अमेरिका थोडे समय रहकर वापस भारत आनेवाले एक सज्जन ने अपना अनुभव कह सुनाया । स्वानुभव का यह प्रसंग बरसों पहले का है फिर भी याद रखने योग्य, प्रेरक व उल्लेखनीय है ।
जब वे एक बार अमेरिका में एक रास्ते से गुजर रहे थे कि मुसलाधार बारिश होने लगी । समझ में नहीं आया कि अब क्या किया जाय ? साथ में उनकी पत्नी भी थी ।
बरसाद से बचने के लिए वे सपत्नीक एक दुकान के पास जा खडे हुए । इतने में वहाँ एक कार आके खडी रही जिसमें एक अपरिचित पुरुष अपनी पत्नी के साथ बैठे थे । उसने बडे ही प्रेम से अपनी कार में बैठने की बिनती की या यों कहिए कि मोटर में बैठने का निमंत्रण दिया ।
परिस्थिति ऐसी थी की उनके निमंत्रण को स्वीकारने के सिवा कोई चारा न था । एक तो वे अकेले न थे और बारिश बन्द होने की संभावना न थी । उन अमेरिकन सज्जन को बिलकुल नजदीक ही जाना था फिर भी पहले उन्होंने भारतीय दंपती को उनके स्थान पर पहुँचा देना उचित समझा और भारतीय दम्पती ऐन मौके की यह अदभुत सहायता से गदगद् हो गये ।
मोटर से उतरते वक्त उस अमरिकन सज्जन का आभार माना और बदले में कुछ स्वीकार करने को कहा तो उन्होंने स्पष्ट इन्कार किया । उन्होंने कहा, ‘मैंने तो एक मानव के रूप में आपकी सेवा की है । बदले में मुझे कुछ नहीं चाहिए । आप इस घटना को भूलना मत और आपके देश में जाकर कहना कि अमरिकन सेवाभावी होते है ।’
‘इससे आपको क्या मिलेगा ? मैं तो आपको कुछ देना चाहता हूँ ।’
अमेरिकन ने उत्तर दिया, ‘मुझे क्या नहीं मिलेगा ? इससे मेरे देश का गौरव बढेगा और इससे मुझे सबकुछ मिल जाएगा ।’
इस जवाब ने भारतीय सज्जन को निरुत्तर बना दिया ।
अमेरिकन भाई तो मोटर में बिदा हो गये लेकिन इस उत्तम व्यवहार से उन्होंने जो सुवास छोडी वह अमिट, अक्षय रह गई । देखिये, उनके दिल में अपने देश के प्रति कितना प्रेम था ? ऐसा देशप्रेम और देश के लिए ऐसा गौरव जिन देशवासियों में पैदा हो और इससे प्रेरित होकर वे छोटे-बडे व्यवहार करें तो उस देशको आगे बढते हुए, प्रगति करते हुए देर न लगें । उस देश पर ईश्वर के आशीर्वाद उतरें, इसमें क्या संदेह ?
अमरिका और उनके जैसे दूसरे देश धर्मपरायण नहीं माने जाते परंतु भारत तो धर्मपरायण कहा जाता है । भारतवासीयों को धर्म का संदेश देने की जरूरत नहीं । सेवाधर्म तो उसे विरासत में मिला है फिर भी आज उनकी परिस्थिति कैसी है यह सब जानते है । भारत की जनता, छोटे-बडे सभी व्यक्ति अपने सभी कर्मों में या जीवन के व्यवहार में देशप्रेम, देशहित और देशगौरव को ध्यान में रखते हुए प्रवृत्त हो तो देश का कलेवर ही बदल जाए इसमें कोई संदेह नहीं । आखिरकार तो एक-एक व्यक्ति मिलकर ही देश बनता है ।
- श्री योगेश्वरजी

