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सच्चा पंडित

कर्म करके भी अकर्म का आनंद मिल सकता है। इसके लिए एक दूसरी कला सीखने की ज़रूरत है। यह कला कर्मफल में समता रखना है। कर्म करने में और कर्मफल की इच्छा रखने में भी यह बात समझकर जो शांति से जीवन बिताता है वही पंडित है। पंडित बनने के लिए शास्त्रों के अध्ययन की जरूरत नहीं, बहुत भाषाओँ एवं विषयों को जानने की भी जरूरत नहीं। जो अच्छे विचारों, सद्गुणों तथा चारित्र्य से पंडित है वही पंडित है। जो काम एवं क्रोध के आवेग से व्याकुल होता है, जूठ और कपट का आश्रय लेता है, ढोंग करता है और अहंकार, स्वार्थ तथा ममता से जिसका जीवन मन्दिर खंडित है, वह पंडित नही है। पंडित तो वह है जिसे संसार के असार विषयों में नहीं बल्कि प्रभु में प्रीति है। जो संसार में प्रभु का दर्शन करता है और यज्ञ की भावना से विवेकपूर्वक कर्म करने पर भी अकर्तापन का अनुभव करता है। जो सदा संतोषी है, ईश्वर के सिवा किसी दूसरे की नौकरी या खुशामद नहीं करता और न दूसरे को अपना हृदय देता है। जो मन एवं इन्द्रियों पर काबू रखकर और हंस की भांति विवेकी होकर इस संसार में रहता है। जो किसी से न तो द्वेष करता है और न डरता है। संसार के प्रलोभनों से सदा दूर रहता है और दया, प्रेम, क्षमा और सेवाभाव की मूर्ति बनकर जीता है। उत्तम कर्मयोगी भी पंडित या ज्ञानी जैसे ही होता है। यही उसकी योग्यता है। वह कितना विद्वान है यह बात महत्व की नहीं। एक आदमी बिलकुल पढ़ा लिखा न हो, स्कूल या कालिज में न गया हो और अपना नाम भी न लिख सकता हो, फिर भी यदि उसमें यह योग्यता है तो वह ज्ञानी या पंडित है। इस प्रकार किसी आदमी ने खूब किताबें पढ़ी हो, डिग्रियां हासिल की हों, लेकिन यदि उसमें उपर्युक्त योग्यता नहीं है तो वह गीता की दृष्टि से पंडित या ज्ञानी नहीं है किन्तु ज्ञान का भार वहन करनेवाला है। जो ज्ञान हृदय के मैल को दूर कर मनुष्य को सच्चा मनुष्य नहीं बनाता और उसे चराचर में एकत्व का दर्शन करना नहीं सिखाता, वह ज्ञान गीता की दृष्टि से बोज है। ऐसे मनुष्य को गीता पंडित की पदवी नहीं देती।

कुछ पंडितों को लेख लिखने की आदत होती है। वे अपना नाम लिखते हैं वो उसके साथ ‘सकल शास्त्र विशारद’, ‘न्यायतीर्थ’, ‘वेदांत वागीश’, आदि उपाधि भी लिखते हैं। अंग्रेजी पढ़े लिखे भी कुछ लोग अपनी डिग्री लिखते हैं। यहाँ तक कि आध्यात्मिक लेखों के आगे भी बिना अपनी डिग्री लिखे उनसे नहीं रहा जाता। किसी भी लेख का मूल्य उसके अन्तर्हित सामग्री से होगा। किसीको अंग्रेजी या संस्कृत की उपाधियां मिल गई इसलिए उसमें लिखने या बोलने की योग्यता भी आ गई, ऐसा मानना अनुपयुक्त है। आध्यात्मिकता को प्रभावोत्पादक ढंग से प्रतुत करने के लिए उसे जीवन में उतारने की आवश्यकता है यही योग्यता उपयोगी है।

जो ज्ञान का अनुभव करता है वही परमात्मा को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। वही सच्चा पंडित या ज्ञानी है, चाहे उसने पाठशाला में अध्ययन न किया हो या उसके पास उपाधियां न हों। मनुष्य को अपने पांडित्य का उपयोग लोगों को खुश करने या प्रवचन करने ही में नहीं करना चाहिए। पुराने ज़माने में पंडित शास्त्रार्थ करने निकलते थे। उनके दिल में दिग्विजयी बनने की लालसा रहती थी। उस लालसा के पीछे अहंकार था। अहंकारी को शांति मिलना मुश्किल है। जिस प्रकार फल आने पर वृक्ष झुक जाता है और पक जाने पर चावल अधिक नर्म हो जाते हैं, उसी प्रकार ज्ञानी को अधिक सरल, कोमल और विनम्र होना चाहिए। हमारे यहाँ कुछ लोग ज्ञानी या पंडित कहलाते हैं। किन्तु बड़ी उम्र में भी वे शादी करने के लिए तैयार हो जाते हैं। आदमी एक बार शादी करे यह स्वाभाविक है, किन्तु बूढ़ा हो जाने पर भी दूसरी या तीसरी शादी करने के लिए तैयार हो जाय यह पंडित या ज्ञानी को शोभा नहीं देता, चाहे साधारण आदमी के लिए आपत्तिजनक न हों। हमारे यहाँ के कम पढ़े और निरक्षर लोग भी जानते हैं कि जो ज्ञानी या पंडित हैं वे कामिनी या कामवासना से मुक्त रहते हैं। यदि वे भी मामूली आदमियों की भांति काम क्रोध में डूबे हों तो उनमें और साधारण मनुष्यों में भेद ही क्या रहा? ज्ञानी पुरुष को कम क्रोध व लौकिक वासनाओं से ऊपर उठना ही चाहिए। शरीर की अधिक परवरिश और वासना को अधिक उत्तेजित करने को हम अच्छा नहीं समजते हैं। यही कारण है कि हम संयमी और वीतराग महापुरुषों के चरणों में वंदन करते हैं और जितेन्द्रिय पुरुषों को पूज्य कहते हैं।

