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ज्ञान की महिमा

यह उत्तम ज्ञान किस प्रकार प्राप्त होता है और कौन देता है? गीता का उत्तर है कि ज्ञानी एवं तत्ववेत्ता के पास से परमात्मा का परम ज्ञान मिल सकता है। परमात्मा के पास पहुँचने का पथ भी यह महापुरुष दिखा सकते हैं। जिसने परमात्मा के पास पहुँचने का प्रयत्न किया हो, साधना की हो, वही यह मार्ग दिखाने के लिए योग्य है। गीता का कहना है कि आत्मज्ञान प्रदान करनेवाला पुरुष या गुरु केवल ज्ञानी ही नहीं अपितु तत्वदर्शी भी होना चाहिए। ऐसे गुरु में ज्ञान के साथ अनुभूति भी होगी। आजकल कई जगह ज्ञान या वेदांत सिखाया जाता है। किन्तु प्रायः ग्रंथ ही सिखाए या सीखे जाते हैं। फलतः शांति प्राप्त नहीं होती। सच्ची शांति प्राप्त करने के लिए ग्रंथों के ज्ञान द्वारा समाधान हासिल करके मनुष्य को अपने भीतर गहराई में जाना चाहिए एवं स्वरुप का साक्षात्कार करना चाहिए। जिन्होंने ईश्वर का दर्शन किया है ऐसे महापुरुषों से प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए, तभी शांति प्राप्त होगी। आज तो जो आदमी धर्म या तत्वज्ञान की कुछ पुस्तकें पढ़ जाय और उनके बारे में बोलने या लिखने की शक्ति प्राप्त कर ले वह तत्वज्ञानी कहलाता है। किन्तु पुस्तकों के ज्ञान से ही कोई तत्वज्ञानी नहीं बन सकता। तत्वज्ञानी बनने के लिए ज्ञान के अतिरिक्त अनुभव की भी आवश्यकता होती है। इस प्रकार अपने भीतर या सारे संसार में विद्यमान परमात्मा तत्व का जो दर्शन करता है वही सच्चा दार्शनिक या तत्वज्ञानी है।

यदि सौभाग्य से ऐसे तत्वदर्शी या महापुरुष का समागम हो जाय तो हमारा काम आसान हो जाय, मुक्ति एवं पूर्णता हासिल की जा सके, हमारी शंकाएं शांत हो जाय, चिंता टल जाय तथा जीवन की साधना सफल हो जाय। अंतर में निहित जीर्ण आवरण हट जाय और जीवन में प्रशांति एवं प्रकाश फ़ैल जाय। इसिलए तो ऐसे महापुरुष को हम सद्गुरु कहते हैं। वह हमारी कायापलट कर देता है। हमारा नया जन्म कर देता है। इसीलिए हम उनकी हरदम प्रशंसा करते हैं और उन्हें ईश्वर तुल्य समजते हैं। ऐसे महात्माओं को अपने लिए कोई लालसा नहीं, कोई उलज़न नहीं, कोई शंका नहीं। उन्होंने जीवन का ध्येय हासिल किया है। कितने ही जन्मों के पुण्य तथा ईश्वर की कृपा से ही ऐसे संतों से मिलना होता है।

सत्पुरुष की संगती का लाभ उठाने के लिए एवं उनके अनुभवसिद्ध ज्ञान को प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए, इसके बारे में गीता संदेश देती है। सब से प्रथम उनके चरणों में बंदन कीजिए। क्योंकि वंदन करने से हम उनकी पूजा करते हैं और साथ ही अपनी नम्रता व्यक्त करते हैं। जो अहंकार करते हैं और अपने को बहुत बड़ा समज़ते हैं उन्हें अहंकार को छोड़कर नम्र बनना चाहिए और तत्वज्ञ पुरुषों के चरणों में गिरना चाहिए। साधारण आदमी को भी वंदन करने में क्या हानि है? श्री रामकृष्णदेव, दूसरे उन्हें वंदन करें उससे पहले ही सबको वंदन कर लेते थे। तुलसीदास भी लिखते है, “सियाराम मय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी। अर्थात इस संसार को सीता राम मय जानकार मैं दोनों हाथ जोड़कर सबको प्रणाम करता हूँ। विशेषतः देवता, गुरु, बुज़ुर्ग एवं संत को वंदन करना चाहिए। बाह्य शिष्टाचार की आवश्यकता भी कुछ कम नहीं हैं।

