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संन्यास और कर्मयोग दोनों कल्याणकारी हैं

ईश्वरकृपा से हम गीता के चिरंतन एवं स्वर्गीय संगीत का आस्वाद लेते हुए आज पांचवे अध्याय तक आ पहुंचे है। देवनदी गंगा के पावन जल में स्नान करने का आनंद सब के भाग्य में नहीं, पर गीता की ज्ञानगंगा का स्नान सब के लिए खुला है। उसका लाभ उठाने पर अन्य किसी तीर्थ में स्नान करने की आवश्यकता नहीं रहती। गीता के सर्वोत्तम तीर्थ की यात्रा कीजिए, सब तीर्थयात्रा का पूरा फल मिल जायगा। गीता के श्रवण, मनन एवं आचरण का यज्ञ कीजिए, सब यज्ञो का आनंद मिल जायगा। गीता भगवान की वाणी है, भगवान की हृदयवीणा से निकली हुई सुरावली है। उसकी महिमा मन्त्र से भी अधिक है। उसके आस्वादन से सुख, शांति एवं समृद्धि प्राप्त होती है और हमारा उद्धार हो जाता है। गीता में इतनी प्रबल शक्ति कहाँ से आई? इसके उत्तर के लिए भगवान श्री कृष्ण एवं महर्षि व्यास के जीवन पर दृष्टि डालिए। भगवान की तो बात ही क्या ! उनकी वाणी को शब्दों की मालामें गूंथने वाले महर्षि व्यास महान तपस्वी थे। वे भगवान के कृपापात्र थे। गीता की भाषा जीवन के महान योगी और तपस्वी की भाषा है। इसीलिए वह इतनी प्रेरणादायक एवं तारक बन सकी है। केवल विद्वत्ता या बौद्धिक प्रतिभा से सम्पन्न व्यक्ति ऐसी अलौकिक बाणी को शायद ही अभिव्यंजित कर सके।

ऐसी विलक्षण वाणी का आस्वाद करने का सौभाग्य सब को कहाँ प्राप्त हो सकता है? संसार में प्रायः सभी आदमियों को सांसारिक पदार्थों में रुचि होती है। ईश्वर के चरणों में उन्हें प्रेम नहीं होता और अध्यात्म सम्बन्धी बातों में उन्हें दिलचस्पी नहीं होती, वे तो मानो अज्ञान की रात में सोते रहते हैं। ऐसे विवेकी विरले ही होते हैं जिन्हें ईश्वर की बातों में रस आता है और जो आत्मोन्नति की ओर अग्रसर होना चाहते हैं।

कहते हैं सौ अश्वमेघ यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। यह बात सच हो या ग़लत, पर इतना तो निर्विवाद है कि गीता के सारांश को समज़ने और उस पर आचरण करने का प्रयत्न करने से चिंता, उल्जन एवं अज्ञान से मुक्ति मिल सकती है तथा स्वर्ग से भी अधिक सुख की प्राप्ति हो सकती है। गीता की इस असीम शक्ति को समज़कर गीताकी शरण लेने की आवश्यकता हैं। इसके लिए परमात्मा का आशीर्वाद चाहिए, इसलिए उसकी याचना करके हम आगे बढ़ते हैं। कुम्भ मैले में प्रयागराज जाना चाहे असंभव हो, किंतु कुरुक्षेत्र के तीर्थधाम में जो मानव मेला लगा हैं उस में तो सभी शरीक हो सकते हैं।

चौथा अध्याय पूरा तो हुआ परन्तु उसके अंत में अर्जुन की उलज़न पहले से भी बढ़ गई। तीसरे अध्याय के प्रारंभ में अर्जुन को जिज्ञासा थी कि ज्ञान महान है या कर्म और कर्मयोग बड़ा है या कर्म संन्यास। भगवान ने उसे समजाने का प्रयत्न किया और बताया कि दोनों महान हैं और दोनों परस्पर सम्बद्ध हैं। कर्म के त्याग का गुणगान किया और साथ ही कर्मयोग को भी सराहा। इससे अर्जुन के मन का समाधान नहीं हुआ। उसकी शंका जारी रही। पांचवे अध्याय के आरम्भ में इसी शंका की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है। अर्जुन भगवान से कहता है, “हे प्रभु, आप घड़ी में कर्म की प्रशंसा करते हैं तो घड़ी में त्याग की। इससे मेरा मन उल्ज़न में पड़ता है। दोनों में जो अधिक कल्याणकारी या श्रेयस्कर हो उसका उपदेश मुझे दीजिए।”

