स्वामी रामतीर्थ अद्वैत वेदांत की जीती-जागती प्रतिमूर्ति थे । वेदांत के सारस्वरूप अभेदभाव के नशे में वे हमेशा मस्त रहते थे । जगत के छोटे-बडे नाना पदार्थों में परमात्मा का दर्शन करते थे । इसके अतिरिक्त समस्त जगत को परमात्मा के प्रत्यक्ष प्रतीक के रूप में निहारते । एकत्वदर्शन उनका सहज स्वभाव बन गया था ।
वे अपने आप को आत्मिक जगत के बेताज बादशाह मानते थे और अपने नाम का परिचय रामबादशाह के नाम से देते थे । हाँ, वैसे तो बादशाह को चिंता, विषाद, भय, रागद्वेष, भेदभाव, अशांति आदि होता है, किंतु राम-बादशाह तो इन सब भावनाओं से परे थे ।
उनका दर्शन व सत्संग करनेवालों को शांति व सुख की प्राप्ति होती थी । एकाध बार उनके समागम में आनेवाले को भी उनके जादूभरे व्यक्तित्व की चिरस्थायी और असाधारण छाप पडती, इसमें संदेह नहीं ।
उनका वेदांत केवल उनके विचारों व वाणी तक ही सिमीत न था अपितु उनके अणु अणु में ओतप्रोत हो व्यवहार के प्रत्येक पहलू में मूर्तिमंत हुआ था । इसीलिए उनके व्यक्तित्व में एक प्रकार की विद्युत शक्ति थी जिसका प्रभाव संबंधित सब पर न्यूनाधिक रूप में होता ही था ।
उनके जीवन में संमिश्रित होनेवाली वेदांती मस्ती की एक घटना जानने योग्य है । इससे उनके असाधारण व्यक्तित्व की झाँकी अवश्य मिलेगी ।
स्वामी विवेकानंद की भाँति भारतीय धर्म, दर्शन, व संस्कृति का संदेश परदेश में पहूँचाने और उसके द्वारा भारत के राष्ट्रीय गौरव को बढाने वे कटिबद्ध थे ।
प्रोफेसर तीर्थराम से स्वामी रामतीर्थ बने उन युवान संन्यासी में उत्कृष्ट मेधा थी, उच्च भावना थी । अपने देशवासी और दूसरों के लिये कुछ कर देने की तमन्ना और कर्मयोग की भावना थी ।
जब स्टीमर में बैठ वे भारत से अमरिका पहूँचे तब कोई परिचय-पत्र उनके पास नहीं था । प्रथम कहाँ ठहरना, उसका निर्णय भी उन्होंने नहीं किया था । गीता की भाषा में कहें तो, ‘सर्व भूतस्थमात्मानं सर्व भूतानिचात्मनि’ अर्थात् आत्मा में सब भूत प्राणी जीते हैं, सब में अंतर्निहित आत्मा को देखते और अनुभूत करते हुए वे अमरिका के समुद्रतट पर आ पहुँचे।
अन्य यात्री बारी बारी से स्टीमर से उतरने लगे । उनको लेने बहुत से स्नेही या स्वजन आये थे । स्वामी रामतीर्थ को नीचे उतरने की कोई जल्दी नहीं थी । उनके चेहरे पर किसी प्रकार की अस्वस्थता या व्यग्रता न थी ।
इस बीच अपने मित्रों, साथीयों, स्वजनों का सत्कार करनेवाले आदमीयों में से एक सज्जन स्वामी रामतीर्थ के पास आये । उन्हें एकटक निहारने लगे । अंत में जब उनसे न रहा गया तो बोले, ‘आपके लिबास से लगता है कि आप भारतीय है ।’
रामतीर्थ ने सर हिलाया और कहा, ‘हाँ, मैं भारत से आ रहा हूँ ।’
‘आप यहाँ ठहरेंगे ?’
‘हाँ ।’
‘आपको कोई लेने नहीं आया ?’
‘आया है ।’
‘कौन ? यहाँ तो कोई नहीं दिखता ।’
‘मुझे लेने आनेवाले ये रहे ।’
‘कहाँ ?’
‘क्यों ? आप ही तो आये हैं मुझे लेने ।’
ऐसा कहकर रामतीर्थ ने उस अमरिकन सदगृहस्थ की पीठ पर हाथ रखा । हाथ रखते ही अपने शरीर में जाने कोई दैवी विद्युत शक्ति प्रवेशित हुई हो ऐसा अनुभव उस सदगृहस्थ को होने लगा । उनका अंतर आत्मीयता से भर उठा । उन्होंने भारत के सपूत स्वामी रामतीर्थ को अपने घर पधारने व रहने का निमंत्रण दिया ।
रामतीर्थ उनके मेहमान बने । ज्यों ज्यों परिचय बढता गया, त्यों त्यों स्वामीजी के प्रति उनका अनुराग व आदर भी बढता ही गया । आखिर वे इनके भक्त व शिष्य बन गये ।
अमरिकन प्रजा को अपने अनोखे अलौकिक व्यक्तित्व से प्रभावित करनेवाले स्वामी रामतीर्थ को लोग जिन्दा ईसा मसिह के नाम से पहचानने लगे ।
ऐसा था उन महापुरुष का आत्मभाव । वे हमेंशा, जीवन की प्रत्येक पल, वेदांत में ही जीते थे । शांति भी ऐसे वेदांत से मिलती है - केवल वेदांत की बातों से नहीं, अपितु उसके आचरण से ।
- श्री योगेश्वरजी

