शास्त्र कहते हैं कि परमात्मा की पवित्र प्रखर प्रेमभक्ति का प्रवाह जिसके जीवन में बहने लगता है उसका जीवन सार्थक हो जाता है । परमात्मप्रेम का पवित्र प्रकाश जिसके प्राण में छा जाता है उसका प्राण प्रसन्न व पुलकित हो जाता है । उनके नयनों में सिवाय स्नेह के कुछ नहीं रहेता । वह सब काल व सर्वत्र परमात्मा को देखता रहता है । ‘अखिल ब्रह्मांड में एक तुम श्री हरि’ - यह वचन उनके संबंध में सच साबित होता है ।
श्री रामकृष्ण परमहंसदेव उस शास्त्रकथन के मूर्तिमंत अवतार या स्वरूप जैसे ही थे । उनमें उत्पन्न हुई परमात्मा की पावन प्रेमभक्ति समय बीतने पर चरमसीमा पर पहूँची थी । उसी प्रखर प्रेमभक्ति ने उनमें आमूल परिवर्तन पैदा कर दिया था और उनके अणु-अणु में समाकर उन्हें अलौकिक बना दिया था ।
वे परमात्मा की प्रेमभक्ति में डूबे रहते थे यह कहना तनिक भी अनुचित नहीं । परमात्मा को वे माँ के रूप में भजते और माँ कहके ही पुकारते । जगदंबा के पद गाते, सुनते, सुनाते या याद करते हुए भावविभोर बन जाते और भावसमाधि में डूब जाते । भगवान की भक्ति के प्रभाव से उनका अंतर इतना निर्मल बन गया था कि उसमें कामवासना के अंकुर ही पैदा नहीं होते थे । हमेशा निर्मलता का ही अनुभव करते । अपनी पवित्रता की कसौटी करने वे अपनी पत्नी शारदादेवी के साथ एक ही खाट पर छ महिने तक सोये थे ।
इसका उल्लेख करते हुए शारदादेवी ने बाद में कहा, ‘वे मेरे साथ एक मासूम बालक की तरह शांति से पडे रहते । कभी कभी मैं रात को जागती तो वे मेरे पास ही पलंग पर समाधि में बैठे नजर आते । मुझे किसी प्रकार का भय न लगे इसलिए मुझे उन्होंने समाधि वह अजीब अनुभूति की जानकारी दी थी और कहा था, यह अवस्था देख डरना मत । कभी लंबे समय तक मैं होश में न आउँ तो मेरे कान में प्रणव का या भगवान के किसी भी नाम का उच्चार करना । इससे मैं होश में आ जाऊँगा । उनकी गहरी समाधि की अवस्था में उनके कथनानुसार मुझे कितने ही बार वे प्रयोग करने पडे थे । वे समाधि में से जब जागते तब मुझे संतोष होता । आरंभ में यह सब मुझे अजनबी-सा लगा पर बाद में मैं उनसे अभ्यस्त हो गई और उन्हें साधना में सहायक बनती गई ।’
रामकृष्णदेव की भाँति शारदादेवी को भी इसके लिए धन्यवाद देना चाहिए । वे भी नखशीख निर्मल व वासनारहित थी और इसीलिए अपने पति की साधना में सहायक बन सकी । वे भी उच्च कोटि की साधिका बनी ।
कितना पवित्र, असाधारण, और उदात्त होगा उन दोनों का दांपत्य-संबंध ? जो केवल शरीर को ही स्त्रीपुरुष के विवाहित जीवन का लक्ष्य, प्रयोजन या लायसंस मानते है वे उनके इस अदभूत दिव्य आत्मसंबंध को नहीं समज पाएँगे । लेकिन इससे वह मिथ्या तो नहीं हो जाता, उसका मूल्य कम नहीं होता ।
यही प्रेमभक्ति के परिणाम स्वरूप रामकृष्णदेव सब में जगदंबा के अपार्थिव प्रकाश की झाँकी करते थे । यह उनके लिए सहज हो गया था । ऐसे दिव्य जीवन में फिर कामुकता कैसे पैदा हो ? इस संबंध में एक और सुंदर प्रसंग का स्मरण हो आता है ।
एक बार रात के समय रामकृष्णदेव सो रहे थे और शारदादेवी उनकी चरणसेवा कर रही थी । उसी वक्त उन्हें एकाएक विचार हुआ कि रामकृष्णदेव की मनोवृत्ति कहाँ भटक रही है, मैं जरा देखूँ तो सही । इसी विचार से प्रेरित होकर उन्होंने पूछा, ‘कहीए तो, मैं आपकी कौन होती हूँ ?’
रामकृष्णदेव ने तत्क्षण उत्तर दिया, ‘क्यों ? इसमें क्या पूछना ? एक स्वरूप में माँ मंदिर में विराजित होती है, दूसरे रूप में जननी बनकर मुझे जन्म दिया और तीसरे रूप में वे तुम्हारे द्वारा मेरे पैर दबा रही है । आप तीनों एक है, आपमें कोई भेद नहीं ऐसा मेरा विश्वास है ।’
शारदादेवी तो यह सुन दंग रह गई ।
आज, जब की यह घटना हुए कई साल बीत गये हैं, रामकृष्णदेव के उस लाक्षणिक उत्तर से अनेक व्यक्ति आश्चर्य में पड जाएँगे । किन्तु इसमें अचरज की कोई बात नहीं है । संसार के प्रत्येक पदार्थ में ईश्वर की झाँकी करना आदर्श भक्त का स्वभाव होता है । इसी स्वभाव की प्रतिध्वनि उस घटना में ध्वनित होती है ।
धन्य हैं रामकृष्णदेव और धन्य हैं शारदादेवी ! उनके चरणों में कोटिकोटि प्रणाम ! हम उन्हें प्रार्थना करें कि अहेतुकी अलौकिक कृपावृष्टि करके आप हमारे अंतर को भी वैसा ही अलौकिक बनायें और परमात्मभाव से भर दें !
- श्री योगेश्वरजी