संत महात्मा या महापुरुष को वंदन मात्र करके बैठे रहने से क्या फ़ायदा? उन लोगों के संपर्क से शंका समाधान स्वतः हो जायगा, यह सच है, फिर भी किसी विशेष बात का स्पष्टीकरण प्राप्त करना हो तो उसके लिए प्रश्न पूछने चाहिए। अर्जुन के प्रश्न पूछने पर ही भगवान ने अमूल्य ज्ञान अभिव्यक्त किया। कुछ लोग महात्माओं के पास शून्यमनस्क होकर बैठे रहते हैं और टिका करते हैं कि हमें कुछ ज्ञान नहीं मिला। किन्तु यह टिका निर्मूल है। मूक बैठे रहकर भी मनुष्य बहुत जानकारी प्राप्त कर सकता है अगर उसे सिखने की इच्छा हो। परन्तु सत्संग का पूरा लाभ उठाने के लिए महापुरुष से प्रश्न पूछने चाहिए।

कतिपय चीज़ें ऐसी हैं जिन्हें महापुरुषों से सहज में नहीं प्राप्त किया जा सकता। उसके लिए उनके दिल को खुश करना पड़ेगा तथा उनकी सेवा करनी पड़ेगी। सेवा केवल धन से नहीं होती, शरीर से भी होती है। लम्बे अरसे तक सेवा करने से महापुरुष प्रसन्न होते हैं और हमारे जीवन को सार्थक बना देते हैं। सेवा करने से मेवा मिलता है यह सच है। अतः महापुरुषों की सेवा के लिए सदा तैयार रहिए। सेवा से प्रसन्न होकर वे ज्ञान एवं साधना के गहन रहस्यों को खोल देंगे और लम्बे अरसे तक सेवा करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है, इस में संदेह नहीं। गीता ने यह बात तत्वज्ञानी महापुरुषों के बारे में कही है। फिर भी जिनसे भी हमें शिक्षा लेनी है उनके प्रति नम्रता व आदर प्रकट करने की आवश्यकता है। जो घमंडी है, अपने को बहुत बड़ा समज़ता है वह शिक्षा का योग्य उम्मीदवार हरगिज़ नहीं है। बड़े घरों में कभी कभी गीता भागवत आदि ग्रंथों का नित्य पाठ करने के लिए ब्राह्मण या शास्त्री महाराज को बुलाया जाता है।

एक धनिक के यहाँ इसी तरह एक शास्त्री महाराज जाते हैं और भागवत सुनाते हैं। शास्त्री महाराज बी.ए. पास हैं, फिर भी वे ज़मीन पर एक आसन पर बैठते हैं और सेठानीजी ऊंचे झूले में झूलती हुई भागवत सुनती हैं। प्रतिदिन ऐसा होता है। सेठानीजी की समज में नहीं आता कि भागवत सुनने से पहले अच्छी तरह बैठने का शिष्टाचार सीखें। एक बार जब शास्त्रीजी के मित्र सेठानीजी के बंगले पर गए तो यह विचित्र दृश्य देखकर वे दंग रह गए। वे स्वमानी थे इसलिए उन्होंने शास्त्रीजी से पूछा शुकदेव ने क्या इसी प्रकार भागवत सुनाया था? परीक्षित उच्च आसन पर बैठे थे या शुकदेव? परीक्षित तो सम्राट थे फिर भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए दोनों हाथ जोड़कर नम्रता से शुकदेवजी के सामने बैठे थे। तो यह तो सेठानी है। यह परीक्षित के समान या उससे महान थोड़े ही है। वह झूले में झूलती है और आप निचे बैठकर कथा सुनते हैं। क्या यह शिष्टाचार है? अगर आपकी जगह मैं होता तो एक दिन भी कथा न कह सकता।