पंडितों को अंग्रेजी या संस्कृत में ही बोलना चाहिए यह आग्रह व्यर्थ है। जहां जो भाषा प्रचलित हो वहां उसी भाषा में अपने विचार व्यक्त कीजिए। कुछ लोग जो मेरे पास आते हैं वे भलीभांति जानते हैं कि मैं गुजराती जानता हूँ और वे भी गुजराती जानते हैं, फिर भी कुछ नवीनता का अभिनय करते हुए वे मेरे साथ अंग्रेजी में बोलना शुरू कर देते हैं। यहाँ तक तो ठीक है किन्तु वे तो ऐसा मानते हैं कि ज्ञानी या पंडित अंग्रेजी या संस्कृत जानते ही हैं और उसी में बोलते हैं। ऐसे लोगों को किस प्रकार समजाया जाय कि श्री रामकृष्ण परमहंस, भगवान बुद्ध, रमण महर्षि, ईसा मशीह, तुकाराम तथा नरसिंह प्रभृति महापुरुषों को अंग्रेजी या संस्कृत में बोलेने की आदत नहीं थी, फिर भी वे महान पंडित एवं ज्ञानी थे। बड़े बड़े विद्वान शांति प्राप्त करने तथा शंका का समाधान करने उनके पास आते थे। हां तो जहां अंग्रेजी और संस्कृत का प्रचार नहीं है वहां क्या ज्ञानी और पंडित नहीं होते?

जिन्दगी की लड़ाई में काम क्रोध एवं अविवेक जैसे योद्धाओं का सफलतापूर्वक सामना करके जो विजय हासिल करता है तथा परमात्मा और परमशान्ति की प्राप्ति करता है वही वास्तव में सच्चा वीर है। पंडित एवं ज्ञानी भी वही है। सिर्फ़ भाषाज्ञान या शास्त्रों का ज्ञान बढ़ाने से जीवन युद्ध में विजय नहीं प्राप्त हो सकती। उसके लिए तो उचित आचरण करना पडेगा। अतः भाषा की बजाय उचित आचरण का आग्रह रखिए।

पंडीत या ज्ञानी को नम्रातिनम्र बनना चाहिए। पंडित बनते बनते यदि मनुष्य गर्व से भारी हो जाय और सद्गुरु बनते बनते अत्यंत बोज़िल हो जाय तो यह सब बोज़ निरर्थक है। कहा जाता है कि मधुसूदन सरस्वती को बातचीत द्वारा दूसरों को पराजित करने का बहुत शौक़ था। और वे अहंकारी हो गए थे। एक बार एक अवधूत महापुरुष उनके पास आए और बोले, “तु पंडित है लेकिन अफ़सोस की बात है कि तू अपने पांडित्य का दुरूपयोग करता है। दूसरों को पराजित करने का आनंद कब तक लूटता रहेगा? तेरा शेष जीवन बर्बाद न हो जाय, इसलिए तुझे सावधान करने आया हूँ। अपनी विद्वत्ता की हिफाज़त कर और परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए उसका उपयोग कर। तेरा जीवन सार्थक हो जायगा।” इन शब्दों का गहरा असर मधुसूदन पर हुआ और उन्होंने बहस करना छोड़ दिया और श्री कृष्ण की भक्ति में अपना शेष जीवन बिताया।

केशव काश्मीरी की भी यही आदत थी। वे शीघ्र कवि थे। वे एकबार चैतन्य महाप्रभु के पास आए और उन्हें चकित कर देने के लिए गंगा के बारे में श्लोक बोलने लगे। इस प्रकार सौ से अधिक श्लोक कह डाले और उनके पांडित्य से चैतन्य महाप्रभु कैसे प्रभावित हुए हैं, यह देखने के लिए सीना तान कर खड़े रहे। चैतन्य महाप्रभु गर्व से रहित थे। केशव काश्मीरी के पूछने पर उनके श्लोको की गलतियां बताने लगे। केशव काश्मीरी दंग रह गए। उनको महसूस हुआ कि मैंने तो सिर्फ श्लोक सुनाए किन्तु इस महापुरुष ने तो उन्हें याद रखकर उनकी त्रुटियां बताई, तो उनकी बुद्धि कितनी तेज़ होगी। केशव काश्मीरी का अभिमान चूर हो गया और वे चैतन्य देव के चरणों में गिर पड़े। चैतन्य देव ने उन्हें नम्र बनने की एवं ईश्वर के प्रेम में सराबोर हो जाने की सलाह दी।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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