चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन का अठारह साल जितना लंबा और अंतिम समय गुजारा उस स्थान जगन्नाथपुरी के प्रसिद्ध तीर्थस्थान स्थित राधाकांत मठ है । इससे थोडी दूर एक वृक्ष है । यह वृक्ष दर्शनीय है । इसका महत्व ऐतिहासिक सत्य के कारण विशेष है क्योंकि वहाँ रहकर चैतन्य महाप्रभु के शिष्य हरिदासजी ने बहुत बरसों तपश्चर्या की थी ।
हरिदासजी यों तो मूलतः यवन थे पर उनको भगवान कृष्ण से अत्यधिक प्यार था । पूर्वसंस्कारो से प्रेरित हो उनका मन कृष्ण में लगा था, कृष्णदर्शन के लिए बेताब हुआ था ।
‘जातपात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई’ - इस लोकोक्ति के अनुसार वे भगवान के परम भक्त बन गये थे । इसी प्राचीन बकुल वृक्ष के तले बैठ हरिदासजी भगवान के जप और ध्यान में तल्लीन हो जाते । वे प्रतिदिन निश्चित संख्या में जप करते । चैतन्य महाप्रभु उनसे बडा प्यार करते । यह देख दूसरे लोग ईर्ष्या करने लगे ।
इसी ईर्ष्या से प्रेरित हो उन्होंने जगन्नाथपुरी कि एक वेश्या को बडा इनाम देने की लालच देकर हरिदासजी को अपनी मोहिनी के जाल में फँसाने का कार्य करने के लिए तैयार की । इस तरह उन्हें चरित्रभ्रष्ट बनाने कि योजना की ।
वेश्या को लगा, हरिदास का पतन करना यह कौन सी बडी बात है ! मैंने तो ऐसे कई पुरुषों को मंत्रमुग्ध या मोहित कर दिया है । मेरा सौंदर्य ही ऐसा बेमिसाल और असाधारण है कि इसकी संमोहन शक्ति से कोई टक्कर नहीं ले सकता । सुरमा भी इससे मजबूर हो जाते हैं तो हरिदास की तो विसात ही क्या ?
वह तो बन-ठनकर हरिदासजी को मोहित करने चली । हरिदासजी उस वक्त ध्यान में बैठे थे । उनकी आँखे बन्द थी और उनके अंतरतम से प्रकटित प्रेम का पवित्र प्रवाह आँसू के रुप में बह रहा था । वेश्या उनके जागने की प्रतिक्षा में सारा दिन बैठी रही पर हरिदासजी उठे ही नहीं ।
दूसरे दिन भी वही दशा हुई । वेश्या आई पर हरिदासजी ने तो आँखे नहीं खोली ।
तीसरे दिन भी हरिदासजी ध्यान में लीन रहे ।
चौथे दिन जब उन्होंने आँखे खोली तो वेश्या उनके पैरों पड गई ।
हरिदासजी ने उसके वहाँ आनेका कारण पूछा तो बोली, ‘कुछ लोगों के कहने पर मैं आपका पतन करने आई थी किन्तु आश्चर्य की बात है कि तीन दिन तक आपको निहारने से मेरा मन परिवर्तित हो गया है । आपको कौन-से रस की प्राप्ति हुई है जिसके आगे संसार के सभी विषय या पदार्थ नीरस लगते हैं ?’
हरिदासजी ने उत्तर दिया, ‘यह रस कोई दूजा नहीं पर भगवान का प्रेमरस है । इस रस का प्रभाव ही ऐसा है कि इसका पान करने के बाद और कोई रस पीनेकी इच्छा नहीं होती ।’
‘मैंने जीवनभर पाप किये हैं, मेरे उद्धार का कोई उपाय है ?’
‘भगवान का नाम जीवमात्र के परित्राण के लिये काफि है । इसका आश्रय लेनेवाले को कोई चिंता नहीं करनी पडती ।’
वेश्या के आग्रह से हरिदासजी ने उन्हें अपने प्रिय जप – हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे’ जपने का उपदेश दिया और फिर भगवान के ध्यान में लीन होने आँखे बन्द कर ली ।
वेश्या ने अपनी सारी संपत्ति दे दी और सादा व संयमित जीवन जीते हुए जप में अपने मन को लगा दिया ।
उसने हरिदास की शिष्या होने से अपना नाम हरिदासी रखा और शेष जीवन को कृतार्थ किया । महापुरुष के एक क्षण का भी संग संसार-सागर को तैरने की नौका समान हो जाता है । यह उक्ति उसके लिए सच्ची साबित हुई ।
इस पल पल परिवर्तनशील पृथ्वी पर कोई हमेशा के लिए जिन्दा नहीं रह सकता । जो आता है वह बिदा होता है । इस नियमानुसार एक रोज संत हरिदास का देहांत हुआ और इसके बाद हरिदासी ने भी देहत्याग किया ।
जगन्नाथपुरी के समुद्रतट पर आज भी हरिदासजी की समाधि विद्यमान है । निकट में ही हरिदासी की समाधि भी है । इसको देखकर हमें अवश्य आदरभाव होता है कि ‘सत्संगति कथमपि न हरोति पुंसाम्’ अर्थात् सत्संगति मनुष्य का क्या नहीं करती ? सबकुछ कर सकती है । वह उसको नया अवतार धरती है और नर से नारायण बनाती है ।
तुलसीदासजी ने ठीक ही कहा है कि उसमें स्नान करने से कौआ भी कोयल बनता है, बगुला हँस बनता है । ‘मज्जन फल पेखिअ तत्काला, काक होई पिक बक ही मराला ।’
धन्य है हरिदास और धन्य है हरिदासी !
- श्री योगेश्वरजी