प्रत्युत्तर में शास्त्रीजी ने कहा, “क्या करूं? मैं सब कुछ जानते हुए भी पैसे की खातिर एकाध घंटा भागवत सुना देता हूँ।” देखा आपने ! पैसों के सामने ज्ञान मजबूर हो गया और पराजित हो गया। धन की अपेक्षा ज्ञान को अधिक महत्वपूर्ण मानिए। जिसके संपर्क में आओ उसे नीति की मर्यादा समजाओ और उसके पालन का आग्रह करो। कुछ धनिकों को अपने धन का गर्व होता हैं तो कुछ लोगों को सत्ता, पदवी, प्रतिष्ठा या अपनी बुद्धिमानी का गर्व होता है। कुछ लोग शास्त्री या संत को मुलाक़ात के लिए घर बुलाते हैं यह उचित नहीं। उन्हें यदि कुछ जानने या दर्शन करने की इच्छा है तो सन्तों के यहाँ जाना चाहिए। और उनके पास जाकर भी उच्चासन पर नहीं बैठना चाहिए। उनके पास नम्रता की मूर्ति बनकर बैठना चाहिए। स्कूल या कालेज में मान पानेवाले विद्यार्थियों को भी यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उनके बर्ताव में धृष्टता नहीं बल्कि नम्रता होनी चाहिए। कालेज में विद्यार्थी अध्यापकों के सामने आन्दोलन करते हैं। अध्यापक जब पढ़ने के लिए वर्ग में प्रविष्ट होते हैं तो वे तालियां बजाते हैं, जमीन पर पैर पटकते हैं तो कभी कभी उन पर कोई चीज़ फैंकते हैं। इस प्रकार उधम मचाते हैं। यह प्रभुता के सिवा कुछ नहीं हैं। विद्यार्थियों को शिष्ट बनने की नितान्त आवश्यकता है। ज्ञान देनेवाले और ज्ञान लेनेवाले दोनों आदर्श होने चाहिए। आज भी हमारे यहाँ ऐसे शिक्षक हैं जो डाँट, फटकार या मारपीट का सहारा लेते हैं। शिक्षा के पवित्र एवं उच्च कार्य के लिए वे अयोग्य हैं। अपनी ग़लत पद्धति को त्यागकर उन्हें प्रेम का सहारा लेना चाहिए। उसे अपने शिष्यों को समजाना चाहिए। पुराने समय में गुरुओं के पास जंगल के जानवर भी शांत होकर बैठे रहते थे। आज उनके पास शिष्य या विद्यार्थी भय की भावना का अनुभव करते हैं और गुरु अशांति की मूर्ति बनकर उनके साथ जानवरों का सा बर्ताव करते हैं। इस चीज़ की समाप्ति होनी चाहिए।

जो परमात्मा के दर्शन करके परमात्मामय हो गये है ऐसे ज्ञानी से ज्ञान हासिल करने से अनेक लाभ होते हैं और उस ज्ञान का आचरण करने से स्वरुप का एवं परमात्मा का दर्शन होता है और यह जीवन अमृतमय हो जाता है। शांति दूर होती है और परमानंद की प्राप्त होती है। ज्ञानियों की मान्यता है कि लोगो को भय, दुःख, शोक एवं चिंता का अनुभव इसलिए होता है कि उन्हें अपने स्वरुप का ज्ञान नहीं होता। स्वरुप के या परमात्मा के दर्शन होने पर पता चलेगा कि यह सारा जगत परमात्मामय है। विविध रूपों में परमात्मा ही व्याप्त है। यह बात अगर दिल में बैठ जाय तो जीवन में से भय, काम, क्रोध सब टल जाय। क्योंकि जब सब जगह परमात्मा ही दिखाई देने लगा तो किस पर गुस्सा करे, किस के लिए कामी बनें, किससे डरे? ऐसा व्यक्ति तो हर जगह ईश्वर के ही दर्शन करेगा, शांति व आनंद प्राप्त करके बन्धनों से मुक्त हो जायगा। परमात्मा का अनुभवसिद्ध ज्ञान हासिल करने पर उसे मोह या शोक नहीं होगा और ज्ञानामृत का पान करके वह अमर बन जायगा। फिर मृत्यु के पाश में फंसने का डर कैसा? भारत के संत महात्मा कहते हैं कि शांति और अमृतत्त्व प्राप्त करने का यही एक मात्र रास्ता है, दूसरा नहीं। मनुष्य को बाहर के सभी पदार्थों से मन को खींचकर भीतर के देवता की आराधना करनी चाहिए और उसी की आसक्ति में डूब जाना चाहिए। सभी महान संतों एवं भगवान श्री कृष्ण की भी यही शिक्षा है।

