मगर स्वामी से फिर भेंट

बडौदा आकर शांताश्रम यानि मगर स्वामी की स्मृति होना स्वाभाविक था । देवकीबाई धर्मशाला का त्याग करने के बाद मेरा उनसे कोई संपर्क नहीं हुआ था । धर्मशाला से त्यागपत्र देने का मेरा विचार उन्हें पसंद नहीं आया था, फिर भी मेरे मन में उनके लिये पूज्यभाव कायम था । किसी मुद्दे को लेकर वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, मगर इससे पारस्परिक स्नेह-संबंध खत्म नहीं होता, एसा मेरा मानना है । साधना की उत्कटता के कारण पत्रव्यवहार बन्द था, इसलिये मैं स्वामीजी को खत नहीं लिख पाया था । अब बडौदा आया तो उनको मिलने की कामना से मैं रणमुक्तेश्वर महादेव की ओर चल पडा ।

जब मैं मन्दिर के उपर स्वामीजी के निवासस्थान पर गया तो स्वामीजी अपनी लाक्षणिक शैली में आसन पर बैठे थे । उनके शरीर पर एक कटिवस्त्र था । उनकी मुखाकृति तेजस्वी थी । उनको प्रणाम करके मैं उनके सन्मुख बैठ गया । मुझे देखकर वे हमेशा स्मित करते थे, मगर आज उनकी मुखमुद्रा गंभीर थी । कुछ रोषपूर्ण स्वर में उन्होंने कहा, 'तुम्हारा आश्रम कौन-सा है ?'

मैं उनके प्रश्न को समज नहीं पाया । तब मेरी उम्र पचीस साल से कम थी, तथा मैंने शादी भी नहीं की थी । इसलिये मेरा आश्रम ब्रह्मचर्याश्रम होना चाहिए मगर उन्होंने यह बात मुझसे पूछी इसलिये मुझे लगा की शायद उन्हें मेरा वेश पसंद नहीं आया । मैंने पंचकेश रखे थे, कमर से लेकर घूटनों तक खादी का वस्त्र पहना था । एक वस्त्र शरीर के उपर के भाग में लिपटा था । मेरे वस्त्र सफेद थे । शायद धोती और कुर्ते के बजाय कुछ भिन्न वस्त्र उन्हें ठीक नहीं लगे । मगर किसीको पसंद आये एसे वस्त्र पहनना मेरा स्वभाव नहीं है । मैं मानता हूँ की हरएक को अपनी रुचि के अनुसार वस्त्रपरिधान की स्वतंत्रता होनी चाहिए । हाँ, वस्त्र एसे होने चाहिए ताकि सामाजिक मर्यादा का पालन हो । कोई व्यक्ति अपनी इच्छा के मुताबिक वस्त्र परिधान करे एसा दुराग्रह ठीक नहीं है । जो भी हो, स्वामीजी का प्रश्न मेरे उत्तर की प्रतीक्षा में था ।

मैंने प्रत्युत्तर में कहा, 'मेरा आश्रम ब्रह्मचर्याश्रम है । वैसे ज्ञानदृष्टि से देखा जाय तो आत्मा का कोई आश्रम नहीं है । हस्तामलक ने शंकराचार्य से कहा था की मैं ना तो ब्रह्मचारी हूँ, ना गृहस्थी, ना वानप्रस्थी और ना ही संन्यासी । मैं तो आत्मस्वरूप हूँ और आत्मा में स्थित हूँ ।'

मेरा उत्तर उन्हें पसंद आया की नहीं ये तो वे जाने मगर उन्होंने इस विषय में आगे बातचीत नहीं की । हाँ, मेरी ओर देखकर दूसरा प्रश्न पूछा, 'तुमने किसे पूछकर धर्मशाला का त्याग किया ?'

मैंने कहा, 'ईश्वर की प्रेरणा से ।'

मेरा उत्तर उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आया । कुछ चीडकर वे बोले, 'ईश्वर की प्रेरणा से ? ईश्वर की प्रेरणा अब तक मुझे नहीं हुई और तुमको हो गई ?'

उनकी नाराजगी का कारण अब मेरी समज में आया । मेरे हिमालय जाने के पूर्व वे मुझे अक्सर कहा करते थे के उन्हें ध्यान में बार-बार प्रेरणा होती है की उन्हें कोई आश्रम मिलनेवाला है । मुझे उनकी यह बात का स्मरण हुआ मगर मैं चूप रहा ।

मैंने शांति से प्रत्युत्तर दिया, 'आपको प्रेरणा होती है या नहीं ये तो मैं नहीं जानता मगर हाँ, मुझे ईश्वरी प्रेरणा हुई थी ।'

