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कर्म की गति गहन है

कर्म करके भी अकर्म का आनंद मिल सकता है। इसके लिए एक दूसरी कला सीखने की ज़रूरत है। यह कला कर्मफल में समता रखना है। कर्म करने में और कर्मफल की इच्छा रखने में भी कोई हर्ज नहीं। किन्तु फल के असर से मुक्त रहने की युक्ति सीखना है। सामान्यतया यह देखने में आता है कि अपनी इच्छा के अनुसार फल मिलने पर आदमी उन्मत हो जाता है और कभी कभी अहंकारी भी हो जाता है। और इच्छनुसार फल न मिलने पर वह दुःखी हो जाता है। दोनों ही अवस्थाओं में उद्योग में शिथिलता आ जाने का भय रहता है। यह अच्छा नहीं। मनुष्य को ऐसा कर्म के रहस्य को समज़ना बड़ा कठिन है। किस कर्म का फल क्या मिलता है, कब मिलता है, इसे कोई नहीं समज़ सकता। कर्म का फल मिलता है यह निश्चित है, किन्तु कितने समय में यह कौन कह सकता है? सुकर्म का फल अच्छा और कुकर्म का फल बुरा होगा, यह निश्चित है, किन्तु उसके लिए कितना वक्त लगेगा यह केवल ईश्वर ही जानता है। इसीलिए गीता कहती है कि कर्म की गति गहन है। कभी आदमी कर्म के फल को उसी जन्म में या तुरंत प्राप्त कर लेता है, तो कभी उसे दूसरे जन्म में भुगतना पड़ता है। इस बारे में प्रसिद्द भक्त सदन कसाई की बात को जानने की जरूरत है। वे एक बार जगन्नाथ पुरी की यात्रा को गए। रस्ते में एक गांव आया जहां वह रातभर रहें। उस घर में रहनेवाली स्त्री सदन कसाई पर मोहित हो गई। रात को जब उसका पति सो गया तब वह कसाई के समीप गई और कहने लगी, “तुम्हारे रूप से मैं मोहित हुई हूँ। तुम मुझे सप्रेम स्वीकार करो और मेरा उपभोग करके मुझे सुख दो।”

सदन भक्त ने उसकी मांग का अनादर किया और उसे सीख दी। बाई को लगा कि सदन कसाई उसके पति से डरता है इसलिए वह घर में गई और थोड़ी ही देर में सोते पति का सिर काटकर वापिस लौट आई। भक्त यह देखकर दुःख से स्तम्भित हो गया। परन्तु, वह स्त्री कहने लगी, “आप मेरे पति से डरते थे न? इसलिए मैंने उसको दूर कर दिया है। अब किसी भी प्रकार के संकोच के बिना मेरी इच्छा पूरी कीजिए।”

बाई की भयंकरता देखकर सदन का शरीर कांप उठा। परपुरुष के स्पर्श का क्षणिक सुख भोगने के लिए अपने पति की हत्या करने में भी जिसे संकोच न हुआ वह बाई कितनी क्रूर एवं कामुक होगी। भक्त ने उसकी कामुकता एवं क्रूरता के आगे सिर झुकाने से साफ़ इंकार कर दिया। इससे तो वह औरत अपने आप में न रही। पति का खून करने पर भी अपना उद्देश्य पूरा नहीं हुआ देख उसने नाटक का अभिनय बदल दिया और फूट फूट कर रोने लगी। रात्रि की नीरव बेला में उसका क्रंदन सुनकर सारा गांव वहां जमा हो गया। सदन भक्त की ओर संकेत करके बाई ने कहा, “यह भक्त जैसा दिखनेवाला आदमी बड़ा छलिया है। दया करके हमने रातभर उसे अपने घर ठहरने दिया। मेरे पति के सो जाने के बाद वह मुझे छेड़ने लगा और जब मैंने विरोध किया तो उसने मेरे पति का खून कर डाला। अपने मार्ग से कांटा हटाकर अब वह चैन से बैठा है। उसकी पोल खुल गई, इसीलिए तो वह चुप है। इस ढोंगी और हत्यारे को सज़ा मिलनी चाहिए। ऐसा कहकर वह आठ आठ आंसू रोने लगी मानो अपना सर्वस्व ही खो बैठी हो।

सदन भक्त को पकड़ लिया गया। दूसरे दिन गांव के मुखिया ने उसको दंड दिया। उसका एक हाथ काट दिया जाय ऐसा तय हुआ। और हाथ काटने पर भी उसने कोई चील-पुकार या विरोध नहीं किया। हर एक कार्य में शिव (मंगल) को देखनेवाले इस भक्त ने हाथ काट जाने में भी मंगल का दर्शन किया और ईश्वर की कृपा को देखा। फिर यात्रा को पुनः आरम्भ किया।

जगन्नाथ पुरी में पहुँचकर बड़े प्रेम से प्रभु का स्मरण करने लगा। कालान्तर में एक धन्य दिन आया जब परमात्मा ने उसे साक्षात दर्शन दिया। वह अत्यधिक हर्षित हुआ। कुछ बातचीत भी हुई। भक्त ने अपने कटे हुए हाथ के बारे में पूछा। “मैं तो इस जीवन में आपका भजन करता हूँ। पाप कर्म कभी नहीं किया, फिर भी बिना किसी अपराध के मुझे यह महान दण्ड मिला। इसका कारण क्या है?”