ज्ञान की महिमा इस भांति निराली है। ज्ञान जैसी पवित्र चीज़ कोई नहीं है। वह मनुष्य की सभी समस्याओं को हल करता है और उसे शांति प्रदान करता है। ज्ञान की बराबरी कौन कर सकता है? संसार का समस्त ऐश्वर्य भी उसकी समानता नहीं कर सकता। वह ज्ञान मनुष्य को अपने भीतर से ही प्राप्त होता है किंतु उसके लिए साधना करनी पड़ती है। अटूट श्रद्धा की आवश्यकता है, जितेन्द्रिय बनने की और लगन की आवश्यकता है। परमात्मा के दर्शन के लिए भी इन गुणों की आवश्यकता है। ऐसा आत्मज्ञानी कर्म करता रहेगा पर निर्लेप रहेगा। उसके कर्म उसे बांध न सकेंगे क्योंकि वह अहंता और ममता से मुक्त होगा और समस्त कर्म तथा कर्मफल को ईश्वर के चरणों में समर्पित करेगा। तभी तो भगवान कहते हैं, “हे अर्जुन तेरा मोह अज्ञानजन्य है। उसे ज्ञान कि तलवार से काट डाल और सब शंकाओं को छोड़कर लड़ने के लिए तैयार हो जा।” अभी तक अर्जुन धनुष बाण से लड़ने की कला जानता था। अब भगवान ने ज्ञान के नये शस्त्र की दीक्षा दी और उसी शस्त्र का प्रयोग करने की आज्ञा दी। हमें भी जीवन में से जड़ता, शोक, मोह, अविवेक और अल्पता को दूर करने तथा परमात्मा के अधिक से अधिक निकट पहुँचने के लिए आत्मज्ञान का सहारा लेना चाहिए। जीवन में से दुःख और विसंवाद को दूर करने के लिए एकमात्र उपाय यही है।

रामायण में लक्ष्मण मूर्छा का प्रसंग आता है। मेघनाद के बाण से मूर्छित होकर लक्ष्मणजी पड़े हैं और राम चिंतातुर हैं। उन्हें अच्छा करने के लिए क्या करना चाहिए? विलाप करना छोड़कर वे हनुमानजी को आज्ञा देते हैं। हनुमानजी लंका के सुषेण वैद को उनके घर के साथ उड़ाकर ले आते हैं। उनके कथनानुसार हनुमानजी संजीवनी बूटी लेने हिमालय जाते हैं। उस बूटी को न पहचान सकने के कारण सारे पर्वत को उड़ाकर ले आते हैं। औषधि का सेवन करने से सुबह होने से पहले ही लक्ष्मण अच्छे हो जाते हैं। यह कथा कितनी सुन्दर हैं। इस में मानव के लिए एक महान सन्देश छिपा हुआ है। सन्देश यह हैं कि जिसे नवजीवन प्राप्त करना है और अमृतमय होना है उसे ज्ञान की संजीवनी बूटी का आश्रय लेना चाहिए और उस परमात्मा का प्रेम हासिल करना चाहिए जिसने सबको जीवन दिया है। जीवन के संग्राम में निर्लेप होकर विजय प्राप्त करने का यह रामबाण साधन है।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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