मेरा कहना स्वामीजीको पसंद नहीं आया । उनका मानना था की मुझे धर्मशाला में बने रहना चाहिए था । मगर मैं तो ईश्वर की प्रेरणा को शिरोधार्य मानकर जिन्दगी के रास्ते चुनता रहा और यकीनन इससे मुझे बेहद लाभ हुआ ।

अगर मैं उनकी ईच्छा के मुताबिक धर्मशाला में रहा होता तो वे अवश्य प्रसन्न होते, मगर उनकी प्रसन्नता से अधिक मेरे लिये ईश्वरीय प्रेरणा को शिरोधार्य करना था । मेरा अब तक का जीवन ईश्वर की ईच्छा का अनुवाद रहा है इसलिये उसकी अवगणना करना मेरे लिये नामुमकिन था । वैसे भी देखा जाय तो स्वामीजी को एसी अपेक्षा क्यूँ होनी चाहिए की मैं उनकी इच्छा के मुताबिक चलूँ ? मैं मानता हूँ की उन्होंने धर्मशाला त्याग करने पर मुझे ताड़ दिया उसके पीछे उनका स्नेह कार्यभूत था मगर मुझे ईश्वरी प्रेरणा मिली ये बात उनकी समझ में क्यूँ नहीं आयी ? अगर उन्होंने इसका स्वीकार कीया होता तो बात बन जाती । ईश्वर की शक्ति अनंत है । वो चाहे तो किसीको भी, फिर मेरे जैसा साधारण बालक क्यूँ न हो, प्रेरणा और पथप्रदर्शन दे सकता है । इसमें हैरान होनेवाली कौन-सी बात थी? अगर उन्होंने मेरे धर्मशाला-त्याग के पश्चात हुए अनुभवों को सुना होता तो उनको अवश्य प्रसन्नता होती मगर वो रुठे रहे ।

उन्होंने बात का ढंग बदल लिया और कहा, 'ठीक है, अब जहाँ आपकी मरजी हो वहाँ जाइये ।'

भीतर के कमरे में एक विद्यार्थी हमारी वातचीत सुन रहा था । उसके आग्रह से मैं आधा घण्टा रुका । लडके के साथ कुछ बातचीत करके मैं चल पडा । तत्पश्चात स्वामीजी से मेरी भेंट नहीं हुई । उनके विचित्र वर्तन के बावजूद मेरे दिल में उनके प्रति सम्मान की भावना आज भी है और हमेशा रहेगी । जैसा की मैंने बताया, वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, मगर इससे परस्पर प्रेमभाव बना रहेना चाहिए । सच्चे संतपुरुष हमेशा सर्वत्र परमात्मा का दर्शन करते है और सबको प्यार करते है । मैं भी उनके नक्शेकदम पर चलने का नम्र प्रयास कर रहा हूँ ।

बचपन से ही मेरा मन ईश्वर के दर्शन करने के लिये उत्सुक था । किताबें पढने के बाद मुझे रामकृष्णदेव जैसे समर्थ महापुरुष के समागम की इच्छा हुई । वक्त के चलते मैंने एसे महापुरुषों को ढूँढने का हरसंभव प्रयास किया । इस हेतु से मैंने विभिन्न संतपुरुषों के दर्शन-समागम किये तथा ईश्वर से प्रार्थना भी की । फिर भी आज तक, दर्शनमात्र से मन-अंतर शांत हो जाय और हृदय उनके चरणों में सर्वसमर्पण करने के लिये लालायित हो एसे महापुरुष से मेरी भेंट नहीं हुई । मेरी भावनाओं को जो सुचारुरूप से समज सकें, मुझे मार्गदर्शन दे सकें, जिसे मैं गुरुपद पर आसीन कर सकूँ एसे देहधारी महापुरुष की तलाश अब भी अपूर्ण है । हाँ, सूक्ष्म जगत में एसे सिद्ध और समर्थ पुरुष मुझे मिले मगर स्थूल जगत में उनका संपर्क या समागम नहीं हुआ । हालाकि, जब से मैंने ईश्वर को माँ के रूप में देखा, तब से उसीने मेरी सहायता तथा पथप्रदर्शन किया है, तथा जरूरत पडने पर स्वानुभव-संपन्न महापुरुषों से मेरी भेंट करवाई है । उसकी कृपादृष्टि मुझ पर सदैव बनी रही है और यही कारण है की मैं अपने आपको कहीं भी, कभी भी महेफूस मानता हूँ । यह ईश्वर की परम कृपा ही है की मैं हर पल अवर्णनीय शांति का अनुभव कर रहा हूँ । मेरा यह दृढ विश्वास है की जो भी मेरी तरह उसका शरण लेगा उसके सर्व मनोरथ पूर्ण होंगे और उसे साधना के लिये आवश्यक पथप्रदर्शन मिलेगा ।

 

Today's Quote

The real voyage of discovery consists not in seeking new landscapes, but in having new eyes.
-Marcel Proust

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