भगवान ने प्रत्युतर दिया, “भाई कर्म का नियम निश्चित है, किन्तु मनुष्य उसे समझ नहीं सकता है। इस जन्म में तूने पाप नहीं किया, लेकिन पूर्वजन्म में तूने बड़ा अपराध किया था। जिसके फलस्वरूप तुझे यह दण्ड मिला है। पूर्वजन्म में जब तू अपने घर के पास खड़ा था एक गाय विवश दशा में तेरे पास आई। उसके पीछे आता था कसाई। जब वह तेरे समीप पहुंचा तो तूने गाय को बचाने का प्रयत्न करने के बजाय गाय कसाई को दे दी। कसाई ने उस गाय की हत्या की। इस जन्म में वह गाय तुज पर मोहित होनेवाली स्त्री बनी और कसाई उसका पति बना। वह अपनी स्त्री के हाथों मरा और तूने जो पिछले जन्म गाय अपने हाथ से कसाई को दी थी सो तेरा हाथ काटा गया। जा अब तूने मेरा दर्शन किया है अतः तू जब चाहेगा तब मेरी कृपा से तेरा हाथ फिर निकल आएगा।”

सचमुच कर्म की गति गहन है फिर भी निश्चित हैं। इस संसार में कुछ लोग अच्छा शरीर लेकर पैदा होते है तो कुछ दुर्बल, अस्वस्थ या विकृत शरीर लेकर जन्म लेते हैं। कुछ बालक इतना मधुर संभाषण करते हैं कि सगे संबंधी उससे तृप्त नहीं होते। कुछ जन्म से ही मूक रहे हैं और कई रोगों को विरासत में लेकर आते हैं। लोगों को किसी से प्रेम होता है तो किसी से बैर। कभी कभी अजनबियों से प्रीति हो जाती है और प्रेमीजनों से मनमुटाव हो जाता है, पास रहते हुए भी मनुष्य बहुत दूर हो जाता है। कोई आदमी सुख एवं सम्पत्ति के लिए जितना प्रयत्न करता है उतना ही दुःख और विपत्ति पाता है। एक दूसरा है की बुरे काम करके भी सुख भोगता दिखाई देता है। एक आदमी बूढ़ा हो गया और उस पर दुःख का पहाड़ गिरता है, फिर भी उसकी आंख नहीं खुलती और न तो संसार से हटता है और न प्रभु की शरण में जाता है। कुछ दूसरे लोग है कि सब प्रकार का सुख होते हुए भी भगवान को याद करते रहते हैं। कुछ लोग बचपन ही से संसार सुख छोड़कर ईश्वर के मार्ग में निकल पड़ते हैं। कर्म के अनुसार ही उसे शरीर, माता पिता तथा जीवन की सारी सामग्री प्राप्त होती है। अपने पुरुषार्थ से वह अपने जीवन को अधिक सुन्दर और उत्कृष्ट बना सकता है।

गीतामाता कहती है कि मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है। जो हो गया है उसका कोई चारा नहीं, किन्तु आगे क्या करना है, कब करना है और कैसे करना है इसका निर्णय मनुष्य स्वयं कर सकता है। इस प्रकार मनुष्य अपने जीवन का निर्माण कर सकता है। जो करता है वह भरता है यह नियम अटल है। इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में, लेकिन अच्छे कर्म का अच्छा और बुरे कर्म का बुरा फल अवश्य मिलता है। अतएव अच्छे कार्य करने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए। अपने जीवन को उन्नत बनाने के लिए सावधानी से प्रयत्न करना चाहिए। जीवन में कैसी ही कठिनाइयों, बाधाओं, दुःखों या असफलताओं का सामना करना पड़े, फिर भी हताश नहीं होना चाहिए, बल्कि उत्साह और उधोग को और भी तीव्र कर देना चाहिए। सुख दुःख, हार जीत में समान होने का अर्थ यही है कि प्रयत्न को हर अवस्था में जारी रखा जाय। यह सच है कि कर्म की गति गहन है, किन्तु उसमें अंधेर नहीं है। कर्मों का हिसाब रखनेवाले और फल देनेवाले स्वयं भगवान ही है। उनके किसी काम में त्रुटी नहीं हो सकती। किस कर्म का फल कब और किस रूप में मिलना चाहिए यह भी ईश्वर ही तय करते हैं। इस बात को अच्छी तरह समझकर बुद्धिमान पुरुषों को चाहिए कि दुष्कर्मों से बचें और सत्कर्मों में जुट जांय।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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