दयानंद, तिलक, लजपतराय, रामतीर्थ, विवेकानंद, अरविंद – ये थे वे चमत्कारी पुरुष जिन्होंने उन्नीसवीं शताब्दि में प्रकट होकर अपनी अनन्य तेजस्वीता, विलक्षण बुद्धि और अपराजेय संकल्प के बल पर देश की कायापलट कर दी थी । इनमें स्वामी रामतीर्थ का जीवन अत्यंत विलक्षण तथा प्रेरणादायक था । बुद्धि की तीक्ष्णता में वे शंकराचार्य के समान थे, हृदय की करुणा व सुकुमारता में ईसा मसीह के समान, तथा विरक्ति में शुकदेव, दत्तात्रेय या अष्टावक्र के समान थे । पिछले सौ सालों के आध्यात्मिक या सांस्कृतिक इतिहास में जिनका नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है वे दोनों – विवेकानंद एवं रामतीर्थ – दोनों असाधारण, विशिष्ट प्रतिभायुक्त विभूति थे ।
एक बार वे दोनों लाहोर में मिल गये ।
उस वक्त स्वामी विवेकानंद अमरिका व इंग्लेंड में भारतीय धर्म व दर्शन का विजयध्वज फहराकर भारत लौटे थे । लोग उनका आदर करते थे, संस्थाएँ उनका स्वागत करती थी । लाहौर में भी उनका प्रवचन आयोजित किया गया था । उस वेदांतकेसरी की अमृतवाणी सुनने के लिए लोगों की भीड लग गई थी । स्वामी रामतीर्थ भी वहाँ थे । वे उस वक्त स्वामी रामतीर्थ न थे पर तीर्थराम थे । लाहौर कोलेज के गणित के प्रमुख प्राध्यापक होने पर भी समय-समय पर हरिद्वार, ऋषिकेश जाया करते थे । आध्यात्मिक प्रवृत्तियों में उन्हें रुचि थी । वे आत्मिक साधना किया करते थे ।
विवेकानंद की वाणी सुनकर वे बडे प्रसन्न हुए । हीरे की परीक्षा जौहरी ही जानता है न ? वे भी हीरे ही थे । विवेकानंद ने भी उनकी आत्मा को पहचान लिया । ‘उच्चोच्च आत्मा’ उन्होंने कहा ।
रामतीर्थ ने विवेकानंदजी को घडी भेंट में दी । विवेकानंद ने इन्कार किया । उनको येनकेन प्रकारेण समजाने की चेष्टा की । कहा, ‘हम दोनों में क्या अंतर है ? तुम्हारे पास घडी है वह मेरे पास ही है न ? मैं रखूँ इससे तो आप ही रक्खें तो अच्छा है ।’
तीर्थराम मान गये । विवेकानंद के त्याग, ज्ञान व निर्मल चरित्र की उन पर गहरी छाप पडी । देश के लिए कुछ भी कर देने की और इससे पहले एकांतवास में रहने की भावना उत्त्पन्न हो गई ।
इसी भावना से तीर्थराम ने प्राध्यापकी छोड दी । तीर्थराम से वे रामतीर्थ बने । हिमालय की वशिष्ठ गुहा में एवं टिहरी के जंगलो में रहकर कठिन तपश्चर्या की और शांति की प्राप्ति की । अद्वैत वेदांत की व्यावहारिक व्याख्या करके भारतीय संस्कृति का अपने देश में ही नहीं, भारत के बाहर के देशों में भी प्रचार व प्रसार किया ।
अमरिका तो उनके पीछे पागल-सा हो गया । भगवा वस्त्रधारी उन स्वामी रामतीर्थ को सुनने विशाल जनसमूह इकट्ठा हो जाता था । उनके असाधारण व अदभुत व्यक्तित्व से प्रभावित होकर लोग इसा मसिह से उनकी तुलना करने लगे । वाह री किस्मत, रामतीर्थ की प्रसिद्धि सर्वत्र हुई ।
अमरिका के उस वक्त के प्रमुख रुझवेल्ट थे । जब उन्होंने उनकी ख्याति सुनी, उनसे मुलाकात की इच्छा जताई और मिलने का प्रबंध किया । मुलाकात से रुझवेल्ट बडे खुश हुए । उनकी शंकाओं का समाधान हो गया । भारत में भी ऐसे महापुरुष बसते है यह जानकर भारत की ओर उनका आदर बढ गया ।
‘मैं आपकी क्या खिदमत करुँ ?’ उन्होंने पूछा, ‘आप चाहे सो सेवा करने मैं तैयार हूँ ।’
कोई मामूली आदमी होता तो अमरिका में एकाध आश्रम निर्मीत कर देता अथवा तो संपत्ति की माँग करता । परंतु रामतीर्थ ऐसी कच्ची मिट्टी के न थे । देश के लोगों के दुःख दूर करने की भावना उनके दिल में फूट-फूटकर भरी थी । देशप्रेम से प्रेरित होकर ही तो वे विदेश गये थे ।
उन्होंने तुरंत उत्तर दिया, ‘अगर आपके दिल में सेवा करने की सच्ची भावना है तो भारत जैसे गरीब देश के विद्यार्थी यहाँ मुफ्त पढ सके इस हेतु से स्कोलरशीप का प्रबंध किजीये ।’
प्रमुख रुझवेल्ट ने वह व्यवस्था कर दी । रामतीर्थ व भारत के लिए उनकी जो सम्मान-भावना थी उसमें वृद्धि हुई । रामतीर्थ को वे अत्यंत आदर से देखने लगे ।
इतिहास जानता है कि भारत के स्वातंत्र्य आंदोलन के लिए रुझवेल्ट ने भी अपना योगदान दिया था । भारत के प्रति उनके विशेष लगाव के लिए स्वामी रामतीर्थ से उनकी मुलाकात भी कारणभूत थी ।
- श्री योगेश्वरजी

