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संन्यास की उपेक्षा व्यर्थ है

कुछ लोग कर्म या व्यवहार का पक्षपात करते हैं और संन्यास एवं संन्यासी की निंदा या टिका करते हैं। इसके बारे में मैंने पहले भी संकेत किया है। कुछ लोगों का ख़याल है कि संन्यासी समाज के उपर बोज़ हैं और समाज की प्रगति में बाधक हैं। मैदानी प्रदेशों ही में नहीं – पर्वतीय स्थानों में भी ऐसे विचार वाले कई लोग होते हैं। देवप्रयाग में साधुओं के लिए अन्नक्षेत्र नहीं है। वे लोग बस्ती में जाकर भिक्षा मांगते हैं और उन्हें मिल भी जाती है। किंतु उस बस्ती में विचित्र विचारवाले कुछ लोग भी रहते हैं। मुझे तो क्या मालूम? मैं तो गाँव से दूर एक कुटिया में रहता हूँ, और गाँव में शायद ही जाता हूँ। किन्तु मेरी कुटिया में दो तीन अच्छे सन्त पुरुष आए थे। उन्होंने अपने निजी अनुभव की बात मुझसे कही। उन्होंने कहा था कि गाँव में जब भिक्षा मांगने गए तो एक दो घर से जवाब मिला कि महाराज, आप तो सशक्त हैं। हमारी तरह धंधा करने पर भिक्षा मांगने की ज़रूरत रह जायगी क्या? यदि आपसे कुछ न बन पड़े तो पलटन में भरती हो जाइए।

इसी का नाम है अज्ञान। साधु संन्यासी भिक्षा मांगने आये, इसका यह मतलब नहीं है कि वे जबरदस्ती करते हैं। आपके द्वार पर आकर परमात्मा का नाम लेकर वे खड़े रहते हैं। उनकी जोली में कुछ डालना या न डालना या उन्हें कुछ देना यह आपकी इच्छा पर निर्भर है। भिक्षा देना अनिवार्य नहीं है। वह कोई सरकारी टैक्स नहीं है, जिसे भरना ही पड़ता है। सरकार प्रजा की रक्षा करती है तथा प्रजा के सुख के लिए काम करती है। बदले में प्रजा भी उसे देना उचित समज़ती है। इसी प्रकार साधु संन्यासी भी समाज की सुखाकारी के लिए सहायक एवं संस्कृति की रक्षा करनेवाले हैं। हम अगर उन्हें रोटी देते हैं तो बदले में वे हमे एवं समाज के अन्य सभ्यों को बहुत कुछ देते हैं। इसलिए उन्हें भिक्षा देने में कोई हर्ज नहीं है। ऐसा समजकर आप अगर भिक्षा देना चाहें तो दें, नहीं तो कोई बात नहीं है। यहीं आपका काम हैं, किन्तु आप जब कोई व्यवसाय करने की या पलटन में भरती हो जाने की शिक्षा देते हैं तो यह नितान्त अनुचित है, निरा अज्ञान इसमें छिपा है। संन्यास भी उपयोगी है और कुछ लोगों को अपनी रुचि तथा परिस्थिति के अनुसार उसका सहारा लेने की ज़रूरत होती है। ऐसे लोगों के लिए संन्यास आशीर्वाद के समान है, अभीशाप नहीं। इस बात को समज़ लेने की ज़रूरत है। यह बात समज़ लेने से संन्यासियों के प्रति तिरस्कार की भावना दूर हो जायगी और उन्हें समाज का उपयोगी अंग माना जा सकेगा। तभी गीता के इस उपदेश का मर्म समज में आ सकेगा कि संन्यास भी जीवन के लिए कल्याणकारी है।

कर्मयोग भी आवश्यक है

संन्यासीयों के लिए भी यह जरूरी है कि कर्मयोग को धृणा की दृष्टि से नहीं बल्कि प्रेम की दृष्टि से देखें। कुछ संन्यासियों में भी ग़लतफहमी होती है कि सांसारिक काम छोड़कर संन्यासी बनने से ही मनुष्य सुखी हो सकता है, किंतु यह मान्यता ग़लत है। संसार में सब आदमी अपनी अपनी रुचि के अनुसार कार्य करें तभी कल्याण हो सकता है, संन्यास तो गिनेचुने योग्य आदमियों के लिए ही हैं। अगर सब आदमी संन्यास ही का आश्रय लें तो उनको तो नुक्सान होगा ही, साथ ही समाज को भी हानि होगी, इसमें संदेह नहीं। अतः संन्यासियों को ऐसा दुराग्रह नहीं करना चाहिए कि सब लोग उन्हीं के समान बन जाय। सबको एक ही तराजू में तोलने कि बुरी आदत का त्याग करना चाहिए तथा सब के अलग अलग महत्व को समज़ना चाहिए। जो सांसारिक प्रवृति में व्यस्त रहते हैं उनका मूल्य कम आंकने की आवश्यकता नहीं। सोचिए तो, त्याग एवं संन्यास की सारी संस्था किस पर आधारित हैं? कौन इसको बढ़ावा देता है और परिपोषित करता है? व्यवहार में रहनेवाले गृहस्थाश्रमी ही भिक्षादि देकर इन संस्थाओं को चलाते हैं। यह बात बिलकुल सच है। तब फ़िर उसका अनादर करने में कहां की बुद्धिमानी है? गृहस्थों को शुद्ध एवं शक्तिशाली बनाने की कोशिष तो अवश्य करनी चाहिए किन्तु उन्हें निकम्मा मानकर उनका मज़ाक उड़ाना हरगिज ठीक नहीं। ऐसा करना अज्ञान एवं कट्टरता का सूचक है। गीता इससे बचने का उपदेश देती है, पर अफ़सोस की बात है, कि कुछ संन्यासी उसकी शिक्षा पर आचरण नहीं करते।

