन्हें आलसी मानना अनुपयुक्त है।

महान भक्त बालक ध्रुव को याद कीजिए। अपनी मां के बचन सुनकर वे बन को चल पड़े। रास्ते में नारद से मुलाक़ात हुई। उन्होंने मंत्रदान दिया। फिर वे मधुबन में आए और घोर तप करने लगे और आख़िरकार पैर के अंगूठे पर खड़े रहे। वृत्तियों को विषयों से खींचकर केवल भगवान के ध्यान में लगा दिया। यदि ऊपरी दृष्टि से विचार किया जाय तो ध्रुव आलसी या अकर्मी ही लगेंगे। किन्तु क्या वे सचमुच अकर्मी थे? वे अपने मन से कितना प्रबल कार्य कर रहे थे। इस प्रबल कर्म के फलस्वरूप साक्षात् भगवान को भी पृथ्वी पर प्रकट होना पडा और दर्शन देना पड़ा।
अब वाल्मीकि का स्मरण कीजिए। वे राम राम की जगह मरा मरा रटते थे। वे शरीर से दूसरा कोई कार्य नहीं करते थे। फिर भी उन्हें निष्क्रिय मानना उचित नहीं। उनका मन सतत कार्यशील था। उनके शरीर पर चींटीयों ने घर बना लिया, फिर भी उनका कार्य जारी रहा। अन्त में उनका तपरुपी कार्य पूरा हुआ और प्रभु प्रकट हुए। बाहर से अकर्मी दीख पड़नेवाले वाल्मीकि कैसा महान कार्य कर रहे थे, उसका पता उसी वक्त चला।

हमारा शरीर भी तो बाहर से शांत एवं निष्क्रिय दिखाई देता है। किन्तु आंतरिक दृष्टि से वह कितना कर्मठ है। रक्तवाहिनीयों में रक्त निरंतर बहता रहता है। जठ़र, फ़ेफड़े, हृदय आदि रात दिन अपना अपना कर्म करते ही रहते हैं। सारे शरीर में भी परिवर्तन होता है। वह बढ़ता है, जवान होता है और फिर बूढ़ा हो जाता है। सप्ताह में एक दिन तो क्या, महीने में एक दिन की छुट्टी भी उसे नहीं मिलती। उसके समान मूक कर्मयोगी या सच्चा सेवक दूसरा कौन हैं? ऊपर ऊपर से सरसरी निगाह से देखनेवाले को उसकी सेवा का अंदाज़ होना भी कठिन है।

इस पृथ्वी को देखिए जो हमारे सामने है। यह कितनी निष्क्रिय लगती है। किन्तु इसके अंदर कितनी प्रवृत्तियाँ चलती रहती हैं। मान लीजिए कि हम बम्बई जैसे बड़े शहर में बैठे हैं। इसकी ज़मीन के निचे गटर होते हैं जिन में से गंदगी के प्रवाह बहते ही रहते हैं। पृथ्वी के अंदर भी फेरफार होते रहते हैं। कभी कभी भूकंप आ जाते हैं। यह खुला आसमान कितना शांत एवं कर्महीन दिखाई देता है किन्तु इसमें वायु के कितने परमाणु फ़ैल रहे हैं। कितने ग्रह-नक्षत्र घूम रहे हैं। सूक्ष्म निरिक्षण से यह पता चलता है। अतः संसार में कोई भी चीज़ निष्क्रिय नहीं है। मानव एवं कुदरत अपने अपने कार्य करते ही रहते हैं। जब सारा जगत ही गतिशील है तो उसके पदार्थ बिना गति के कैसे रह सकते हैं? शरीर, मन और इन्द्रियों से भी कर्म होते हैं। संकल्प से भी कई काम होते हैं। आप सब इस विशाल कमरे में बैठे है और मेरी बात को गौर से सुन रहे हैं। किन्तु क्या सब का मन मेरी बात में या इस कमरे में हैं? कुछ लोगों का मन घर में घूम रहा होगा और किसी के साथ बातचीत करता होगा। मनुष्य आँखे मूंदकर ध्यान करने के लिए बैठते हैं परन्तु उनका मन अक्सर इधर उधर दौड़ धूप करता रहता है। मन के द्वारा वह अनेक दृश्य देखा करते हैं। इस प्रकार ध्यान की बजाय बहुत सा दूसरा काम होता है।

महाभारत के युद्ध के प्रारंभ का ख्याल कीजिए। अर्जुन धनुषबाण को त्यागकर बैठ गया है और युद्ध न करने की दलीलें करता है। उस समय भगवान रथ में बैठे हैं। बाहर से देखने पर वे शांत है किन्तु भीतर ही भीतर उनका मन कितना क्रियाशील है ! अर्जुन को किस भांति समजाया जाय, भीष्म, द्रोण और कर्ण का नाश करके पांडवों को किस प्रकार विजयी बनाया जाय, यह सब विचार उनके मन में उथल पुथल मचाए हुए है।

अतः संसार में कोई अकर्मी नहीं हैं। श्वास लेना भी कर्म है। जब तक जीवन रहेगा, कर्म भी चालू रहेगा। कभी कभी वह बाहर से दीखेगा और कभी कभी नहीं। कभी विशाल रूप में होता है तो कभी साधारण रूप में, किन्तु कर्म सदा होता ही रहता है। ऐसा समजना ही विवेक कहलाता है, वही बुद्धिमानी है। गीताकार का यह संदेश हैं कि अकर्म में कर्म को देखना चाहिए। अगर कर्म का त्याग करने की बजाय – जो कि असंभव है – कर्म को ठीक ढंग से करने की कला सीख ली जाय, तो मनुष्य का भौतिक तथा आत्मिक दोनों ही प्रकार का कल्याण हो सकता है।
जो लोग अकर्मी होने का दावा करते हैं वे भी वास्तव में कर्म करते रहते हैं। अकर्मी बनने के लिए कर्म का स्वरूपतः त्याग करना ज़रूरी नहीं; ऐसा त्याग हो भी नहीं सकता। परन्तु कोई भी कार्य यदि कुशलता से किया जाय तो वह अकर्म बन जाता है। ऐसी कुशलता प्राप्त करने की कला गीता में अच्छी तरह समजाई गई है।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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