अर्जुन की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान ने फ़िर उपदेश देना शुरू किया। उन्होंने कहा, “हे अर्जुन, संन्यास एवं कर्मयोग दोनों कल्याणकारी हैं। इन दोनों में किसी एक से ही श्रेय की सिद्धि हो सकती है और दूसरे की कोई क़ीमत नहीं, यह मानना त्रुटिपूर्ण है। इन दोनों में जीवन को उज्जवल बनाने की शक्ति है। भगवान के वचनों के साथ हम भी सम्मत है। यदि कोई पूछे कि भूखे के लिए कौन सी चीज़ हितकर है खिचड़ी या रोटी, तो हम उत्तर देंगे कि उसके लिए दोनों चीज़ें हितकर होंगी। कल्याणकारी की व्याख्या क्या है? जो उसकी भूख मिटाए, उसे शांति और शक्ति दे और उसका आरोग्य बढ़ाए, वह खूराक उसके लिए कल्याणकारी है। इसलिए आप के पास जो कुछ है, दीजिए। भूखे आदमियों को रोटी और खिचड़ी दीजिए। अपनी अपनी रुचि के अनुसार वे चुन लेंगे। यदि कोई दाता निर्धन मनुष्य को देखकर पूछे कि तुजे दानमें रूपये दूं या नोट, तो हम कहेंगे दोनों ही ढंग से उसकी गरीबी दूर होगी। अत: दोनों प्रकार का दान अच्छा एवं कल्याणकारी है। मान लीजिए एक प्यासा आदमी ताप से तप्त है। वह यदि किसी घर में जाकर पानी मांगे और कोई माता बाहर आकर पूछे कि कुंए का पानी दूं या नल का? तो आप ही सोचिये प्यासा आदमी क्या उत्तर देगा। वह तो वही कहेगा, “माताजी मैं बहुत प्यासा हूँ। मुझे तो पानी चाहिए, चाहे कुंए का हो या नल का। मेरे लिए पानी मात्र कल्याणकारी है। अतः बिना विलम्ब के मुझे पानी दीजिए।” इसी प्रकार जिसे जीवन में अपनी या अन्य की सेवा की भूख लगी है और जिसे शांति व मुक्ति की प्यास लगी है, उसके लिए कौनसी चीज़ गुणकारी है –संन्यास या कर्मयोग? ऐसा पूछना व्यर्थ है। क्योंकि संन्यास एवं कर्मयोग दोनों लाभदायक है। दोनों मार्ग जीवन का उत्थान कर सकते हैं। मनुष्य अपनी मरज़ी के अनुसार किसी एक का या दोनों का आश्रय ले सकता है। दोनों में मनुष्य की भौतिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक गरीबी को दूर करने का सामर्थ्य है। दोनों जीवन को महान, मंगलमय, मुक्त, शक्तिशाली एवं शांतिमय बना सकते हैं। इसलिए दोनों आशीर्वाद के समान हैं। मेरी दृष्टि में परमात्मा का साक्षात्कार एवं जीवन की मुक्ति या मंगल ही जीवन का मूल ध्येय है। उस लक्ष्य की स्मृति एवं उसे प्राप्त करने का पुरुषार्थ में ही परम लाभ है और उसकी विस्मृति अनिष्ट है।