एक बार एक संन्यासी महाराज मुझसे मिलने आए। वे गुजरात के किसी आश्रम में रहते थे और बदरीकेदार की यात्रा को निकले थे। उनके साथ मेरी बातचीत हुई। उन्होंने पूछा आप यहाँ कब से रहते हैं? मैंने उत्तर दिया चार सालसे। उन्होंने कहा, “अच्छी बात है। स्थान भी तो अच्छा है, किन्तु आप ब्रह्म तो नहीं हुए हैं न?” मैंने पुछा, “मतलब? ब्रह्म होने के मानी क्या हैं?” वे बोले “मेरी तरह गेरूआ पहनिए जिससे सीधे ब्रह्म बन सकेंगे। मुझे गुरु ने गेरूआ वस्त्र पहनाया और दीक्षा दी तब से मैं ब्रह्म हो गया और मैं बड़ी प्रसन्नता से यत्र तत्र घूमा करता हूँ।”
मैंने जवाब दिया, “अगर ऐसा है तो ब्रह्म होने का कार्य बहुत आसान है। गेरू तो हर जगह मिलता है। ब्रह्म की प्राप्ति के लिए ऋषिमुनियों को कठिन तपस्या करनी पड़ी थी। अतः ब्रह्म होने का कार्य उतना आसान नहीं है जितनी आसानी से हम उसके बारे में चर्चा करते हैं। बिना साधना एवं परिश्रम के ब्रह्मय होना असम्भव है।”
उन्होंने फ़िर कहा, “किन्तु गेरुआ वस्त्र पहनकर देखिए तो सही कि ब्रह्ममय होते हैं या नहीं?”
मैंने जवाब दिया, “मुझे गेरूआ वस्त्र की आवश्यकता नहीं। मुझे उसका मोह नहीं और सब को यह पहनना ही चाहिए, ऐसा भी मैं नहीं मानता। गेरूआ तो एक निशानी है। उसका रंग अग्नि के समान है। जैसे आग अपने में होम की गई वस्तुओं को जला डालती है, उसी तरह गेरूआ वस्त्र पहनने वाले व्यक्ति ने अपनी वासनाओं, अहंता एवं ममता को ज्ञान की अग्नि में जला डाला है। इस बात की ओर ध्यान दिलाने और दूसरों को उसकी प्रतीति कराने के लिए गेरूआ वस्त्र पहना जाता है। किन्तु ऐसा दुराग्रह व्यर्थ है कि सब को उसका ही आश्रय लेना चाहिए। जो ब्रह्ममय हो जाता है वह तो सबके प्रति समता एवं सहानुभूति रखता है, सब में परमात्मा के दर्शन करता है एवं नम्रता की मूर्ति बनता है, आप में तो यह सब गुण नहीं दिखाई देते। आप तो कट्टर हैं। अतः आप ब्रह्म में नहीं बल्कि भ्रम में हैं। अभी जीवन शेष है, सावधान हो जाइए और गेरूआ पहनाकर दूसरों को ब्रह्ममय बनाने का प्रयास छोड़ दीजिए। तभी ब्रह्ममय बन सकेंगे आप। परंतु वर्तमान स्थिति देखने से तो ऐसी आशा कम ही नज़र आती हैं।

किंतु सवाल पैदा होता है कि सैंकड़ो बरसों से संचित विचार एवं संस्कार एक आघ बात सुनने से बदले जा सकते हैं? क्यों नहीं, जरूर हो सकते हैं। वाल्मीकि का उदाहरण ही ले लीजिए। कमरे में बहुत दिनों का जमा हुआ अन्धेरा दीपक के प्रकाश से तुरन्त दूर हो जाता है। इसी तरह पुराने संस्कार भी थोड़ी देर में बदले जा सकते हैं। किंतु यह तभी होता है जब आदमी के दिल में उन्हें बदलने की इच्छा हो और बदलाने वाला व्यक्ति तथा वातावरण भी प्रबल एवं प्रभावशाली ही। वे संन्यासी किसी भी प्रकार अपनी त्रुटि देख ही नहीं सकते थे। अतः उनके सुधार की क्या आशा की जा सकती थी?

तात्पर्य यह है कि कुछ सन्यासियों में ऐसी कट्टरता एवं अज्ञान पाया जाता है। अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में यदि भगवान ने इतना ही कहा होता कि संन्यास एवं कर्मयोग दोनों कल्याणकारी हैं, तो प्रश्न का उत्तर पूरा न होता और न अर्जुन की शंका का समाधान होता। किंतु भगवान ऐसा कैसे कर सकते थे? वे तो महाज्ञानी थे। उन्होंने व्यर्थ ही बहस का अंत कर दिया हैं और प्रधान एवं सार तत्व पर प्रकाश डाला है। अनुमान तो कीजिए अस्सी वर्ष की उम्र में भी कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन का रथ चलानेवाले कृष्ण कितने बड़े कर्मयोगी होंगे? जब शाम होती है और लड़ाई रात भर के लिए बंद हो जाती है तब वे घोड़ों को दाना पानी देते हैं और उनकी मलाई दलाई में लग जाते हैं। परंतु उनमें कट्टरता न थी और कर्मठ होते हुए भी उन्होंने संन्यास की बुराई नहीं की। उन्होंने यही कहा कि कर्मयोग और संन्यास दोनों ही हितकर है। हमें भी उनका अनुकरण करके कट्टरता से दूर रहना चाहिए और विशाल हृदय बनना चाहिए !

- © श्री योगेश्वर (गीता का संगीत)

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