उत्तर प्रदेश की यात्रा पर निकलनेवाले यात्री का प्रधान कार्य बद्रीनाथ का दर्शन करना है। कोई यात्री पहले केदारनाथ जाता है तो कोई सीधा बद्रीनाथ। इसी प्रकार कुछ लोग गयाजी में श्राद्ध करने के इरादे से घर से निकलते हैं। किंतु क्या वह सीधे गया जाते हैं? हां, कुछ लोग जाते भी हैं और श्राद्ध कार्य पूरा करके घर लौट आते हैं तो दूसरे कुछ लोग सोचते हैं कि भाई घर तो कारावास है, इसमें से बाहर निकलने का सुअवसर बार बार नहीं मिलता। इसलिए जब निकले ही हैं तो वापिस जाने की क्या जल्दी है? गयाजी के साथ काशी, अयोध्या, प्रयाग एवं पुरी आदि तीर्थों की यात्रा भी कर लें तो कितना अच्छा हो ! जिसे जिस स्थान में जिस काम के लिए जाने की इच्छा हो उस स्थान पर पहुँचकर अपना काम कर ले वही उसके लिए हितकर हैं। इसी प्रकार हम भी अपने मूल घर से जीवन की इस महायात्रा के पथिक बनकर निकले हैं और हमें अपने प्रियतम के पास वापिस पहुँचना हैं और शांत, मुक्त एवं पूर्ण बनना हैं। यह काम हम प्रवृत्त होकर करें या निवृत्त होकर, मानव समूह के भीतर रहकर करें या निर्जन एकांत स्थल में बैठकर करें, संसारी बनकर करें या संन्यासी होकर, हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। सब मनुष्यों की रुचि या पसंद समान नहीं होती। अतः सब एक ही मार्ग का अवलम्बन करेंगे यह मान्यता त्रुटिपूर्ण है।

हमें साधना या मार्ग के बारे में उदार एवं विशाल बनना चाहिए। आपको जो मार्ग पसंद है, उसीका अनुसरण सब को करना चाहिए तथा अन्य सभी मार्ग निकम्मे हैं, ऐसा दुराग्रह फ़िजूल है। घर में चार भाई होते हैं तो चारों की खानेपीने की एवं वेष परिधान की रुचि अलग अलग होती है। बुजुर्ग उनकी रुचि के अनुसार चीज़ें देते हैं। इसी प्रकार इस विशाल संसार में बसने वाले विराट मानवसमाज की भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार भिन्न भिन्न साधन भी मिलना चाहिए। वे साधन शुद्ध एवं सच्चे हों इतना ख्याल हमें अवश्य रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त साधनों की उपयोगिता एवं प्रभावोत्पदकता की ओर भी ध्यान देना चाहिए। किंतु दूसरों की साधनाए हमारी इच्छा या रुचि के अनुकूल ही हों एसा आग्रह क्यों रखना चाहिए? क्या यह उचित भी है? आध्यात्मिक एवं धार्मिक जगत में यह सिद्धांत आदरणीय नहीं। उसमें कट्टरता और संकुचितता है। वह साधना को चुनने की स्वतन्त्रता पर आघात पहुंचाता है, बल्कि यौं कहिए कि उसका खून करता है। यह हमें पसंद नहीं। हम तो यही कहते हैं कि परमात्मा की प्राप्ति या मनुष्य की मुक्ति करानेवाले सभी मार्ग अच्छे हैं, मंगल स्वरुप एवं आशीर्वाद के समान हैं। सभी धर्म, सम्प्रदाय एवं साधना के प्रकार उपयोगी हैं। संन्यास एवं कर्मयोग दोनों कल्याणकारी हैं क्योंकि इन दोनों का सहारा लेकर मनुष्य मुक्त और पूर्ण बन सकता है। अतः कौन सा मार्ग अच्छा है इस प्रश्न का अवकाश ही नहीं है। हम तो मानते हैं कि साधना के अनेकों मार्ग भले ही हों, इसमें कोई हर्ज़ नहीं। अगर वह मानव को ऊपर उठाते हैं तो हम उनका सप्रेम सत्कार करेंगे। भगवान ने अर्जुन को जो उपदेश दिया उसकी ध्वनि यही है। इसलिए दिल को सागर सा विशाल एवं उदार रखिए। जिस प्रकार सागर में अनेक सरितांए आकर समाविष्ट हो जाती हैं, उसी प्रकार विविध पंथ, सम्प्रदाय, साधना मार्ग आदि को अपने हृदय में आदरणीय स्थान दीजिए। याद रखिए कि कट्टरता एवं संकुचितता अज्ञान की उपज है और निर्बलता की निशानी है। अपने हृदयमंदिर के द्वारों को बंद मत रखिए। सब किवाड़ो को खोल दीजिए तभी उस में बाहर का प्राणवायु एवं प्रकाश प्रवेश कर सकेगा।

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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